महाराष्ट्र में मराठी अनिवार्यता और रोजी-रोटी का संकट: नेताओं को उत्तर प्रदेश और बिहार के कामगारों से क्यों होती है दिक्कत महाराष्ट्र सरकार द्वारा ऑटो और कैब चालकों के लिए मराठी भाषा की जानकारी अनिवार्य किए जाने के बाद देश में पहचान की राजनीति और प्रवासियों के अधिकारों को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है। महाराष्ट्र सरकार की तरफ से ऑटो, टैक्सी और ऐप-बेस्ड कैब चालकों के लिए मराठी भाषा की बुनियादी जानकारी को अनिवार्य बनाए जाने का मामला अब अदालत तक पहुंच चुका है। इस नए सरकारी आदेश के लागू होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि क्या कोई भी हुकूमत जीविका और पेशे से जुड़े मामलों को भाषा और क्षेत्रवाद की राजनीति से जोड़ सकती है। इस फैसले के खिलाफ चार कैब चालकों ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि इस तरह की भाषाई शर्तों की वजह से देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लाखों चालकों की रोजी-रोटी सीधे तौर पर खतरे में पड़ जाएगी। भाषा का सम्मान बनाम रोजगार की शर्त यह पूरा विवाद सिर्फ एक भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में एक बहुत बड़ा मानवीय सवाल है। सवाल यह है कि क्या किसी राज्य में अपनी मेहनत के दम पर जीवन बसर करने वाले व्यक्ति की योग्यता और क्षमता का आकलन उसकी भाषा के आधार पर किया जाना चाहिए? क्या किसी भी ऑटो या टैक्सी चालक का मुख्य उद्देश्य यात्रियों को सुरक्षित उनके गंतव्य स्थान तक पहुंचाना है या फिर किसी खास भाषा की परीक्षा में पास होना है? किसी भी समाज में भाषा उसकी पहचान, संस्कृति और गौरव का जीवंत हिस्सा होती है। मराठी भाषा का पूरा सम्मान होना ठीक उसी तरह जरूरी है जैसे हिंदी, तमिल, बंगाली, पंजाबी, भोजपुरी या देश की किसी भी अन्य भारतीय भाषा का होता है। लेकिन भाषा का आदर करना और भाषा के नाम पर रोजगार के रास्ते में दीवारें खड़ी करना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। पहचान की राजनीति और लाखों परमिटों का संकट दायर की गई याचिका में यह बात सामने आई है कि महाराष्ट्र के भीतर लगभग 9.65 लाख ऑटो-रिक्शा और टैक्सी परमिट तथा बैज जारी किए गए हैं। इसका साफ मतलब यह है कि यह कोई मामूली प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर राज्य में काम कर रहे लाखों परिवारों पर पड़ेगा। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इनमें से अधिकांश लोग गरीब तबके से आते हैं और प्रवासी मजदूर हैं। अगर भाषा की शर्त को पूरा न कर पाने की स्थिति में चालकों के बैज निलंबित किए जाते हैं या उनके परमिट रद्द किए जाते हैं, तो यह लड़ाई सिर्फ मराठी सीखने की नहीं रह जाएगी, बल्कि यह हर परिवार की दो वक्त की रोटी का गंभीर सवाल बन जाएगी। हिंदी भाषियों को क्यों बनाया जाता है निशाना महाराष्ट्र की राजनीति में उत्तर प्रदेश और बिहार यानी हिंदी भाषियों और मराठी अस्मिता की राजनीति करने वाले दलों से अब यह सीधा सवाल पूछना अनिवार्य हो गया है कि उन्हें यूपी और बिहार का इंसान इतना क्यों खटकता है? क्यों किसी प्रवासी की पहचान सामने आते ही राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ जाता है? क्यों मुंबई, पुणे, ठाणे या राज्य के अन्य शहरों में खून-पसीना एक करने वाला मेहनतकश अचानक बाहरी करार दे दिया जाता है? जब वह व्यक्ति सुबह सवेरे उठकर अपनी गाड़ी सड़क पर उतारता है, तो वह किसी का हक नहीं छीन रहा होता है, बल्कि वह अपनी ईमानदारी की मेहनत बेचकर अपने परिवार के लिए कमाई कर रहा होता है। श्रम और पूंजी का लेन-देन उत्तर प्रदेश या बिहार से आने वाला कोई भी व्यक्ति महाराष्ट्र पर किसी तरह का एहसान नहीं कर रहा है, और न ही महाराष्ट्र उस पर कोई उपकार कर रहा है। यह विशुद्ध रूप से श्रम और अवसर का एक स्वाभाविक लेन-देन है। जहां रोजगार के साधन