कर्नाटक में मतदाता सूची संशोधन पर घमासान, भाजपा और जद(एस) ने राज्यपाल थावरचंद गहलोत से लगाई गुहार कर्नाटक में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) ने राज्यपाल थावरचंद गहलोत को ज्ञापन सौंपकर कांग्रेस सरकार पर पुलिस तंत्र के दुरुपयोग और आपत्तियां दर्ज कराने वालों पर झूठे मुकदमे दर्ज करने का आरोप लगाया है। कर्नाटक में मतदाता सूचियों के विशेष सारांश संशोधन (एसआईआर) की कवायद को लेकर सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन के बीच टकराव गहरा गया है। भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (सेक्युलर) के संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने राजभवन पहुंचकर राज्यपाल थावरचंद गहलोत को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में राज्य की सिद्धारमैया सरकार पर निर्वाचन आयोग की संवैधानिक प्रक्रिया में सीधे हस्तक्षेप करने और कानून के नियमों की अनदेखी करने का गंभीर आरोप लगाया गया है। विपक्षी दलों का कहना है कि अवैध घुसपैठ और फर्जी प्रविष्टियों के जरिए मतदाता सूची में शामिल किए गए अयोग्य नामों को छांटने के लिए यह प्रक्रिया बेहद जरूरी है, लेकिन सत्ताधारी दल अपने राजनीतिक फायदे के लिए इसमें बाधा उत्पन्न कर रहा है। संवैधानिक प्रक्रिया और फॉर्म 7 का कानूनी अधिकार विपक्षी दलों ने राज्यपाल के संज्ञान में लाया कि चुनावी नियमों के तहत मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने के लिए नागरिकों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को वैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होने के बाद किसी भी अयोग्य या फर्जी नाम पर आपत्ति दर्ज कराना पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) थोक में फॉर्म 7 के माध्यम से आपत्तियां दर्ज करवा सकते हैं। ज्ञापन में स्पष्ट किया गया कि फॉर्म 7 के तहत प्राप्त सभी आवेदनों और आपत्तियों का अंतिम फैसला होने से पहले चुनाव पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) और सहायक चुनाव पंजीकरण अधिकारी (एईआरओ) द्वारा जमीनी स्तर पर क्रॉस-वेरिफिकेशन किया जाता है। इसके अलावा किसी भी निर्णय के विरुद्ध कानूनी रूप से स्वीकृत अपील का मंच भी उपलब्ध रहता है। ऐसे में कानूनी और वैधानिक जांच-पड़ताल से गुजरने वाली प्रक्रिया को अपराध की श्रेणी में खड़ा करना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के पूरी तरह विपरीत है। पुलिस के दुरुपयोग और झूठी प्राथमिकियों का मामला भाजपा और जद(एस) ने अपने संयुक्त ज्ञापन में आरोप लगाया कि कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) के कार्यकर्ता और राज्य सरकार के मंत्री तंत्र पर अनुचित दबाव डाल रहे हैं। आरोप के मुताबिक, जो कार्यकर्ता या नागरिक मतदाता सूचियों में मौजूद विसंगतियों के खिलाफ फॉर्म 7 दाखिल कर रहे हैं, उन्हें डराने और धमकाने के लिए पुलिस मशीनरी का खुला दुरुपयोग किया जा रहा है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत यदि कोई जानबूझकर झूठी आपत्ति दर्ज करता है तो उसके खिलाफ निश्चित कानूनी कार्रवाई का प्रावधान मौजूद है, परंतु राज्य सरकार इस विशेष कानून को दरकिनार कर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023 की संगीन धाराओं के तहत मामले थोप रही है। प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि पुलिस द्वारा धोखाधड़ी, जालसाजी, शांति भंग और आपराधिक धमकी जैसी गैर-जमानती