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  "type": "article",
  "title": "लोकसभा और राज्यसभा में बार-बार व्यवधान से करोड़ों की बर्बादी, जानिए प्रश्नकाल और बहस छूटने का असली नुकसान",
  "summary": "संसदीय सत्रों के दौरान होने वाले हंगामे और काम रोकने की वजह से हर मिनट लाखों रुपये का नुकसान होता है। हालांकि वित्तीय आंकड़ों से परे लोकतंत्र, कानून बनाने की प्रक्रिया और सरकारी जवाबदेही पर इसका सबसे गहरा प्रभाव पड़ता है।",
  "content": "संसद के सत्रों के दौरान जब हंगामे और विरोध प्रदर्शन के कारण कार्यवाही स्थगित होती है, तो इसका सीधा प्रभाव देश के राजकोष और बजटीय व्यवस्था पर पड़ता है। संसदीय कार्यवाही को संचालित करने में प्रति मिनट लाखों रुपये का खर्च आता है। ऐतिहासिक अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2012 में ही संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने जानकारी दी थी कि संसद चलाने में प्रति मिनट लगभग 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं। यह खर्च लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों के बीच लगभग बराबर विभाजित होता है। विधायी गतिविधियों पर नज़र रखने वाली संस्था पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च भी व्यवधानों के आर्थिक नुकसान का आकलन करने के लिए इसी 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट के मानक आंकड़े का उपयोग करती आई है। हालांकि बीते 14 वर्षों में देश में महंगाई काफी बढ़ी है, जिसके कारण वर्तमान समय में संसद का प्रति मिनट वास्तविक परिचालन खर्च इस पुराने अनुमान से कहीं अधिक हो चुका है।\n\nसंसदीय कार्यवाही बाधित होने से करोड़ों रुपये के नुकसान का गणित\nसत्र के शुरुआती दिनों में ही जब दोनों सदनों में हंगामा हुआ, तब पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार लोकसभा ने 1,026 मिनट और राज्यसभा ने 816 मिनट की कार्यवाही गंवा दी। यदि 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट की मानक दर से इसकी गणना की जाए, तो केवल शुरुआती तीन दिनों के भीतर ही देश को लगभग 23 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान हुआ। इसमें लोकसभा का नुकसान 12.83 करोड़ रुपये और राज्यसभा का नुकसान 10.2 करोड़ रुपये आंका गया। यदि पूरे मॉनसून सत्र के दौरान गंवाए गए कुल समय का आकलन किया जाए, तो यह आंकड़ा 23 करोड़ रुपये से कई गुना अधिक बढ़ जाता है। जब सांसद सदन की कार्यवाही को ठप कर देते हैं, तब भी संसद भवन का रखरखाव, प्रशासनिक कर्मचारियों के वेतन, सुरक्षा व्यवस्था और तकनीकी सुविधाओं से जुड़ा दैनिक खर्च जारी रहता है, जबकि देश के लिए तय किए गए विधायी कार्य पूरी तरह रुक जाते हैं।\n\nवित्तीय क्षति से भी बड़ा संकट: विधायी कार्य और जवाबदेही का ठप होना\nसंसदीय व्यवधान का प्रभाव केवल करदाताओं के पैसों की बर्बादी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सबसे गंभीर पहलू उन विधायी कार्यों का बाधित होना है जो देश के हित में किए जाने अनिवार्य होते हैं। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च बार-बार इस बात पर ज़ोर देता है कि व्यवधान का मुख्य नुकसान केवल आर्थिक नहीं है। जब सदन बार-बार स्थगित होता है, तो जनप्रतिनिधियों को मंत्रियों से सवाल पूछने, नए विधेयकों पर गहन चर्चा करने, अपने क्षेत्रों के जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाने और सरकारी नीतियों की समीक्षा करने का अवसर नहीं मिल पाता। इस स्थिति में एक बेहद विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न होती है, जहां हंगामे के बीच भी सरकार अपने बिल पास करा लेती है, लेकिन संसद का मुख्य और मौलिक काम यानी सवाल पूछना, नीतिगत जांच करना और सार्वजनिक बहस होना बेहद कम हो जाता है।