नरेंद्र मोदी के बड़े फैसलों की अटकलें तेज, क्या 2029 तक आ सकता है वन नेशन-वन इलेक्शन? कॉफी पर कुरुक्षेत्र कार्यक्रम में राजनीतिक विश्लेषकों ने वन नेशन-वन इलेक्शन, परिसीमन, महिला आरक्षण और संभावित मंत्रिमंडल विस्तार जैसे बड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की। देश की राजनीति में इन दिनों बड़े बदलावों और फैसलों की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है। चर्चा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भविष्य में कुछ ऐसे कड़े और चौंकाने वाले कदम उठा सकते हैं जो भारतीय चुनावी और प्रशासनिक ढांचे को पूरी तरह बदल दें। इसी सिलसिले में सोमवार को संयुक्त संसदीय समिति की एक अहम बैठक आयोजित की गई, जिसमें प्रियंका गांधी और सुप्रिया सुले सहित विपक्ष के कई प्रमुख चेहरे शामिल हुए। इस गरमागरम माहौल के बीच राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम हो गई है कि बहुप्रतीक्षित वन नेशन-वन इलेक्शन की व्यवस्था निर्धारित समय से पहले यानी 2029 तक भी धरातल पर उतर सकती है। इसके साथ ही देश की प्रशासनिक सीमाओं के पुनर्निर्धारण यानी परिसीमन, महिला आरक्षण कानून और केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल की संभावनाओं को लेकर भी कयासों का दौर जारी है। इन सभी समसामयिक विषयों पर राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों ने एक विशेष मंच पर खुलकर मंथन किया। क्या 2029 तक लागू हो जाएगी एक देश-एक चुनाव की व्यवस्था? हाल ही में संपन्न हुई बैठकों और बहसों के दौरान मुख्य रूप से यह मुद्दा छाया रहा कि लोकसभा और देश भर की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की मूल योजना का आधिकारिक लक्ष्य भले ही 2034 तय किया गया हो, लेकिन परिस्थितियों के हिसाब से इसमें बदलाव भी संभव है। कयास लगाए जा रहे हैं कि कुछ राज्य अपनी विधानसभाओं का कार्यकाल या तो घटा सकते हैं या उसमें फेरबदल कर सकते हैं ताकि वे सीधे 2029 के आम चुनाव के साथ ही चुनावी मैदान में उतर सकें। जानकारों के अनुसार लगभग 10 से 14 राज्यों में इस बात की गुंजाइश बन सकती है कि उनके चुनाव 2029 के साथ जोड़ दिए जाएं, बशर्ते संबंधित राज्य राजनीतिक सहमति और व्यावहारिक स्थितियों का समर्थन करें। हालांकि इस रणनीति के रास्ते में कई व्यावहारिक और राजनीतिक अड़चनें भी हैं। चर्चा के दौरान विशेषज्ञों के पैनल ने यह सवाल भी उठाया कि क्या भाजपा या एनडीए गठबंधन शासित राज्य अपनी वर्तमान विधानसभा सरकारों का कार्यकाल स्वेच्छा से कम करना चाहेंगे। इसके पीछे का चुनावी गणित बेहद पेचیدہ हो सकता है। यदि रणनीतिकारों को यह महसूस होता है कि लोकसभा और विधानसभा के एक साथ चुनाव कराने से राजनीतिक लाभ मिल सकता है, तो इस पर जोर दिया जा सकता है। इसके विपरीत, यह भी रेखांकित किया गया कि एक ही मतदाता लोकसभा चुनाव में किसी खास पार्टी को चुन सकता है और उसी दिन विधानसभा चुनाव में उसका मतदान का रुझान बिल्कुल अलग हो सकता है। मतदाताओं के इस दोहरे व्यवहार के कारण इस पूरी रणनीति का परिणाम अनिश्चित बना हुआ है। परिसीमन और महिला आरक्षण पर विशेष चर्चा वन नेशन-वन इलेक्शन के अलावा देश की चुनावी राजनीति के दो अन्य सबसे बड़े स्तंभों, यानी परिसीमन और महिला आरक्षण पर भी गंभीर चर्चाएं सामने आई हैं। जानकारों का मानना है कि सरकार के एजेंडे में परिसीमन का विषय बेहद उच्च प्राथमिकता पर हो सकता है। यदि संसद के भीतर आवश्यक संख्या बल और समर्थन