और गंभीर धाराएं लगाकर विपक्षी कार्यकर्ताओं को सीधे निशाना बनाया जा रहा है। इससे उन लोगों में भारी डर का माहौल बन गया है जो चुनावी सूची को दुरुस्त करवाने के लिए आगे आ रहे थे। विपक्षी नेताओं का कहना है कि पुलिसिया कार्रवाई से भारत निर्वाचन आयोग जैसे निष्पक्ष संवैधानिक संस्थान की स्वतंत्रता और एसआईआर प्रक्रिया की पूरी विश्वसनीयता संकट में पड़ गई है। विभिन्न जिलों में 6 एफआईआर और निर्वाचन कार्यालय पर विरोध ज्ञापन में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में दर्ज किए गए मामलों का ब्योरा भी साझा किया गया। विपक्षी दलों के अनुसार, बीदर जिले के भाल्की, बेलगावी के मार्केट एरिया, बेंगलुरु के व्यालिकवल, बल्लारी और मैसूरु के नरसिम्हाराजा इलाके में अब तक 6 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं। इन सभी मामलों में भाजपा कार्यकर्ताओं और उनसे सहानुभूति रखने वाले नागरिकों को दुर्भावनापूर्ण तरीके से आरोपी बनाया गया है। इसके अलावा ज्ञापन में 1 अक्टूबर की घटना का प्रमुखता से जिक्र किया गया। विपक्षी नेताओं ने कहा कि 1 अक्टूबर को सत्तारूढ़ दल के नेताओं और मंत्रियों ने निषेधाज्ञा लागू होने के बावजूद मुख्य चुनाव अधिकारी के कार्यालय परिसर में अनधिकृत और गैर-कानूनी प्रदर्शन किया। आरोप लगाया गया कि इस शक्ति प्रदर्शन के जरिए निर्वाचन कार्यालय पर दबाव बनाने की कोशिश की गई, जिसके प्रभाव में आकर मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 31 के तहत कार्रवाई की बात कही। विपक्ष ने इसे चिंताजनक बताते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्य निर्वाचन कार्यालय भी राज्य सरकार के दबाव में आ गया है, जिससे पुलिसिया उत्पीड़न को बढ़ावा मिल रहा है। राज्यपाल से दखल और सुरक्षा की मांग विपक्षी गठबंधन ने राज्यपाल थावरचंद गहलोत से इस मामले में तुरंत दखल देने की गुहार लगाई है। ज्ञापन में मांग की गई है कि राज्यपाल राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश जारी करें ताकि वैध तरीके से फॉर्म 7 जमा करने वाले नागरिकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ बीएनएस 2023 के तहत दर्ज की जा रही मनमानी प्राथमिकियों पर तुरंत रोक लगाई जा सके। विपक्षी नेताओं ने अपील की कि निर्वाचन आयोग के काम में पुलिस के अनुचित हस्तक्षेप को बंद कराया जाए और चुनावी प्रक्रिया में भाग ले रहे नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की हर हाल में रक्षा सुनिश्चित की जाए। इसका आप पर असर कर्नाटक में मतदाता सूची के सत्यापन और आपत्तियों को लेकर चल रहे इस विवाद का सीधा असर राज्य के आम मतदाताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर पड़ेगा। • भारत में: देश भर में मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया के दौरान राजनीतिक दलों और नागरिकों के वैधानिक अधिकारों को लेकर कानूनी स्पष्टता बढ़ेगी। यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी प्रक्रियाओं में राज्य पुलिस के हस्तक्षेप की सीमाओं पर बहस को तेज कर सकता है। • कर्नाटक में: राज्य में बूथ स्तर पर मतदाता सूची में संशोधन या फर्जी नामों की शिकायत दर्ज कराने वाले नागरिकों में पुलिस कार्रवाई का डर पैदा हो सकता है। यदि चुनाव आयोग और सरकार के बीच स्पष्ट दिशा-निर्देश तय नहीं होते हैं, तो कई वैध मतदाता आपत्तियां दर्ज कराने से झिझक सकते हैं। • कार्यकर्ताओं के लिए: विभिन्न राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों को अब फॉर्म 7 जमा करते समय कानूनी दस्तावेजों और साक्ष्यों का अतिरिक्त ध्यान रखना होगा। किसी भी तकनीकी त्रुटि या आपत्ति खारिज होने पर पुलिस मुकदमों का जोखिम बढ़ गया है। • प्रशासनिक व्यवस्था: चुनाव अधिकारियों और स्थानीय पुलिस के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इससे मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन की समय-सीमा और सत्यापन प्रक्रिया की गति प्रभावित होने की संभावना है। ऐसा क्यों हुआ यह राजनीतिक विवाद कर्नाटक में जारी विशेष सारांश संशोधन के दौरान मतदाता सूचियों से अयोग्य नामों को हटाने के लिए फॉर्म 7 दाखिल किए जाने के बाद शुरू हुआ। राज्य की कांग्रेस सरकार और विपक्षी गठबंधन के बीच मतदाता सूची की सत्यता और पुलिसिया कार्रवाई को लेकर परस्पर विरोधी रुख के कारण टकराव बढ़ गया। • फॉर्म 7 पर आपत्तियां: भाजपा और जद(एस) कार्यकर्ताओं ने मतदाता सूची में अवैध और अयोग्य नामों के शामिल होने का आरोप लगाते हुए बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज कराईं। सत्ताधारी दल ने इन आपत्तियों को वास्तविक मतदाताओं के नाम कटवाने की दुर्भावनापूर्ण साजिश करार दिया। • पुलिस कार्रवाई और धाराएं: लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के दायरे में जांच करने के बजाय राज्य पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता के तहत धोखाधड़ी और जालसाजी की धाराओं में छह एफआईआर दर्ज कर लीं। इससे विपक्षी दलों में भारी आक्रोश फैल गया और उन्होंने इसे प्रतिशोध की कार्रवाई बताया। • निर्वाचन कार्यालय पर विरोध प्रदर्शन: 1 अक्टूबर को सत्तारूढ़ दल के नेताओं द्वारा मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के भीतर विरोध प्रदर्शन करने से तनाव चरम पर पहुंच गया। विपक्ष का आरोप है कि इस दबाव के चलते ही चुनाव तंत्र निष्पक्ष निर्णय लेने में असहज नजर आ रहा है। सवाल-जवाब 1. विपक्षी दलों ने राज्यपाल थावरचंद गहलोत से क्या शिकायत की है? भाजपा और जद(एस) ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार एसआईआर प्रक्रिया में बाधा डाल रही है और फॉर्म 7 दाखिल करने वालों पर झूठी एफआईआर दर्ज करवा रही है। 2. कर्नाटक के किन जिलों में एफआईआर दर्ज होने की बात सामने आई है? ज्ञापन के अनुसार बीदर (भाल्की), बेलगावी, बेंगलुरु (व्यालिकवल), बल्लारी और मैसूरु (नरसिम्हाराजा) में कुल 6 एफआईआर दर्ज की गई हैं। 3. चुनाव नियमों में फॉर्म 7 का क्या काम होता है? फॉर्म 7 का उपयोग मतदाता सूची में पहले से शामिल किसी अयोग्य, मृत या फर्जी नाम को हटाने के लिए आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराने हेतु किया जाता है। 4. विपक्ष के अनुसार पुलिस की कार्रवाई में क्या अनियमितता है? विपक्ष का कहना है कि फर्जी आपत्तियों के लिए लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 31 के बजाय बीएनएस 2023 की संगीन आपराधिक धाराएं लगाई जा रही हैं। 5. 1 अक्टूबर को चुनाव अधिकारी के कार्यालय में क्या हुआ था? ज्ञापन के अनुसार, 1 अक्टूबर को मंत्रियों और नेताओं ने निषेधाज्ञा के बावजूद मुख्य चुनाव अधिकारी के कार्यालय परिसर में अनधिकृत विरोध प्रदर्शन किया था। https://trendkia.com/politics/karnataka-men-sir-ko-lekara-siyasi-ghamasana-bjp-jds-ne-rajyapala-thawar-chand-gehlot-se-ki-congress-sarakara-ki-shikayata-43747 TrendKia — Har trend, sabse pehle.