\n\nप्रश्नकाल का महत्व और इसे गंवाने से टूटती जवाबदेही की कड़ी\nप्रश्नकाल संसदीय दिनचर्या का वह अति महत्वपूर्ण समय होता है जब सांसद विभिन्न मंत्रालयों, सरकारी नीतियों और जमीनी व्यवस्थाओं के संबंध में सीधे मंत्रियों से औपचारिक सवाल पूछते हैं। इसी माध्यम से देश के आम नागरिकों को यह पता चलता है कि सरकारी योजनाएं और नीतियां वास्तव में धरातल पर किस प्रकार काम कर रही हैं। प्रश्नकाल में दो प्रकार के प्रश्न शामिल होते हैं। तारांकित प्रश्नों के उत्तर मंत्री द्वारा सदन के पटल पर मौखिक रूप से दिए जाते हैं, और इन पर सांसदों को पूरक सवाल पूछने का पूरा अधिकार होता है। वहीं अतारांकित प्रश्नों के लिखित उत्तर सरकार की ओर से प्रस्तुत किए जाते हैं। प्रश्नकाल केवल औपचारिकता या बहस का जरिया नहीं है, बल्कि यह वह तंत्र है जिसके माध्यम से सरकार की सीधी जवाबदेही तय होती है।\n\nजब प्रश्नकाल बाधित होता है, तो बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं, कल्याणकारी योजनाओं, परीक्षा पेपर लीक मामलों, बेरोजगारी के आंकड़ों, स्वास्थ्य सेवाओं और बजटीय आवंटन जैसे संवेदनशील विषयों पर मंत्रियों से जवाब मांगने का मौका हाथ से निकल जाता है। मौखिक उत्तर दिए जाने पर अन्य सांसद भी तत्कालीन विषयों पर प्रतिप्रश्न कर सकते हैं, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है। लेकिन जब कार्यवाही बार-बार रुकती है, तो प्रशासनिक जवाबदेही का यह ढांचा बिखर जाता है। पीआरएस के अनुसार, प्रश्नकाल में गंवाया गया समय बाद में देर तक बैठक आयोजित करके भी वापस नहीं पाया जा सकता, क्योंकि मौखिक सवाल पूछने और तत्काल स्पष्टीकरण मांगने का अवसर हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।\n\nइतिहास के पन्नों में संसदीय व्यवधान और प्रश्नकाल के घटते आंकड़े\nसंसदीय कार्यवाही में व्यवधान की समस्या केवल 2026 के मॉनसून सत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पिछले कई वर्षों से लगातार देखी जा रही है। ऐतिहासिक आंकड़ों पर नज़र डालें तो 16वीं लोकसभा के दौरान तय समय में से प्रश्नकाल केवल 67 प्रतिशत समय ही संचालित हो सका। वहीं यदि पिछली चार लोकसभाओं का समग्र औसत देखा जाए, तो यह आंकड़ा घटकर केवल 59 प्रतिशत रह गया है। वर्ष 2023 के मॉनसून सत्र में तो स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि राज्यसभा में लगातार 8 दिनों तक प्रश्नकाल 1 मिनट से भी कम समय के लिए चल सका। उस सत्र में लोकसभा में मौखिक जवाब के लिए सूचीबद्ध किए गए कुल प्रश्नों में से केवल 9 प्रतिशत के ही मौखिक उत्तर दिए जा सके थे, जबकि राज्यसभा में यह आंकड़ा 28 प्रतिशत रहा था। इसके विपरीत, वर्ष 2025 का बजट सत्र काफी सकारात्मक रहा था, जहां लोकसभा में 78 प्रतिशत और राज्यसभा में 83 प्रतिशत समय प्रश्नकाल सुचारू रूप से चला था।