# नामांकन रद्द होने पर कांग्रेस का अगला कदम: मीनाक्षी नटराजन के लिए हाईकोर्ट में चुनाव याचिका, समझिए पूरी कानूनी प्रक्रिया

> राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद पार्टी अब 45 दिन के भीतर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल करेगी। जानिए चुनाव याचिका क्या होती है, कौन और कब दायर कर सकता है और इसकी पूरी प्रक्रिया।

**Category:** राजनीति · **Published:** 2026-06-13 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/politics/namankana-radda-hone-para-kangresa-ka-agala-kadama-minakshi-natarajana-ke-lie-ha-461

## विवाद की जड़ क्या है
भोपाल में राज्यसभा चुनाव को लेकर एक कानूनी टकराव चर्चा का विषय बना हुआ है। कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द कर दिया गया और इसी के साथ BJP के उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गए। इस फैसले को सीधे चुनौती देने के लिए कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी, लेकिन शीर्ष अदालत ने रिट याचिका को स्वीकार करने के बजाय पार्टी को हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल करने की राह दिखाई। यानी मामला अब उसी दिशा में बढ़ रहा है, जो चुनावी विवादों के लिए कानून में तय की गई है।

## कांग्रेस की आपत्ति और दलीलें
कांग्रेस की योजना है कि वह अपने उम्मीदवार का नामांकन रद्द किए जाने के आदेश को तो चुनौती दे ही, साथ ही BJP उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने पर भी एतराज जताए। पार्टी प्रवक्ता भूपेंद्र गुप्ता का कहना है कि नामांकन रद्द होने का यह प्रकरण अब महज एक तकनीकी मसला नहीं, बल्कि संवैधानिक सवाल बन चुका है।

उनकी पहली दलील यह है कि नामांकन को सिर्फ एक फोटो कॉपी के आधार पर खारिज कर दिया गया, जबकि रिटर्निंग अफसर के पास ऐसा करने का अधिकार ही नहीं था। उनके मुताबिक अफसर अधिक से अधिक अपनी सिफारिश आयोग को भेज सकता था और अंतिम निर्णय आयोग को करना था — पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। दूसरी दलील यह है कि जो मामला किसी अदालत में लंबित ही नहीं था, उसे नामांकन रद्द करने का आधार बना दिया गया। गुप्ता के अनुसार, कांग्रेस इन दोनों बिंदुओं को लेकर अदालत के साथ-साथ जनता की अदालत में भी जाने की तैयारी कर चुकी है।

## चुनाव याचिका आखिर है क्या
कांग्रेस अब 45 दिनों के भीतर हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल करेगी। दरअसल चुनाव याचिका भारतीय चुनाव प्रणाली में वह कानूनी हथियार है, जिसके जरिए चुनाव के नतीजे या चुनाव से जुड़े किसी विवाद — जैसे नामांकन का रद्द होना, भ्रष्टाचार या कदाचार — को कानूनी रूप से चुनौती दी जाती है। यह याचिका जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) के तहत दायर होती है।

## संविधान और कानून क्या कहते हैं
कानूनी जानकार बताते हैं कि संविधान का अनुच्छेद 329 साफ कहता है कि संसद या राज्य विधानमंडल के चुनाव को केवल और केवल चुनाव याचिका के रास्ते ही चुनौती दी जा सकती है। चुनाव प्रक्रिया के बीच में सामान्य रिट याचिका (Writ Petition) के जरिए दखल नहीं दिया जा सकता। इससे जुड़े प्रावधान RPA 1951 की धारा 80 से 100 तक में दिए गए हैं। इन मामलों में उच्च न्यायालय (High Court) को मूल क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction) प्राप्त होता है। कुछ खास मामलों — जैसे राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के चुनाव — को छोड़कर यह याचिका सीधे सुप्रीम कोर्ट में नहीं लगाई जा सकती।

## याचिका कौन दायर कर सकता है
चुनाव याचिका दाखिल करने का अधिकार सीमित लोगों के पास होता है:

- कोई भी उम्मीदवार (Candidate), जो उस चुनाव में मैदान में था।
- कोई भी निर्वाचक (Elector) यानी ऐसा व्यक्ति जो उस चुनाव में मतदान का हकदार था — फिर चाहे उसने वोट डाला हो या नहीं।
- राजनीतिक दल भी अपने उम्मीदवार के जरिए याचिका दायर कर सकता है।