का गणित पूरी तरह फिट बैठता है, तो इस मसले को आगे बढ़ाने के लिए संसद का एक विशेष सत्र भी बुलाया जा सकता है। इस संदर्भ में यह दावा भी किया गया कि वर्तमान में सरकार के पास निचले सदन यानी लोकसभा में 366 सांसदों का मजबूत समर्थन हासिल है, जो बड़े विधायी फैसलों के लिए पर्याप्त माना जाता है। दूसरी तरफ, कांग्रेस नेता जयराम रमेश द्वारा संसद के सत्रावसान में हो रही देरी को लेकर हाल ही में चिंता जताई गई थी। उनके इस सवाल को सीधे तौर पर परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संभावित विधेयकों की अंदरखाने चल रही तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि विश्लेषकों का यह भी मानना है कि केवल सत्रावसान न होने भर से किसी विशेष और बड़े विधेयक के आने की पुष्टि नहीं होती। इसके अलावा, क्षेत्रीय दलों की राजनीति पर भी नजर डाली गई, जिसमें डीएमके के साथ किसी खास मुद्दे पर संभावित रणनीतिक सहयोग और एनसीपी के दोनों धड़ों के बीच एकता की राह में नेतृत्व को लेकर आ रही आंतरिक अड़चनों का जिक्र किया गया। मंत्रिमंडल विस्तार का सरप्राइज और राजनीतिक भविष्य इस पूरे मंथन के अंत में सबसे बड़ा आकर्षण संभावित केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर रहा, जिसे एक बड़े सरप्राइज के रूप में देखा जा रहा है। जानकारों के मुताबिक केंद्र सरकार जल्द ही अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल कर सकती है, हालांकि इस बात की पुख्ता जानकारी अभी सीमित है कि यह बदलाव कब होगा और इसमें किन नए चेहरों को जगह मिलेगी। पार्टी संगठन के स्तर पर विभिन्न राज्यों से संभावित और योग्य नेताओं के नामों की सूची पहले ही शीर्ष नेतृत्व को भेजे जाने की चर्चा है। इन तमाम राजनीतिक हलचलों के बीच आने वाले दिनों में देश की सियासत में बड़े और अप्रत्याशित घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं, जो आगामी चुनावों की दिशा तय करेंगे। ये भी पढ़ें- क्या निशाने पर लगी राहुल गांधी की 'पैलेट गन'? पूरी चर्चा यहाँ देखें योगी-अखिलेश की चुनावी पिच में बड़ा फर्क, विस्तार से समझें इसका आप पर असर भारत में: वन नेशन-वन इलेक्शन और परिसीमन जैसे बड़े नीतिगत बदलावों से देश की चुनावी प्रक्रिया, प्रशासनिक ढांचे और लोकसभा सीटों के समीकरण में दूरगामी फेरबदल हो सकता है। सवाल-जवाब 1. वन नेशन-वन इलेक्शन लागू करने का शुरुआती लक्ष्य क्या था? मौजूदा प्रस्ताव के तहत देश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने की दिशा में 2034 का लक्ष्य रखा गया था। 2. क्या 2029 तक भी वन नेशन-वन इलेक्शन आ सकता है? ऐसी रिपोर्ट्स और चर्चाएं सामने आई हैं कि कुछ राज्य अपनी विधानसभाओं का कार्यकाल बदलकर 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ चुनाव करा सकते हैं। 3. संसद में सरकार के पास लगभग कितने सांसदों का समर्थन होने का दावा किया गया है? चर्चा के दौरान लोकसभा में सरकार के पास 366 सांसदों के समर्थन का दावा किए जाने की बात सामने आई है। 4. किन प्रमुख मुद्दों पर हाल ही में जेपीसी की बैठक में चर्चा हुई? जेपीसी की बैठक में वन नेशन-वन इलेक्शन, परिसीमन, महिला आरक्षण और नए मंत्रिमंडल विस्तार जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई। https://trendkia.com/politics/narendra-modi-ke-bare-phaisalon-ki-atakalen-teja-kya-2029-taka-a-sakata-hai-vana-neshana-vana-ilekshana-21403 TrendKia — Har trend, sabse pehle.