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  "title": "पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के हिंदुओं पर दिए बयान पर जावेद अख्तर का तीखा तंज",
  "summary": "पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के हिंदुओं को लेकर दिए गए विवादित बयान पर जावेद अख्तर ने उनपर करारा हमला बोला है।",
  "content": "पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपने देश के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर एक ऐसा बयान दिया, जिस पर भारत में तीखी नाराजगी देखने को मिल रही है। आसिफ अली जरदारी ने अपने संबोधन में दावा किया था कि पाकिस्तान की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी देश के तीन से चार फीसदी हिंदू समुदाय को बर्दाश्त करती है और वहां हिंदू पूरी तरह से आजाद हैं। इस बयान के सामने आने के बाद मशहूर गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया के जरिए आसिफ अली जरदारी पर बड़ा तंज कसा और उन्हें मिस्टर दस परसेंट कहकर संबोधित किया। इसके अलावा इंटरनेट पर आम जनता ने भी इस बात पर सवाल उठाए कि पाकिस्तान में आधिकारिक रूप से हिंदू आबादी तीन फीसदी से भी कम है। लेकिन इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिस देश में अल्पसंख्यकों को अहसान के तौर पर बर्दाश्त करने की बात कही जाती है, क्या वहां खुद अपने देश के तमाम मुसलमानों को भी बराबरी, न्याय और सुरक्षा मिल पा रही है, क्योंकि जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।\n\nजरदारी के अखंड भारत वाले आरोप और आबादी का सच\nअपने भाषण के दौरान आसिफ अली जरदारी ने भारत पर निशाना साधते हुए कहा कि भारतीय लोग अखंड भारत की सोच में यकीन रखते हैं। इसके तुरंत बाद उन्होंने पाकिस्तान की मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी का जिक्र करते हुए यह अजीब तर्क दिया कि वही आबादी देश की हिंदू अल्पसंख्यकों को सहन करती है और वे वहां स्वतंत्र हैं। यहीं से पूरा विवाद शुरू हुआ। किसी भी लोकतांत्रिक ढांचे वाले देश में किसी नागरिक समुदाय को सिर्फ बर्दाश्त करने की बात करना अपने आप में गंभीर सवाल खड़े करता है। इससे ऐसा आभास होता है कि वह देश किसी संविधान या कानून से नहीं चल रहा है, बल्कि वहां नागरिकों के बुनियादी अधिकार किसी बहुसंख्यक वर्ग की दया या कृपा पर निर्भर हैं। इस पूरे मामले में एक तथ्यात्मक सुधार भी बेहद जरूरी है। पाकिस्तान की वर्ष 2023 की आधिकारिक जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि वहां हिंदू आबादी तीन या चार फीसदी नहीं, बल्कि मात्र 2.17 प्रतिशत है। इस जनगणना के मुताबिक पाकिस्तान में कुल हिंदुओं की संख्या लगभग बयावन लाख दर्ज की गई है।\n\nपाकिस्तान में क्या वाकई सभी मुसलमानों को मिलता है इंसाफ\nपाकिस्तान में धार्मिक, वैचारिक और राजनीतिक मोर्चे पर दबाव या भेदभाव झेलने वाले लोगों का दायरा सिर्फ हिंदुओं तक ही सीमित नहीं है। देश के शिया समुदाय के लोगों को भी भीषण आतंकी हमलों का सामना करना पड़ा है। इसी साल छह फरवरी को इस्लामाबाद की खदीजा तुल कुबरा मस्जिद में हुए एक भयानक आत्मघाती हमले में कम से कम इकतीस लोगों की जान चली गई थी और एक सौ सत्तर से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। उस खौफनाक हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली थी। इसके अलावा अहमदिया समुदाय की कानूनी और सामाजिक स्थिति तो सीधे तौर पर पाकिस्तान के संविधान से जुड़ी हुई है। वहां के संविधान के अनुच्छेद दो सौ साठ में अहमदियों को साफ तौर पर गैर-मुसलमान घोषित किया गया है। मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट्स बताती हैं कि वर्ष 2026 में भी अहमदियों के खिलाफ लगातार हिंसा हो रही है, उनकी धार्मिक गतिविधियों पर सख्त पाबंदियां हैं और उन्हें भारी भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ ही बलूचिस्तान प्रांत में जबरन लोगों का गायब होना और वहां के सुरक्षा बलों की तरफ से मानवाधिकारों का हनन लंबे समय से एक बहुत बड़ा और गंभीर मुद्दा बना हुआ है.