\n\nबिना व्यापक बहस के बिल पास होना: लोकतंत्र के लिए गहरी चिंता\nसदन में होने वाले हंगामे का असर विधेयकों को कानून बनाने की प्रक्रिया पर दो तरीकों से पड़ता है। पहली स्थिति में महत्वपूर्ण बिल लंबे समय तक पेंडिंग पड़े रहते हैं, जबकि दूसरी स्थिति में संसद का समय बचाने के चक्कर में बिना किसी गहन चर्चा के विधेयकों को आनन-फानन में पारित कर दिया जाता है। पीआरएस के आंकड़ों के अनुसार, 2023 के मॉनसून सत्र में लोकसभा ने 20 विधेयकों को 1 घंटे से भी कम समय की चर्चा में पारित कर दिया था। इनमें से 9 विधेयक ऐसे थे जिन्हें मात्र 20 मिनट से भी कम समय में बिना व्यापक विचार-विमर्श के पास कर दिया गया। वर्ष 2025 के मॉनसून सत्र में भी कई कानून सीमित चर्चा के साथ ही पारित किए गए। सबसे बड़ी चिंता यही है कि व्यवधान के कारण जब समय की कमी होती है, तब देश के भविष्य को तय करने वाले कानूनों की कमियों और खूबियों पर आवश्यक संसदीय मंथन नहीं हो पाता।\n\nसंसदीय समितियां और सदन के भीतर सीधी चर्चा का संतुलन\nविधेयकों की बारीक जांच के लिए संसदीय समितियां बनाई जाती हैं। ये समितियां कानून के हर पहलू का अध्ययन करती हैं, संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों की राय लेती हैं और सदन के शोर-शराबे से दूर शांत माहौल में अपना काम पूरा करती हैं। हालांकि, संसदीय समितियां कभी भी मुख्य सदन की बहस का विकल्प नहीं बन सकतीं। पीआरएस का स्पष्ट कहना है कि यद्यपि समितियां बेहतरीन तकनीकी जांच कर सकती हैं, लेकिन अंततः कानून को पारित करने की संवैधानिक जिम्मेदारी जनप्रतिनिधियों की ही होती है। इसलिए सदन के पटल पर खुलकर बहस होना अनिवार्य है। यदि सदन में समय कम बचता है और बिलों को जल्दबाज़ी में पास कराया जाता है, तो इससे समितियों द्वारा की गई जांच की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।\n\nक्या हर मिनट का व्यवधान सचमुच 2.5 लाख रुपये का सीधा नुकसान है?\nइस प्रश्न का व्यावहारिक उत्तर यह है कि 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट का आंकड़ा वर्ष 2012 के कुल वार्षिक संसदीय बजट और संचालन समय के आधार पर निकाला गया एक अनुमानित मूल्य है। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि कार्यवाही स्थगित होने पर सरकार के खाते से हर मिनट 2.5 लाख रुपये का अतिरिक्त चेक कटता है। संसद भवन की सुरक्षा, कर्मचारियों के वेतन, बिजली, तकनीक और बुनियादी ढांचे का निश्चित खर्च तो सरकार को हर परिस्थिति में देना ही होता है, चाहे सदन में चर्चा चल रही हो या हंगामा हो रहा हो। यह आंकड़ा दरअसल देश को यह समझाने का एक जरिया है कि जब संसदीय समय बर्बाद होता है, तो उसके एवज में जनता के कितने संसाधन व्यर्थ चले जाते हैं। असली और अपूरणीय नुकसान देश के लोकतंत्र और कानून निर्माण की गुणवत्ता का होता है।\n\nराजनीतिक गतिरोध: सरकार और विपक्ष के अपने-अपने तर्क\nसंसदीय व्यवधान के लिए जिम्मेदार कौन है, इस पर राजनीतिक मतभेद हमेशा बने रहते हैं। सत्ता पक्ष का तर्क रहता है कि विपक्ष जानबूझकर सदन की कार्यवाही ठप करता है और करदाताओं के करोड़ों रुपये बर्बाद करता है। वहीं दूसरी ओर विपक्ष का रुख यह रहता है कि जब सरकार देश के अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा कराने से पीछे हटती है, तो विरोध दर्ज कराना और व्यवधान डालना ही एकमात्र विकल्प बचता है। इस सत्र में भी यही राजनीतिक टकराव देखने को मिला। सरकार ने स्पष्ट किया कि वह संसदीय नियमों की परिधि में रहकर किसी भी विषय पर चर्चा के लिए तैयार है। दूसरी तरफ विपक्ष ने नीट परीक्षा विवाद, प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई और राम मंदिर दान घोटाले जैसे ज्वलंत मुद्दों पर तत्काल चर्चा की मांग रखी। इस गतिरोध का परिणाम केवल नारेबाजी, स्थगन, बैठकों और समय की अतिरिक्त बर्बादी के रूप में सामने आया।