खराब चुनावी सर्वे को रिपब्लिकन समर्थकों ने बताया मनोवैज्ञानिक साजिश, ट्रंप के गिरते आंकड़ों पर सियासी घमासान मध्यावधि चुनाव से पहले डोनाल्ड ट्रंप की गिरती लोकप्रियता और सीनेट मुकाबलों में डेमोक्रेट्स की बढ़त वाले सर्वे सामने आने के बाद दक्षिणपंथी हलकों में इन्हें मतदाताओं को हतोत्साहित करने वाली साजिश करार दिया जा रहा है। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों की सरगर्मी के बीच चुनावी सर्वे के नतीजों को लेकर एक नया सियासी विवाद खड़ा हो गया है। हालिया ओपिनियन पोल्स में डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता ऐतिहासिक निचले स्तर पर दर्ज की गई है, जबकि उन राज्यों में भी डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बढ़त बनाते दिख रहे हैं जहां ट्रंप ने 2024 के चुनाव में आसान जीत हासिल की थी। इन प्रतिकूल आंकड़ों के सामने आने के बाद रूढ़िवादी विचारकों, चुनावी अखंडता पर सवाल उठाने वाले समूहों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने इन सर्वेक्षणों को खारिज करना शुरू कर दिया है। कई प्रमुख हस्तियों का कहना है कि यह सब रिपब्लिकन मतदाताओं का मनोबल गिराने और उन्हें मतदान से दूर रखने के लिए रचा गया एक मनोवैज्ञानिक अभियान यानी साइऑप है। रूढ़िवादी विचारकों और रणनीतिकारों के दावे हेरिटेज फाउंडेशन नामक रूढ़िवादी थिंक टैंक के अध्यक्ष केविन रॉबर्ट्स ने फॉक्स न्यूज से बातचीत में कहा कि मध्यावधि चुनाव के ये सर्वेक्षण रूढ़िवादी मतदान को दबाने के लिए तैयार किया गया एक मनोवैज्ञानिक अभियान हैं। उनका मानना है कि इन आंकड़ों के जरिए यह माहौल बनाया जा रहा है कि रिपब्लिकन समर्थक घर पर ही रहें। इसी तरह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर चार मिलियन फॉलोअर्स वाले राजनीतिक टिप्पणीकार फिलिप बुकानन, जिन्हें ऑनलाइन कैटटर्ड के नाम से जाना जाता है, ने अपने फॉलोअर्स को आगाह किया कि मध्यावधि चुनाव नजदीक हैं और हास्यास्पद फर्जी सर्वे सामने आने लगे हैं। चुनावी परिणामों को नकारने वाली मुहिम से जुड़े कई अन्य जाने-माने चेहरे भी इसी लाइन पर बयान दे रहे हैं। छह वर्षों से चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल उठा रहे स्टीव बैनन ने भी मौजूदा सर्वेक्षणों को एक मनोवैज्ञानिक चाल बताया। उन्होंने समर्थकों से कहा कि वे यह अच्छी तरह समझ लें कि उनका भविष्य अभी भी उनके अपने हाथों में है, चाहे मीडिया कुछ भी कहे या तथाकथित नीली सुनामी और डेमोक्रेटिक लहर की कितनी भी बातें करे। वहीं पूर्व सैन्य कर्नल और चुनावी अखंडता पर सवाल उठाने वाले सेथ केशेल ने, जो व्हाइट हाउस से नजदीकी संबंधों का दावा करते हैं, इन सर्वेक्षणों को पूरी तरह अनैतिक बताते हुए कहा कि वर्तमान में पोलिंग इतनी अनैतिक हो चुकी है कि इसे गैरकानूनी घोषित कर देना चाहिए। डोनाल्ड ट्रंप का रुख और व्हाइट हाउस की अंदरूनी चिंता डोनाल्ड ट्रंप एक दशक से अधिक समय से बिना किसी पुख्ता सबूत के यह दावा करते रहे हैं कि अमेरिकी चुनावों में धोखाधड़ी होती रही है। साल 2020 की चुनावी हार के बाद उनके समर्थकों और समूहों का एक ऐसा तंत्र तैयार हुआ जिसने यह आरोप लगाया कि पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन ने ट्रंप से चुनाव चुराया था। आज यह विचार रिपब्लिकन पार्टी की मुख्यधारा का हिस्सा बन चुका है, जिसके चलते नवंबर के संघीय और राज्य स्तरीय चुनावों में उतरने वाले सैकड़ों रिपब्लिकन उम्मीदवारों ने चुनावी निष्पक्षता पर खुले तौर पर संदेह जताया है। व्हाइट हाउस में पिछले साल दोबारा लौटने के बाद से ट्रंप अब तक 39 बार चुनावी सर्वे को फर्जी बता चुके हैं। मीडिया निगरानी संस्था मीडिया मैटर्स फॉर अमेरिका के विश्लेषण के अनुसार, ट्रंप ने अकेले