काजीरंगा के चारों ओर एक किलोमीटर के पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र के प्रस्ताव पर हिमंत बिस्वा सरमा का बयान असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के आसपास के क्षेत्र को एक किलोमीटर तक सीमित करने के फैसले का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि यह कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप है और इससे स्थानीय नागरिकों की आजीविका सुरक्षित रहेगी। गुवाहाटी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सोमवार को राज्य सरकार के उस फैसले का पुरजोर समर्थन किया जिसके तहत केंद्र सरकार से काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के इर्द-गिर्द केवल एक किलोमीटर के दायरे को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र यानी ईएसजेड के रूप में अधिसूचित करने का अनुरोध किया गया है। उन्होंने साफ किया कि यह प्रस्ताव अदालत के तय दिशानिर्देशों के दायरे में ही तैयार किया गया है। विपक्ष की आपत्तियों पर दिया गया स्पष्टीकरण राज्य सरकार के इस कदम के बाद से ही विपक्षी राजनीतिक दलों और आम नागरिकों के कुछ वर्गों की तरफ से तीखी आलोचना शुरू हो गई है। आलोचकों का तर्क है कि इस दायरे को सिर्फ एक किलोमीटर तक सीमित रखने से यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की पारिस्थितिकी यानी इकोलॉजी पर बुरा असर पड़ सकता है। हालांकि, मुख्यमंत्री ने इन सभी मांगों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस संरक्षित दायरे को दस किलोमीटर तक बढ़ाना व्यावहारिक नहीं होगा क्योंकि इससे काजीरंगा के आसपास रहने वाली आबादी पर भारी पाबंदियां लग जाएंगी। स्थानीय आजीविका और व्यापार का हवाला मुख्यमंत्री ने दलील दी कि यदि यह दायरा बोकाखाट या कलिबर तक फैला दिया जाए तो वहां के निवासियों के लिए जीवनयापन करना बेहद कठिन हो जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि खुद स्थानीय लोग ऐसी किसी भी अधिसूचना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुके हैं। उनके मुताबिक मिमिंग समुदाय के सदस्यों के साथ-साथ विधायक अखिल गोगोई ने भी बड़े दायरे वाले पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र का विरोध किया है। स्थानीय निवासी अपनी आजीविका के लिए विभिन्न व्यावसायिक गतिविधियों और उद्यमों पर निर्भर हैं। मुख्यमंत्री ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यदि दस किलोमीटर के इलाके को ईएसजेड के दायरे में लाया गया तो नुमालीगढ़ रिफाइनरी को भी बंद करना पड़ जाएगा, जिससे बड़े पैमाने पर आर्थिक संकट पैदा होगा। कानूनी आधार और सुप्रीम कोर्ट का फैसला अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने एक सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया, जिसके अनुसार पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र का दायरा एक से तीन किलोमीटर के बीच हो सकता है। सरकार इसी न्यायिक फैसले को आधार बनाकर आगे बढ़ रही है। कुछ दिन पहले ही राज्य प्रशासन ने केंद्र के समक्ष यह प्रस्ताव रखा था कि एक किलोमीटर का दायरा तय किया जाए ताकि इससे बाहर के क्षेत्रों में निर्माण और अन्य जरूरी गतिविधियां बेरोक-टोक जारी रह सकें। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय निवासियों की आजीविका के बीच संतुलन बनाने की बहस को हवा दे दी है। इसका आप पर असर भारत में: यह निर्णय देश भर में पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय विकास के बीच संतुलन बनाने की नीतिगत बहसों को प्रभावित करता है। असम में: काजीरंगा के आसपास रहने वाले स्थानीय निवासियों, व्यवसायियों और उद्योगों को भूमि उपयोग और निर्माण नियमों में राहत मिलने की संभावना है। सवाल-जवाब 1. असम सरकार ने काजीरंगा के आसपास कितने किलोमीटर के ईएसजेड का प्रस्ताव दिया है? असम सरकार ने केंद्र के पास एक किलोमीटर के पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ईएसजेड) का प्रस्ताव भेजा है। 2. इस प्रस्ताव का विरोध क्यों हो रहा है? आलोचकों और विपक्षी दलों का तर्क है कि एक किलोमीटर का दायरा यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की पारिस्थितिकी के लिए पर्याप्त नहीं है। 3. मुख्यमंत्री ने दस किलोमीटर के दायरे का विरोध क्यों किया? मुख्यमंत्री के अनुसार दस किलोमीटर का दायरा होने से स्थानीय लोगों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी और नुमालीगढ़ रिफाइनरी को भी बंद करना पड़ सकता है। 4. इस मामले में किस कानूनी फैसले का हवाला दिया गया है? सरकार ने एक ऐसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया है जो एक से तीन किलोमीटर के बीच के पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र का प्रावधान करता है। https://trendkia.com/politics/kajirnga-ke-charon-ora-eka-kilomitara-ke-paryavarana-snvedanashila-kshetra-ke-prastava-para-himanta-biswa-sarma-ka-bayana-17674 TrendKia — Har trend, sabse pehle.