# मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को फिर पार्टी से निकाला, राजनीतिक भविष्य और बसपा की रणनीति पर गहरी बहस

> बसपा सुप्रीमों मायावती ने एक बार फिर अपने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से बाहर कर दिया है। एक टीवी चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों ने इस फैसले, उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरणों और पार्टी के गिरते हुए वोट शेयर पर विस्तार से बात की।

**Type:** article · **Category:** राजनीति · **Published:** 2026-09-10 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/politics/mayawati-ne-bhatije-akash-anand-ko-phira-parti-se-nikala-rajanitika-bhavishya-aura-bsp-ki-rananiti-para-gahari-bahasa-31103 · **Language:** Hindi
**Tags:** मायावती, आकाश आनंद, बसपा, उत्तर प्रदेश राजनीति, कांशीराम, सपा, दलित राजनीति

बहुजन समाज पार्टी की राजनीति में एक बार फिर बड़ा फेरबदल देखने को मिला है, जब पार्टी सुप्रीमो मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को दोबारा पार्टी से निष्कासित कर दिया है। इस कार्रवाई से पहले आकाश को उनकी जिम्मेदारियां और पद लौटाने के एवज में एक शर्त सौंपी गई थी। हालांकि तय शर्त पूरी होने के बाद भी यह अप्रत्याशित कदम उठाया गया, जिसके पीछे संगठन और परिवार के भीतर जारी अंदरूनी कलह को मुख्य वजह बताया जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम और उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में चल रही हलचल पर एक विशेष टीवी चर्चा आयोजित की गई।

 

## चुनावी समीकरण और राजनीतिक दलों पर असर

चर्चा के दौरान राजनीतिक जानकारों ने इस बात पर रोशनी डाली कि उत्तर प्रदेश की सियासत में आज भी मायावती और उनकी पार्टी का प्रभाव पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता है। विश्लेषकों के अनुसार, यदि मायावती पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में पूरी ताकत और मजबूती के साथ उतरती हैं, तो इसका सबसे बड़ा सियासी नुकसान समाजवादी पार्टी को उठाना पड़ सकता है। इसके विपरीत, यदि पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में पार्टी का जनाधार मजबूत होता है, तो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की मुश्किलें काफी हद तक बढ़ सकती हैं। यही वजह है कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बसपा की सक्रियता और चुनावी रणनीतियों के मायने भी पूरी तरह से भिन्न नजर आते हैं।

 

## गठबंधन का इतिहास और ऐतिहासिक मोड़

बहुजन समाज पार्टी की नींव संस्थापक कांशीराम द्वारा एक बड़े सामाजिक मिशन के रूप में रखी गई थी। उन्होंने डीएस फोर और अन्य संगठनों के माध्यम से जमीन पर कैडर तैयार किया और घर-घर जाकर अपने विचारों का प्रचार किया। इसी कड़ी में साल 1993 के दौरान समाजवादी पार्टी के साथ एक प्री-पोल गठबंधन अस्तित्व में आया। उस वक्त दलितों और पिछड़े वर्गों का एक बहुत बड़ा राजनीतिक समीकरण तैयार हुआ था, हालांकि इसके बावजूद दोनों ही दल मिलकर पूर्ण बहुमत के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाए थे। इसके बाद के वर्षों में पार्टी ने कांग्रेस के साथ भी हाथ मिलाया। लेकिन चर्चित गेस्ट हाउस कांड की घटना के बाद दोनों प्रमुख दलों के संबंधों में हमेशा के लिए गहरी खटास आ गई। इसके काफी लंबे समय बाद साल 2019 में सपा और बसपा ने एक बार फिर हाथ मिलाया, मगर तब तक सूबे की राजनीतिक परिस्थितियां और समीकरण पूरी तरह बदल चुके थे।

 

## नेतृत्व की कार्यशैली और गिरता वोट बैंक

मायावती के राजनीतिक सफर को लेकर अक्सर यह सवाल उठाया जाता रहा है कि संगठन में उनके साथ लंबे समय तक कोई भी वरिष्ठ नेता क्यों नहीं टिक पाया। इस चर्चा के दौरान कांशीराम के शुरुआती दौर के साथियों से लेकर बाद के कई प्रमुख नेताओं के नामों का जिक्र आया जो धीरे-धीरे पार्टी से दूर होते चले गए। इसके साथ ही पार्टी के भीतर कोऑर्डिनेटर व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया गया और तमाम फैसलों का केंद्रीकरण लगातार बढ़ता गया। हाल के चुनावी परिणामों पर नजर डालें तो पार्टी के वोट प्रतिशत में भारी गिरावट दर्ज की गई है। साल 2019 के आम चुनावों में पार्टी को लगभग 20 प्रतिशत वोट मिले थे, जो साल 2022 के विधानसभा चुनावों में घटकर करीब 13 प्रतिशत रह गए और साल 2024 के लोकसभा चुनावों में यह आंकड़ा लुढ़क कर लगभग साढ़े पांच प्रतिशत तक ही सिमट गया। विश्लेषकों का मानना है कि आज की तारीख में पार्टी के पास मुख्य तौर पर केवल जाटव वोट का कोर आधार बचा है, जबकि गैर-जाटव दलित मतदाता छिटककर दूसरे दलों के पाले में चले गए हैं।