## दायर करने की समय सीमा
याचिका चुनाव परिणाम घोषित होने की तारीख से 45 दिनों के भीतर दाखिल करनी होती है। दिलचस्प बात यह है कि नामांकन रद्द होने या चुनाव से पहले के दूसरे मुद्दों के मामले में भी आमतौर पर याचिका परिणाम घोषित होने के बाद ही लगाई जाती है। तय समय सीमा बीत जाने पर याचिका खारिज हो सकती है। मीनाक्षी नटराजन प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने नामांकन रद्द किए जाने को चुनौती देने वाली रिट याचिका को इसीलिए खारिज किया और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव याचिका (Election Petition) दायर करने की सलाह दी, क्योंकि चुनाव प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और उसमें BJP उम्मीदवार निर्विरोध चुने जा चुके थे।

## याचिका कहां और किसके सामने
चुनाव याचिका संबंधित राज्य के हाई कोर्ट में दायर की जाती है। यहां मुख्य न्यायाधीश एक या एक से अधिक जजों को इसकी सुनवाई के लिए नियुक्त करते हैं, और आमतौर पर सिंगल जज की पीठ ही इस पर सुनवाई करती है।

## किन आधारों पर लड़ी जा सकती है याचिका
धारा 100 और 101 के तहत चुनाव याचिका मुख्य रूप से इन आधारों पर दायर की जा सकती है:

- नामांकन को गलत तरीके से स्वीकार या अस्वीकार करना — ठीक वैसा ही, जैसा मीनाक्षी नटराजन के मामले में नामांकन रद्द होने को लेकर कहा जा रहा है।
- भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practices), जिसमें रिश्वत, धमकी, जाति या धर्म के आधार पर वोट की अपील और फर्जी वोटिंग जैसी बातें शामिल हैं (धारा 123)।
- किसी अयोग्य उम्मीदवार का चुनाव जीत जाना।
- कोई और अवैध प्रभाव या चुनाव प्रक्रिया का उल्लंघन।
- चुनाव को शून्य (Void) घोषित कराने या नए सिरे से चुनाव कराने की मांग।

## याचिका में क्या-क्या होना जरूरी है
धारा 83 के मुताबिक याचिका में सामग्री तथ्य (Material Facts) होने चाहिए, यानी स्पष्ट और विस्तृत आरोप तथा उन्हें साबित करने वाले सबूत। इसके साथ याचिका में राहत (Relief) की मांग भी की जाती है — उदाहरण के तौर पर, याचिकाकर्ता को विजयी घोषित किए जाने की मांग।

## सुनवाई की प्रक्रिया कैसे चलती है
याचिका दाखिल होने के बाद सबसे पहले विपक्षी पक्ष को, यानी जिसके खिलाफ चुनौती दी गई है, नोटिस भेजा जाता है। इसके बाद वह लिखित जवाब (Written Statement) दाखिल करता है। फिर दस्तावेजों की खोज (Discovery) और जांच (Inspection) होती है, और उसके बाद मुद्दों का निर्धारण (Framing of Issues) किया जाता है।

समय सीमा को लेकर RPA की धारा 86(7) में यह कोशिश रखी गई है कि फैसला छह महीने के भीतर हो जाए, लेकिन हकीकत में कई मामले सालों तक खिंचते हैं। फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील (Appeal) का रास्ता खुला रहता है (धारा 116A)।

## आम मुकदमे से कितनी अलग
चुनाव याचिका काफी हद तक एक सिविल मुकदमे की तरह चलती है, पर इसमें सार्वजनिक हित (Public Interest) भी जुड़ा रहता है, इसलिए इसकी अहमियत बढ़ जाती है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश के मुताबिक फैसला केवल रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर ही होना चाहिए। और अगर याचिका में लगाए गए आरोप अस्पष्ट या बिना ठोस आधार के हों, तो उसे शुरुआत में ही खारिज भी किया जा सकता है।

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