# नागपुर में करारी हार के बाद शरद पवार को अपने पाले में लाने की तैयारी में जुटी भाजपा

> महाराष्ट्र विधान परिषद चुनावों में अप्रत्याशित हार और राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष के कड़े तेवर के बीच भाजपा ने वयोवृद्ध नेता शरद पवार के साथ सियासी नजदीकी बढ़ाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। पार्टी का मकसद आगामी विधायी चुनौतियों से पार पाना और कांग्रेस के बढ़ते असर पर लगाम लगाना है।

**Type:** article · **Category:** राजनीति · **Published:** 2026-11-08 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/politics/nagapura-men-karari-hara-ke-bada-sharada-pavara-ko-apane-pale-men-lane-ki-taiyari-men-juti-bhajapa-57824 · **Language:** Hindi
**Tags:** शरद पवार, भाजपा, नागपुर चुनाव, महाराष्ट्र राजनीति, एनसीपी, विधान परिषद, महिला आरक्षण, संसद

महाराष्ट्र में विधान परिषद चुनावों के दौरान कुछ सीटों पर मिली अप्रत्याशित हार और राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष के आक्रामक तेवरों के बीच भारतीय जनता पार्टी एक बड़ा राजनीतिक दांव खेलने की तैयारी में जुटी है। पार्टी महाराष्ट्र की राजनीति के मझे हुए खिलाड़ी और वयोवृद्ध नेता शरद पवार को फिर से अपने साथ जोड़ने की दिशा में सक्रिय हो गई है। पार्टी की मुख्य रणनीति महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों को संसद से आसानी से पारित कराने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाना है। इसी कड़ी में एनसीपी के दोनों गुटों के संभावित विलय और लोकसभा में एनसीपी (शरद पवार) धड़े के सांसदों को अपने समर्थन में लाने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं।

## रणनीति के पीछे की दो मुख्य वजहें
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा की इस नई चाल के पीछे दो सबसे बड़े कारण छिपे हुए हैं। पहला कारण संसद के आगामी सत्रों में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों को कानून का रूप देने के लिए पर्याप्त संख्या बल हासिल करना है। दूसरा कारण महाराष्ट्र के भीतर कांग्रेस पार्टी के लगातार मजबूत होते राजनीतिक प्रभाव को रोकना और क्षेत्रीय क्षत्रपों को साथ लाकर अपनी स्थिति मजबूत करना है। इन दोनों ही मोर्चों पर शरद पवार की भूमिका भाजपा के लिए बेहद निर्णायक साबित हो सकती है। भाजपा के रणनीतिकार इस समय एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के कुल आठ लोकसभा सांसदों पर खास नजर बनाए हुए हैं। पार्टी का मानना है कि इन सांसदों का साथ मिलना अहम विधायी प्रस्तावों के गणित को पूरी तरह पक्ष में कर सकता है। यही कारण है कि वैचारिक मतभेदों को फिलहाल पीछे छोड़कर क्षेत्रीय दलों के साथ बातचीत के नए रास्ते तलाशे जा रहे हैं।

## संसद में संख्या बल का पूरा गणित
नियमों के मुताबिक लोकसभा में इस प्रकार के विशेष विधेयकों को पास कराने के लिए कम से कम दो-तिहाई बहुमत की सख्त आवश्यकता होती है। इससे पहले जब संसद का विशेष सत्र बुलाया गया था, तब इस विधेयक के पक्ष में कुल 298 सांसदों ने वोट डाला था जबकि 230 सदस्यों ने इसका विरोध किया था। जरूरी दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े तक न पहुंच पाने के कारण वह विधेयक उस समय पारित नहीं हो सका था। इस बाधा को पार करने के लिए सरकार पहले ही टीएमसी और शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के कई सांसदों को एनडीए के पाले में लाने में कामयाब रही है। अब सरकार की नजरें सीधे तौर पर एनसीपी के शरद पवार गुट और अन्य छोटे दलों के सांसदों पर टिकी हुई हैं ताकि भविष्य में किसी भी विधायी संकट से बचा जा सके।