 

## भविष्य की चुनौतियां और अन्य राज्यों में स्थिति

आकाश आनंद के राजनीतिक रुख को लेकर भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या वह कांशीराम के शुरुआती दौर की आक्रामक शैली और भाषा को वापस लाना चाहते हैं, जबकि मायावती सत्ता हासिल करने के लिए सर्वसमाज को साधने की रणनीति को ज्यादा कारगर मानती हैं। वर्ष 2007 में सर्वसमाज के सभी वर्गों को साथ जोड़कर ही पार्टी ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। जानकारों का कहना है कि इसके बावजूद बसपा की संभावनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। उत्तर प्रदेश के अलावा भी यह पार्टी राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तराखंड, हरियाणा और दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में अपने लिए वोट जुटाती रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में होने वाले चुनावों के दौरान पार्टी कई क्षेत्रों में मुकाबला त्रिकोणीय बनाने की कूव्वत रखती है, हालांकि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी किस प्रकार के उम्मीदवारों को मैदान में उतारती है और उनकी चुनावी लड़ने की शैली कैसी रहती है।

## इसका आप पर असर
बसपा के भीतर चल रहे घटनाक्रम और गिरते हुए वोट शेयर का सीधा असर राज्य के चुनावी समीकरणों और क्षेत्रीय दलों की रणनीति पर पड़ेगा।

- **भारत में:** राष्ट्रीय स्तर पर दलित मतदाताओं के बिखराव और क्षेत्रीय दलों के बीच गठजोड़ की राजनीति पर इसका गहरा असर पड़ता है। इससे देश के अन्य राज्यों में भी बहुजन राजनीति के नए समीकरण आकार ले सकते हैं।

- **उत्तर प्रदेश में:** राज्य के भीतर सपा और बीजेपी जैसे प्रमुख दलों को अपनी चुनावी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। बसपा के कमजोर होने से दलित वोटों को अपने पाले में खींचने के लिए सभी दलों के बीच होड़ तेज हो जाएगी।

## ऐसा क्यों हुआ
बसपा में इस ताज़ा उठापटक और बार-बार नेताओं के निष्कासन के पीछे पार्टी के भीतर बढ़ती आंतरिक खींचतान और नेतृत्व के केंद्रीकरण की प्रवृत्ति मुख्य वजह रही है।

- **फैसलों का केंद्रीकरण:** पार्टी के भीतर कोऑर्डिनेटर व्यवस्था के मजबूत होने और तमाम महत्वपूर्ण फैसले केंद्रीय नेतृत्व द्वारा लिए जाने से पुराने नेताओं की दूरी बढ़ती गई।

- **वोट बैंक में लगातार गिरावट:** साल 2019 के 20 प्रतिशत वोट शेयर से गिरकर साल 2024 में साढ़े पांच प्रतिशत तक पहुंचने के कारण पार्टी पर रणनीतिक बदलाव का दबाव बढ़ा।

- **रणनीतिक मतभेद:** सर्वसमाज को साथ लेकर चलने की स्थापित नीति और आक्रामक युवा राजनीति की शैली के बीच संतुलन बनाने को लेकर पार्टी के भीतर वैचारिक टकराव की स्थिति बनी रही।

## सवाल-जवाब

### 1. मायावती ने किसे पार्टी से निष्कासित किया है?
मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को एक बार फिर पार्टी से निष्कासित कर दिया है।

### 2. बसपा की स्थापना किसने की थी?
बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कांशीराम ने एक मिशन के रूप में की थी।

### 3. वर्ष 2019 के चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत कितना था?
वर्ष 2019 के आम चुनावों में बसपा को लगभग 20 प्रतिशत वोट मिला था।

### 4. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का वोट शेयर कितना रहा?
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का वोट शेयर गिरकर लगभग साढ़े पांच प्रतिशत तक पहुंच गया था।

### 5. बसपा और सपा का गठबंधन किस वर्ष हुआ था?
बसपा और सपा के बीच सबसे पहले 1993 में प्री-पोल गठबंधन हुआ था और बाद में 2019 में दोनों दलों ने फिर हाथ मिलाया।

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