मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग के सवाल पर बोले लोकसभा स्पीकर ओम बिरला, कानूनी प्रक्रिया से ही होगी हर कार्रवाई लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव पर स्पष्ट किया है कि कोई भी नई अर्जी आने पर तय नियमों के अनुसार ही कदम उठाया जाएगा। इसके अलावा उन्होंने ब्रिक्स संसदीय मंच की बैठक, महिला आरक्षण और टीएमसी के बागी सांसदों के मामलों पर भी अपनी बात रखी। नई दिल्ली में आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की सुगबुगाहट पर बड़ा बयान दिया है। विपक्षी दलों और विभिन्न प्रेशर ग्रुप्स की ओर से लगातार यह मांग की जा रही है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाया जाए। इस सिलसिले में संसद के आगामी सत्रों में एक बार फिर से महाभियोग प्रस्ताव लाए जाने की पूरी तैयारी चल रही है। इन तमाम राजनीतिक सरगर्मियों के बीच संसद के मुखिया ने यह साफ कर दिया है कि यदि विपक्ष की तरफ से कोई नया महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जाता है, तो पूरी कार्रवाई स्थापित नियमों और प्रावधानों के तहत ही आगे बढ़ाई जाएगी। संवैधानिक प्रावधानों और जजों जैसी प्रक्रिया का जिक्र अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि जिस तरह देश की न्यायपालिका में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने के लिए बेहद कड़ी और स्पष्ट संवैधानिक व्यवस्था तय की गई है, उसी प्रकार मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए भी नियम अत्यंत कठोर और निश्चित हैं। विपक्ष का मुख्य आरोप यह है कि मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन अभियान के दौरान शक्तियों का एकतरफा और मनमाना इस्तेमाल किया गया है। इसी बात से नाराज होकर विपक्षी दलों का एक प्रतिनिधिमंडल देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से भी मुलाकात कर चुका है और एक औपचारिक ज्ञापन सौंपकर तत्काल कार्रवाई की मांग रख चुका है। ब्रिक्स मंच और अन्य अहम सियासी मुद्दों पर चर्चा नई दिल्ली में शुरू होने जा रहे 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच की बैठक से ठीक पहले बुलाई गई इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में ओम बिरला ने केवल चुनाव आयोग तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि संसद के सत्रावसान, महिला आरक्षण के विशेष सत्र की संभावनाओं और तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों से जुड़े अयोग्यता के मामलों पर भी खुलकर अपनी बात रखी। देश की राजधानी में होने वाले इस दो दिवसीय आयोजन में आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर वैश्विक विषयों पर आम सहमति बनाने और एक साझा घोषणापत्र जारी करने की पूरी उम्मीद जताई गई है। भारत के रुख को स्पष्ट करते हुए यह भी बताया गया कि वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ देश की नीति हमेशा से अडिग रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की जटिल प्रक्रिया भारतीय संसद के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने की पूरी प्रक्रिया को बेहद जटिल और कड़ा माना जाता है। देश के संविधान में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए हटाया जा सकता है जो सुप्रीम कोर्ट के किसी जज के महाभियोग के लिए निर्धारित की गई है। पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान ओम बिरला ने इस प्रक्रिया की पुष्टि करते हुए कहा कि जब कभी सदन में ऐसा कोई प्रस्ताव आधिकारिक तौर पर पेश किया जाएगा, तब कार्यालय द्वारा निर्धारित नियमों का पूरी तरह पालन किया जाएगा। कानूनी रूप से देखें तो मुख्य चुनाव आयुक्त या आयोग के अन्य सदस्य देश के राष्ट्रपति को अपना लिखित इस्तीफा सौंपकर भी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकते हैं, लेकिन विपक्षी दल इस संवैधानिक रास्ते के बजाय संसद के माध्यम से महाभियोग का दबाव बनाने पर जोर दे रहे हैं। चुनाव आयोग के आसपास मचे इस भारी सियासी घमासान के बीच लोकसभा अध्यक्ष का यह बयान काफी अहम माना जा रहा है कि यदि नोटिस प्राप्त होता है तो उसे पूरी तरह नियमों के