\n\nबर्दाश्त करने की इस भाषा के पीछे छिपी असली हकीकत\nइस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि आखिर किस आधार पर यह कहा जा रहा है कि हिंदुओं को बर्दाश्त किया जा रहा है। यह स्थिति तब है जब न तो हिंदू समुदाय किसी तरह के अत्याचार में शामिल है और न ही उसने कभी देश के खिलाफ हाथ में हथियार उठाए हैं। बल्कि सच तो यह है कि वहां का हिंदू समुदाय अपनी बहू-बेटियों की इज्जत और सुरक्षा बचाने की जद्दोजहद में लगा रहता है। हालात यह हैं कि वहां के हिंदुओं को खुद नहीं पता कि उनका जीवन कितने दिनों का सुरक्षित है। ऐसे में यदि किसी राष्ट्र का सर्वोच्च राष्ट्रपति अपने ही देश के नागरिकों के लिए हम उन्हें बर्दाश्त करते हैं जैसी अपमानजनक और गैर-जिम्मेदाराना भाषा का इस्तेमाल करे, तो बहस केवल हिंदू आबादी के दो या तीन प्रतिशत होने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि देश के पूरे व्यवस्थागत ढांचे पर सवाल उठ खड़े होते हैं।\n\nजावेद अख्तर का तीखा तंज और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया\nआसिफ अली जरदारी की इस विवादास्पद टिप्पणी पर जाने-माने गीतकार जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कड़ा तंज कसते हुए उन्हें मिस्टर दस परसेंट के नाम से पुकारा। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि जरदारी अपने देश की तीन-चार फीसदी हिंदू आबादी को सहन करने की बात कर रहे हैं, जबकि वह खुद दस फीसदी से कम आबादी वाले लोगों के प्रति हमेशा से असंवेदनशील रहे हैं। जावेद अख्तर की इस बेबाक टिप्पणी ने इस पूरी बहस को सिर्फ भारत और पाकिस्तान के कूटनीतिक दायरे तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि पाकिस्तान के भीतर धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के बुनियादी सवालों को दुनिया के सामने लाकर रख दिया। जावेद अख्तर ने अपनी पोस्ट में इस बात का भी जिक्र किया कि पाकिस्तान के मिस्टर जरदारी, जो बेनजीर भुट्टो से शादी के बाद सार्वजनिक जीवन में आए थे, आज अल्पसंख्यकों को लेकर इस तरह की बातें कर रहे हैं। इस बयानबाजी ने पड़ोसी देश की आंतरिक व्यवस्था और वहां की सोच पर एक बार फिर से गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: यह बयान पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों की स्थिति और वहां की राजनीतिक बयानबाजी को लेकर लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।\n\nपाकिस्तान में: वहां रहने वाले हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के नागरिक अधिकारों तथा उनकी सुरक्षा को लेकर चिंताएं और बढ़ गई हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. आसिफ अली जरदारी ने क्या बयान दिया था?\nआसिफ अली जरदारी ने कहा था कि पाकिस्तान की मुस्लिम आबादी देश के तीन से चार फीसदी हिंदू समुदाय को बर्दाश्त करती है और हिंदू वहां आजाद हैं।\n\n2. पाकिस्तान की आधिकारिक जनगणना के अनुसार वहां हिंदू आबादी कितनी है?\nवर्ष 2023 की आधिकारिक जनगणना के मुताबिक पाकिस्तान में हिंदू आबादी 2.17 प्रतिशत है, जो करीब 52 लाख है।\n\n3. जावेद अख्तर ने जरदारी पर क्या प्रतिक्रिया दी?\nगीतकार जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया पर जरदारी को मिस्टर दस परसेंट कहा और उनके अल्पसंख्यकों के प्रति रविष्य पर तंज कसा।\n\n4. पाकिस्तान में किन अन्य समुदायों पर हमलों का जिक्र किया गया है?\nरिपोर्ट में शिया मुसलमानों पर हुए हमलों और अहमदिया समुदाय तथा बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के हनन का उल्लेख किया गया है।",
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  "category": "राजनीति",
  "publishedAt": "2026-08-17",
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