अगस्त के महीने में नौ बार इन सर्वेक्षणों को फर्जी करार दिया। पिछले महीने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में उन्होंने आरोप लगाया था कि ये सर्वे वास्तव में मतदाताओं का मनोबल तोड़ने के अभियान हैं, जिन्हें डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन मतदाताओं को मतदान से रोकने के लिए तैयार किया है। इसके अलावा ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने आयोवा से आए प्रतिकूल सर्वेक्षण आंकड़ों को पूरी तरह खारिज करते हुए साफ कहा कि ये सभी सर्वे फर्जी हैं। हालांकि सार्वजनिक मंचों पर इन आंकड़ों को नकारा जा रहा है, लेकिन अंदरूनी तौर पर रिपब्लिकन रणनीतिकारों में घबराहट साफ दिख रही है। ट्रंप के अपने करीबी सलाहकार सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों में संभावित नुकसान को लेकर बेहद चिंतित हैं। लंबे समय से ट्रंप की चुनावी टीम से जुड़े एक रणनीतिकार का कहना है कि पार्टी की स्थिति वाकई बहुत नाजुक है और उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ सकता है। इसी डर के कारण रिपब्लिकन पार्टी अब उन दर्जनों सीटों पर बड़े पैमाने पर चुनावी फंड झोंक रही है जिन्हें पहले वे पूरी तरह सुरक्षित मानकर चल रहे थे। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के बीच खींचतान प्रतिकूल सर्वेक्षणों को लेकर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के बीच अलग-अलग तर्क देखने को मिल रहे हैं। दक्षिणपंथी पॉडकास्टर टिम पूल ने यह राय रखी थी कि ट्रंप की घटती लोकप्रियता की असल वजह गैस की ऊंची कीमतें और ईरान में जारी युद्ध है। उनके इस विश्लेषण पर करीब पांच लाख फॉलोअर्स वाले राजनीतिक टिप्पणीकार बिल मिशेल ने असहमति जताते हुए कहा कि हो सकता है कि ये सर्वे ही फर्जी हों। X पर 220,000 फॉलोअर्स वाली जूली डोनट्स ने लिखा कि सारे सर्वे मनगढ़ंत हैं और सभी 50 राज्य रिपब्लिकन समर्थन वाले हैं। अपने इस दावे के साथ उन्होंने 2016 के एक पुराने चुनावी नक्शे की तस्वीर साझा की जिसमें ट्रंप को व्यापक समर्थन दिखाया गया था। अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी इंस्टीट्यूट में काम कर चुकीं कम्ब्री नेल्सन, जिन्होंने कभी यह दावा किया था कि चंद्रमा एक सप्ताह के लिए गायब हो गया था, ने मीडिया पर निशाना साधते हुए लिखा कि चुनाव का सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा चलाया जा रहा है, जिसका मकसद समर्थकों का हौसला तोड़ना और उन्हें घरों में बिठाना है। मैरीलैंड इलेक्शन इंटीग्रिटी ग्रुप ने भी X पर दावा किया कि पिछले पांच चुनावी चक्रों में सर्वे के आंकड़े औसतन तीन अंक तक डेमोक्रेट्स के पक्ष में झुके रहे हैं। वहीं X पर गुंथर ईगलमैन के नाम से पहचाने जाने वाले 52 वर्षीय डेविड फ्रीमैन ने तो यहां तक कह दिया कि उन्होंने अपने जीवन में कभी कोई पोलिंग होते नहीं देखी, इसलिए सर्वे मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए बनाए गए झूठे आंकड़े हैं। हालांकि उनके इस पोस्ट पर एक पाठक ने ध्यान दिलाया कि जब भी किसी सर्वे में ट्रंप को आगे दिखाया जाता है, फ्रीमैन खुशी-खुशी उन आंकड़ों को साझा करते हैं। इसका आप पर असर अमेरिकी चुनावों और नीतियों पर नजर रखने वाले भारतीय पाठकों और विश्लेषकों के लिए इस राजनीतिक घटनाक्रम के सीधे मायने हैं। • विदेश नीति और वैश्विक व्यापार: मध्यावधि चुनाव में संभावित सत्ता परिवर्तन से अमेरिकी कांग्रेस में शक्ति संतुलन बदल सकता है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों, वीजा नीतियों और भू-राजनीतिक संधियों पर देखने को मिलेगा। • वैश्विक वित्तीय बाजार: सीनेट या प्रतिनिधि सभा में राजनीतिक अनिश्चितता अमेरिकी नीतिगत फैसलों को प्रभावित करती