दायरे में परखा जाएगा। वोटर लिस्ट रिवीजन विवाद और विपक्ष के अब तक के कदम विपक्षी दलों की ओर से ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन का सिलसिला जारी है। राष्ट्रपति से मिलने वाले प्रतिनिधिमंडल ने ज्ञापन के माध्यम से न केवल मुख्य चुनाव आयुक्त को तुरंत हटाने की गुहार लगाई थी, बल्कि उस कानून को भी पूरी तरह से रद्द करने की मांग की थी जो 2023 में चुनाव आयुक्तों को विशेष कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। विपक्ष का यह लगातार यह आरोप रहा है कि विशेष गहन संशोधन प्रक्रिया के दौरान नियमों की अनदेखी हुई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार विपक्ष अब तक ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए दो अलग-अलग प्रयास कर चुका है। पहले चरण में जो नोटिस दिए गए थे, उन्हें लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही सदनों में खारिज किया जा चुका है। वहीं दूसरी तरफ लाए गए नोटिस अभी भी विचारणीय अवस्था में लंबित हैं। इसके बावजूद विपक्ष इस मुद्दे को शांत होने देने के मूड में नहीं है और आगामी संसद सत्र में इसे फिर से पूरी ताकत के साथ उठाने की तैयारी कर रहा है। महिला आरक्षण और सत्र बुलाने की अटकलें राजनीतिक गलियारों में इन दिनों इस बात की चर्चा बहुत जोर पकड़ रही है कि केंद्र सरकार विधायिका के भीतर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने के वास्ते संसद का कोई विशेष सत्र आहूत कर सकती है। इस चर्चा के दायरे में 131वें संविधान संशोधन विधेयक और परिसीमन से जुड़े बिलों को पारित कराए जाने की अटकलें भी लगाई जा रही हैं। हालांकि, जब इस संदर्भ में लोकसभा अध्यक्ष से सीधा सवाल पूछा गया तो उन्होंने किसी भी तरह की सीधी टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पिछला मानसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकालीन अवधि के लिए स्थगित कर दिया गया था, लेकिन उस सत्र का औपचारिक सत्रावसान अभी तक संपन्न नहीं हुआ है। इस विषय पर स्थिति स्पष्ट करते हुए स्पीकर ने बताया कि सत्र के स्थगन और उसके अंतिम सत्रावसान के बीच लंबा अंतराल रहना कोई नई बात नहीं है और इसके इतिहास में कई पुराने उदाहरण पहले से ही मौजूद हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि संविधान का अनुच्छेद 85 सदन के सत्रावसान से जुड़े सभी नियमों को बेहद स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। संविधान के अनुच्छेद 85 के तहत नियम और प्रावधान देश का संविधान अपने अनुच्छेद 85 के माध्यम से राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान करता है कि वे मंत्रिपरिषद की सलाह पर संसद के किसी भी सदन को आहत कर सकते हैं, उसका सत्रावसान कर सकते हैं या फिर लोकसभा को भंग करने का आदेश दे सकते हैं। इस संवैधानिक नियम के अनुसार संसद के किन्हीं भी दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का गैप नहीं होना चाहिए, हालांकि यह अनुच्छेद सत्रावसान के लिए कोई निश्चित या पाबंद समयसीमा तय नहीं करता है। संसदीय प्रक्रियाओं के जानकारों का ऐसा मानना है कि सरकार की ओर से एक पूर्ण सत्र की विधिवत शुरुआत करने के लिए कम से कम 15 दिन पहले नोटिस देना अनिवार्य होता है, जबकि किसी भी विशेष सत्र के आयोजन के वास्ते न्यूनतम तीन दिन का नोटिस पर्याप्त माना जाता है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी हाल ही में यह बात दोहराई थी कि अतीत में ऐसे कई अवसर आए हैं जब दोनों सदनों का लगातार 87 दिनों तक औपचारिक सत्रावसान नहीं किया गया था। तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों की सदस्यता का मामला तृणमूल कांग्रेस पार्टी से बगावत करने वाले कुछ सांसदों की सदस्यता के विवाद पर भी लोकसभा अध्यक्ष ने अपनी स्थिति पूरी तरह साफ कर दी है। ये बागी सांसद अपनी मूल पार्टी से अलग होकर एक नए पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया का दामन थाम चुके हैं। इस घटनाक्रम के बाद अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी के एक मजबूत धड़े की ओर से इन सभी बागी सांसदों को संसद की सदस्यता से अयोग्य घोषित किए जाने की