होते हैं, वहीं श्रमिक पहुंचते हैं, और जहां श्रमिक पहुंचते हैं, वहीं शहर गतिमान होते हैं। भारत का संपूर्ण आर्थिक इतिहास इसी मानवीय आवाजाही की नींव पर खड़ा हुआ है। अगर मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी का दर्जा मिला है, तो उसके पीछे केवल बड़ी कंपनियां, शेयर बाजार और ऊंची इमारतें नहीं हैं, बल्कि इस शहर को अपनी मेहनत से सींचने वाले वे लाखों कामगार हैं जो दूर-दराज के राज्यों से यहां पहुंचे हैं। राजनीतिक फायदे का आसान फॉर्मूला अपना राजनीतिक एजेंडा साधने का सबसे सरल और पुराना तरीका यही है कि समाज के लोगों को हम और वे के खेमों में बांट दिया जाए। हम स्थानीय हैं और वे बाहरी हैं, हमारी भाषा अलग है और उनकी भाषा अलग है। अगर इतने से भी बात न बने तो यह प्रचारित कर दिया जाता है कि हमारे रोजगार पर हिंदी भाषियों का कब्जा हो गया है। राजनीति के लिए यह बहुत ही सुविधाजनक फॉर्मूला है क्योंकि इसके जरिए जनता की असल समस्याओं से ध्यान भटकाया जा सकता है। रोजगार क्यों नहीं बढ़ रहे हैं, छोटे कारोबार क्यों संकट में हैं, शहरों में मकानों का किराया क्यों आसमान छू रहा है, सार्वजनिक परिवहन की स्थिति क्यों खराब है, इन बुनियादी सवालों के जवाब देने के लिए नेताओं को मेहनत करनी पड़ती है। इसके विपरीत, किसी बाहरी व्यक्ति को तमाम परेशानियों के लिए जिम्मेदार ठहरा देना सबसे आसान रास्ता होता है। सांविधानिक अधिकार और प्रवासियों की स्थिति उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को निशाना बनाना इसलिए भी आसान होता है क्योंकि वे अक्सर किसी संगठित राजनीतिक ताकत के रूप में खड़े नजर नहीं आते हैं। वे अपने घरों से सैकड़ों मील दूर केवल अपनी आजीविका चलाने के लिए आते हैं और उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता अपने परिवार का भरण-पोषण करना होती है। ऐसे भोले-भाले लोगों को बाहरी बताकर राजनीति करना बहुत आसान काम है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि भारत ऐसा देश नहीं है जहां नागरिकों की रोजी-रोटी उनकी जन्मभूमि की सीमाओं से बांध दी जाए। देश का संविधान हर नागरिक को भारत के किसी भी भूभाग पर निवास करने और अपनी पसंद का कोई भी व्यवसाय चुनने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। इसका आप पर असर • भारत में: देश के किसी भी राज्य में काम करने और आजीविका कमाने के संवैधानिक अधिकारों को लेकर यह बहस पूरे देश के प्रवासियों और श्रमिकों पर सीधा असर डालती है। • महाराष्ट्र में: राज्य में ऑटो, टैक्सी और कैब चलाने वाले लाखों ड्राइवरों के लिए भाषा की अनिवार्य शर्त से उनके परमिट और रोजगार पर सीधा संकट मंडरा रहा है। सवाल-जवाब 1. महाराष्ट्र सरकार ने कैब चालकों के लिए क्या नया नियम बनाया है? महाराष्ट्र सरकार ने ऑटो, टैक्सी और ऐप-बेस्ड कैब चलाने वाले ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा की बुनियादी जानकारी होना अनिवार्य कर दिया है। 2. इस नए फैसले के खिलाफ किसने कानूनी कदम उठाया है? इस सरकारी फैसले के खिलाफ चार कैब चालकों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इसे चुनौती दी है। 3. याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील क्या है? याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि भाषा की इस शर्त के कारण राज्य के लाखों ड्राइवरों की आजीविका और उनके परिवारों की रोजी-रोटी खतरे में पड़ जाएगी। 4. महाराष्ट्र में कुल कितने ऑटो और टैक्सी परमिट जारी किए गए हैं? याचिका के अनुसार महाराष्ट्र में लगभग 9.65 लाख ऑटो-रिक्शा और टैक्सी परमिट और बैज जारी किए गए हैं। https://trendkia.com/politics/maharashtra-men-marathi-anivaryata-aura-roji-roti-ka-snkata-netaon-ko-uttar-pradesh-aura-bihar-ke-kamagaron-se-kyon-hoti-hai-dikka-21999 TrendKia — Har trend, sabse pehle.