## शीर्ष नेतृत्व स्तर पर बढ़ती सक्रियता
शरद पवार के साथ भाजपा के बढ़ते राजनीतिक संपर्कों के स्पष्ट संकेत हाल ही में घटी दो प्रमुख घटनाओं से मिले हैं। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अस्पताल में भर्ती चल रहे शरद पवार को खुद फोन करके उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली और उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना करते हुए आराम करने की सलाह दी। दूसरी तरफ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एनसीपी नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल से विशेष मुलाकात की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की मुलाकातों को महज औपचारिक शिष्टाचार नहीं कहा जा सकता है। महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में पहले से ही भाजपा और एनसीपी के समीकरणों में बदलाव की चर्चाएं गर्म थीं, और इन ताजा मुलाकातों ने एनसीपी के दोनों धड़ों के एक बार फिर से आपस में मिलने की अटकलों को और अधिक हवा दे दी है।

## कांग्रेस को घेरने की बड़ी राजनीतिक योजना
भाजपा की इस पूरी राजनीतिक कवायद का एक अन्य प्रमुख उद्देश्य कांग्रेस पार्टी को हर मोर्चे पर राजनीतिक रूप से घेरना भी है। पिछले कुछ समय से कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और कथित तौर पर वोट चोरी जैसे गंभीर मामलों को लेकर लगातार हमलावर रुख अपनाए हुए है। विपक्षी दलों के इस आक्रामक अभियान ने राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर चुनाव आयोग की निष्पक्षता और भूमिका को एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है। भाजपा ने भी कांग्रेस के इन हमलों का जवाब देने के लिए लोकतंत्र बचाओ जैसे अभियानों का सहारा लिया है, लेकिन पार्टी यह भली-भांति जानती है कि अकेले यह प्रयास नाकाफी साबित हो सकते हैं।

कांग्रेस के बढ़ते सियासी कदमों को रोकने के लिए क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर लाना या अपने पाले में करना अनिवार्य हो गया है। इसी समीकरण के चलते महाराष्ट्र में शरद पवार की राजनीतिक पकड़ और उनका प्रभाव अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। राज्य की राजनीति में उनका लंबा अनुभव और देश भर के विभिन्न दलों के नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध भाजपा के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं। सत्तारूढ़ दल को यह पूरा भरोसा है कि यदि क्षेत्रीय ताकतों के साथ बेहतर तालमेल बिठाया जा सके, तो इससे कांग्रेस के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को काफी हद तक सीमित किया जा सकता है।

## नागपुर के चुनावी नतीजों ने क्यों चौंकाया?
हाल ही में संपन्न हुए महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों के चुनावों ने भाजपा और उसके तमाम सहयोगियों की नींद उड़ा दी है। इन चुनावों के परिणामों में महाविकास अघाड़ी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए तीन सीटों पर कब्जा जमाया, जबकि सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन को केवल दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा। भाजपा के लिए इन नतीजों में सबसे बड़ा और गहरा झटका नागपुर में लगा, जो कि राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी दोनों का ही गृह क्षेत्र माना जाता है। इतना ही नहीं, यह वही स्थान है जहाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्य मुख्यालय भी स्थित है।

नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के कड़े मुकाबले में कांग्रेस पार्टी के मौजूदा विधान परिषद सदस्य अभिजीत वंजारी ने भाजपा के उम्मीदवार सुधाकर कोहले को चुनाव हरा दिया। चुनाव के अंतिम आंकड़ों के अनुसार अभिजीत वंजारी ने कुल 67,231 वोट हासिल किए, जबकि भाजपा के खाते में 63,960 वोट ही आ सके। इस प्रकार भाजपा को इस प्रतिष्ठित सीट पर करीब 3,271 मतों के अंतर से करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके उलट, दूसरी तरफ शरद पवार की पार्टी एनसीपी (एसपी) ने पुणे और छत्रपति संभाजीनगर की स्नातक निर्वाचन सीटों पर शानदार जीत दर्ज की। इन दोनों महत्वपूर्ण जीतों ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार का दबदबा और उनकी पैठ अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

## शरद पवार को साधना कितना आसान या कठिन?
राजनीतिक जानकारों द्वारा शरद पवार को हमेशा से महाराष्ट्र की राजनीति का चाणक्य कहा जाता रहा है। इसके पीछे केवल उनका लंबा और सुदीर्घ राजनीतिक अनुभव ही नहीं है, बल्कि बदलती हुई परिस्थितियों और समीकरणों के बीच भी अपनी प्रासंगिकता व भूमिका को बनाए रखने की उनकी अद्भुत कला है। अपने लंबे राजनीतिक सफर में वे कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े रहे, अपनी खुद की अलग पार्टी बनाई और समय-समय पर भाजपा तथा शिवसेना के साथ राजनीतिक अखाड़े में कड़ा मुकाबला भी किया।

वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि शरद पवार को अपने पाले में लाने की इस पूरी कोशिश के दौरान उसे एनसीपी के दोनों धड़ों के आंतरिक समीकरणों का भी पूरा ध्यान रखना होगा। पार्टी के कुछ अंदरूनी नेताओं का मानना है कि एनसीपी के कई वरिष्ठ नेता संगठन में अपनी भविष्य की भूमिका और अपनी राजनीतिक स्थिति को लेकर काफी बेचैन चल रहे हैं। ऐसे में वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले ये सभी नेता किसी सुरक्षित और स्थिर राजनीतिक ठिकाने या नेतृत्व की तलाश में हैं। हालांकि, इसके बावजूद यह कह पाना बहुत आसान नहीं है कि शरद पवार का अगला कदम क्या होगा, क्योंकि वे कांग्रेस नीत विपक्षी एकता की संभावनाओं को भी पूरी तरह से दरकिनार नहीं कर सकते हैं। कुल मिलाकर एक तरफ जहाँ भाजपा के पास सत्ता की ताकत और संसदीय संख्या बल का मजबूत गणित है, तो दूसरी तरफ पवार की अपनी सियासी चालें हैं।

## इसका आप पर असर
महाराष्ट्र की सियासत में इस बदलाव का असर आम नागरिकों और राज्य के राजनीतिक भविष्य पर सीधा पड़ेगा।

- **भारत में:** संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे बड़े विधेयकों के पारित होने का रास्ता साफ हो सकता है, जिससे देश भर के विधायी ढांचे में बदलाव आएंगे। राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय दलों के रुख से केंद्र सरकार की नीतियों को नया समर्थन मिल सकता है।
- **महाराष्ट्र में:** नागपुर और पुणे जैसे इलाकों में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलेंगे, जिससे स्थानीय विकास कार्यों और सत्ता के गलियारों में क्षेत्रीय नेताओं की पूछ बढ़ेगी। आगामी स्थानीय और विधानसभा चुनावों से पहले नागपुर और पुणे के मतदाताओं के सामने नए राजनीतिक विकल्प उभर सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
विधान परिषद चुनावों में अप्रत्याशित हार और विधायी आंकड़ों की कमी के चलते भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है।

- **संसदीय संख्या बल की कमी:** संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है, जो मौजूदा समय में अकेले एनडीए के पास पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
- **नागपुर में चुनावी झटका:** मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के गृह क्षेत्र नागपुर तथा आरएसएस मुख्यालय में हार ने पार्टी को विपक्षी एकजुटता के खिलाफ नए विकल्प तलाशने पर मजबूर किया।
- **कांग्रेस का बढ़ता प्रभाव:** चुनाव आयोग और मतदाता सूची के मुद्दों को लेकर कांग्रेस के आक्रामक रुख का मुकाबला करने के लिए क्षेत्रीय क्षत्रपों को साथ लाना जरूरी हो गया है।

## सवाल-जवाब

### 1. भाजपा शरद पवार को क्यों साधने की कोशिश कर रही है?
भाजपा संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों को पारित कराने के लिए जरूरी समर्थन जुटाना चाहती है और महाराष्ट्र में कांग्रेस के प्रभाव को रोकना चाहती है।

### 2. नागपुर विधान परिषद चुनाव में किसकी हार हुई?
नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले को कांग्रेस के अभिजीत वंजारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा।

### 3. संसद में विधेयक पास करने के लिए कितने समर्थन की जरूरत होती है?
लोकसभा में इस प्रकार के विशेष विधेयकों को पारित कराने के लिए कम से कम दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।

### 4. शरद पवार से हाल ही में किन बड़े नेताओं ने संपर्क किया है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अस्पताल में भर्ती शरद पवार को फोन किया और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली में एनसीपी नेताओं से मुलाकात की।

### 5. विधान परिषद चुनावों में महाविकास अघाड़ी को कितनी सीटें मिलीं?
महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों में से महाविकास अघाड़ी ने तीन सीटों पर जीत हासिल की।

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