औपचारिक याचिका दाखिल की गई थी। पार्टी का मुख्य तर्क यह है कि अपनी मर्जी से किसी अन्य राजनीतिक दल का दामन थामना स्वेच्छा से अपनी मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ने के समान ही है। इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए ओम बिरला ने बताया कि इन तमाम याचिकाओं पर अदालतों में भी कानूनी सुनवाई चल रही है और साथ ही उनके अपने कार्यालय के विचारक्षेत्र में भी यह मामला विचाराधीन है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जा रही हैं और विधिवत कार्रवाई लगातार जारी है। जैसे ही संबंधित पक्षों की ओर से अंतिम जवाब प्राप्त हो जाएगा, इस पूरी प्रशासनिक और विधायी प्रक्रिया को तेजी के साथ आगे बढ़ाया जाएगा। इसका आप पर असर संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े विवादों का सीधा असर देश की प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता पर पड़ता है। • राष्ट्रीय स्तर पर: देश भर के नागरिकों और मतदाताओं के लिए यह बहस चुनावी संस्थाओं की स्वायत्तता और मतदाता सूची संशोधन की पारदर्शिता से जुड़ी है, जिससे लोकतांत्रिक प्रणाली में भरोसा प्रभावित होता है। • दिल्ली में: राजनीतिक गतिविधियों और संसद परिसर के आसपास सुरक्षा व्यवस्था, राजनीतिक बैठकों तथा वीआईपी दौरों के कारण यातायात और स्थानीय प्रशासनिक सतर्कता बढ़ जाती है। ऐसा क्यों हुआ मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की मांग और राजनीतिक गतिरोध मुख्य रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन के दौरान उठाए गए प्रशासनिक कदमों और विपक्ष के असंतोष के कारण उत्पन्न हुआ है। • मतदाता सूची विवाद: विपक्ष का यह मुख्य आरोप है कि वोटर लिस्ट के विशेष संशोधन के दौरान शक्तियों का एकतरफा और मनमाना इस्तेमाल किया गया, जिससे राजनीतिक टकराव बढ़ा। • संवैधानिक प्रक्रिया: मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के नियम सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समान बेहद कड़े और जटिल हैं, जिसके कारण हर कार्रवाई तय कानूनी दायरे में होनी अनिवार्य है। • राजनीतिक ध्रुवीकरण: विपक्षी दलों द्वारा राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपने और संसद के भीतर लगातार दबाव बनाने से यह मुद्दा तूल पकड़ता जा रहा है। सवाल-जवाब 1. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष क्या मांग कर रहा है? विपक्ष मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन में मनमानी का आरोप लगाकर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग कर रहा है और संसद में महाभियोग लाने की तैयारी में है। 2. लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने महाभियोग प्रस्ताव पर क्या प्रतिक्रिया दी है? स्पीकर ओम बिरला ने स्पष्ट किया है कि यदि विपक्ष कोई नया महाभियोग प्रस्ताव लाता है, तो तय नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही कार्रवाई की जाएगी। 3. मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया किसके समान है? संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जो सुप्रीम कोर्ट के जज पर महाभियोग चलाने के लिए तय है। 4. विपक्षी दलों ने इस मामले में किससे मुलाकात की थी? विपक्षी दलों के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा था और ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की थी। 5. भारत किस अंतरराष्ट्रीय मंच की मेजबानी करने जा रहा है? भारत 26 अक्टूबर से शुरू होने वाले 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच की मेजबानी कर रहा है। 6. तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों के खिलाफ क्या कदम उठाया गया है? टीएमसी के बागी सांसदों द्वारा एक अन्य दल में शामिल होने के बाद उनके खिलाफ सदस्यता रद्द करने की याचिका लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष विचाराधीन है। https://trendkia.com/politics/mukhya-chunava-ayukta-para-mahabhiyoga-ke-savala-para-bole-lokasabha-spikara-om-birla-kanuni-prakriya-se-hi-hogi-hara-karravai-50686 TrendKia — Har trend, sabse pehle.