\n\nसंसद के तीन मुख्य स्तंभ और करदाताओं का अधिकार\nसंसदीय लोकतंत्र में संसद के तीन प्राथमिक दायित्व होते हैं: पहला कानून बनाना, दूसरा सार्वजनिक धन के खर्च की मंजूरी देना व वित्तीय जांच करना, और तीसरा सरकार को जनता के प्रति पूरी तरह जवाबदेह बनाना। निरंतर होने वाले व्यवधान इन तीनों स्तंभों को कमजोर करते हैं। प्रश्नकाल गंवाने से मंत्रियों से सवाल पूछने का दायित्व अधूरा रह जाता है, बहस कम होने से कानूनों की जांच कमजोर पड़ती है और कामकाजी दिन घटने से देश के आम नागरिकों के मुद्दे दब जाते हैं। संसद का पूरा ढांचा जनता के टैक्स के पैसों से संचालित होता है। करदाता सांसदों के भत्तों, कर्मचारियों के वेतन, सुरक्षा और आधुनिक तकनीक का खर्च उठाते हैं। इसलिए संसद की सफलता केवल पारित किए गए बिलों की संख्या से नहीं, बल्कि सदन में हुई बहस की गहराई और सरकार की जवाबदेही से मापी जानी चाहिए। पीआरएस ने चेतावनी दी है कि व्यवधानों को संसद की सामान्य कार्यशैली नहीं बनने दिया जाना चाहिए।\n\nइसका आप पर असर\nपाठकों और करदाताओं पर असर:\n\n• भारत में: संसद की कार्यवाही ठप होने से आम जनता द्वारा भरा गया टैक्स का पैसा बिना किसी काम के बर्बाद होता है और जनहित से जुड़ी नीतियों की जांच कमजोर पड़ जाती है।\n• नागरिकों की आवाज पर असर: जब प्रश्नकाल रद्द होता है, तो युवाओं, परीक्षा अभ्यर्थियों, कर्मचारियों और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े आम जनता के सीधे सवाल सरकार तक नहीं पहुंच पाते।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. संसद की कार्यवाही चलने पर प्रति मिनट कितना खर्च आता है?\nवर्ष 2012 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार संसद चलाने में प्रति मिनट लगभग 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं, हालांकि वर्तमान महंगाई के हिसाब से यह वास्तविक खर्च काफी अधिक हो चुका है।\n\n2. संसदीय व्यवधान से वित्तीय नुकसान के अलावा और क्या बड़ा नुकसान होता है?\nपैसे के नुकसान से भी बड़ा नुकसान प्रश्नकाल का रद्द होना, विधेयकों पर बिना चर्चा पास होना और सरकार की नीतिगत जवाबदेही का कमज़ोर पड़ना है।\n\n3. प्रश्नकाल क्या होता है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?\nप्रश्नकाल वह समय होता है जब सांसद विभिन्न मंत्रालयों के मंत्रियों से सीधे नीतिगत सवाल और मौखिक प्रतिप्रश्न पूछकर सरकार को जवाबदेह ठहराते हैं।\n\n4. 2025 के मॉनसून सत्र के शुरुआती दिनों में कितना नुकसान आंका गया था?\nशुरुआती तीन दिनों में लोकसभा के 1,026 मिनट और राज्यसभा के 816 मिनट बर्बाद होने से करीब 23 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज किया गया था।\n\n5. क्या संसद की समितियां सदन की बहस की जगह ले सकती हैं?\nनहीं, समितियां कानून की तकनीकी जांच तो कर सकती हैं, लेकिन विधेयक पारित करने और खुली बहस करने का संवैधानिक दायित्व सदन के सांसदों का ही होता है।\n\n6. संसदीय सत्र के दौरान विपक्ष ने किन मुख्य मुद्दों पर चर्चा की मांग की थी?\nविपक्ष ने नीट परीक्षा विवाद, प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई और राम मंदिर दान घोटाले जैसे मुद्दों पर चर्चा की मांग रखी थी।",
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  "publishedAt": "2026-08-13",
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