है। इससे भारतीय शेयर बाजार और मुद्रा विनिमय दरों पर अल्पावधि में उतार-चढ़ाव आ सकता है। • चुनावी नैरेटिव और विश्वास: चुनावी सर्वेक्षणों को मनोवैज्ञानिक अभियान बताने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे को प्रभावित करती है। यह वैश्विक स्तर पर चुनावी प्रक्रियाओं के अध्ययन में एक नया पहलू जोड़ती है। • पार्टी रणनीतियों में बदलाव: सुरक्षित मानी जाने वाली सीटों पर भी अचानक धन का आवंटन बढ़ना इस बात का संकेत है कि चुनाव प्रचार अब अप्रत्याशित रूप से आक्रामक और महंगा होने वाला है। ऐसा क्यों हुआ अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले चुनावी सर्वेक्षणों को फर्जी और मनोवैज्ञानिक अभियान बताए जाने के पीछे राजनीतिक दबाव और एक दशक से चली आ रही अविश्वास की राजनीति है। हालिया सर्वे में प्रमुख सीटों पर रिपब्लिकन पार्टी के पिछड़ने के बाद इन दावों में तेजी आई है। • प्रतिकूल चुनावी आंकड़े: हालिया ओपिनियन पोल्स में डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता रिकॉर्ड निचले स्तर पर है और डेमोक्रेट्स सीनेट की प्रमुख सीटों पर आगे चल रहे हैं। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटने से बचाने के लिए इन आंकड़ों को नकारा जा रहा है। • एक दशक पुराना अविश्वास: ट्रंप लंबे समय से चुनावी प्रक्रियाओं में धांधली के आरोप लगाते रहे हैं, जिसे 2020 के बाद उनके समर्थकों ने एक व्यापक अभियान में बदल दिया। यही अविश्वास अब नियमित सर्वेक्षणों पर भी लागू किया जा रहा है। • मतदान प्रतिशत बचाने की रणनीति: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समर्थक चुनाव को पहले ही हारा हुआ मान लेंगे तो वे वोट डालने नहीं निकलेंगे। इसलिए इन आंकड़ों को जानबूझकर रची गई मनोवैज्ञानिक साजिश करार दिया जा रहा है। • आंतरिक खींचतान और असंतोष: महंगाई, ईंधन की कीमतों और ईरान युद्ध जैसे मुद्दों पर मतदाताओं में नाराजगी दिख रही है, जिसका असर सर्वे में दिखने पर पार्टी के भीतर ही तर्कों को लेकर टकराव पैदा हो गया है। सवाल-जवाब 1. रूढ़िवादी नेता मध्यावधि चुनाव के सर्वेक्षणों को क्या बता रहे हैं? हेरिटेज फाउंडेशन के अध्यक्ष केविन रॉबर्ट्स और अन्य टिप्पणीकारों ने इन सर्वेक्षणों को रूढ़िवादी मतदाताओं का मनोबल गिराने के लिए चलाया गया मनोवैज्ञानिक अभियान करार दिया है। 2. व्हाइट हाउस लौटने के बाद ट्रंप ने कितनी बार सर्वे को फर्जी कहा है? मीडिया मैटर्स फॉर अमेरिका के विश्लेषण के अनुसार, ट्रंप व्हाइट हाउस में दोबारा आने के बाद 39 बार चुनावी सर्वे को फर्जी बता चुके हैं, जिनमें से नौ बार केवल अगस्त में कहा गया। 3. क्या रिपब्लिकन पार्टी के रणनीतिकार अंदरूनी तौर पर चिंतित हैं? हां, ट्रंप के करीबी सलाहकार सीनेट और प्रतिनिधि सभा में संभावित हार को लेकर बेहद चिंतित हैं और पार्टी उन सीटों पर फंड लगा रही है जिन्हें पहले सुरक्षित माना गया था। 4. सर्वेक्षणों में ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी की क्या स्थिति दिख रही है? हालिया सर्वेक्षणों में ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग ऐतिहासिक निचले स्तर पर दर्ज की गई है और डेमोक्रेट्स उन राज्यों की सीनेट सीटों पर आगे चल रहे हैं जहां 2024 में ट्रंप आसानी से जीते थे। 5. पॉडकास्टर टिम पूल ने ट्रंप की गिरती लोकप्रियता की क्या वजह बताई थी? टिम पूल ने सुझाव दिया था कि ट्रंप की गिरती रेटिंग के पीछे गैस की ऊंची कीमतें और ईरान में जारी युद्ध एक प्रमुख कारण हो सकता है। https://trendkia.com/politics/kharaba-chunavi-sarve-ko-republican-samarthakon-ne-bataya-manovaijnanika-sajisha-trump-ke-girate-ankaron-para-siyasi-ghamasana-41870 TrendKia — Har trend, sabse pehle.