नवीन चावला की नियुक्ति याद दिलाकर संबित पात्रा ने कांग्रेस पर साधा निशाना, निष्पक्षता पर उठाए सवाल चुनाव आयोग और एसआईआर को लेकर छिड़े सियासी संग्राम के बीच भाजपा सांसद संबित पात्रा ने बुधवार को कांग्रेस पर पलटवार किया। उन्होंने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला के कार्यकाल और नियुक्ति प्रक्रिया का हवाला देते हुए विपक्षी आरोपों की हवा निकाली। निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और एसआईआर को केंद्र में रखकर जारी तीखी राजनीतिक बहस के बीच बुधवार को भारतीय जनता पार्टी ने प्रमुख विपक्षी दल पर जोरदार हमला बोला। एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए भाजपा सांसद संबित पात्रा ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला की पुरानी नियुक्ति और उनके कार्यकाल का ब्योरा सामने रखकर कांग्रेस के तमाम दावों पर सवाल खड़े किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर शोर मचाने वाली कांग्रेस का अपना इतिहास ऐसी संस्थाओं के राजनीतिक इस्तेमाल से भरा पड़ा है। पूर्व चुनाव आयुक्तों के कार्यकाल और उपकृत करने के आरोपों पर घेरा संबित पात्रा ने कहा कि मौजूदा दौर में मोदी सरकार ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता को अधिक सुदृढ़ बनाया है, जबकि कांग्रेस के पचास वर्षों के शासनकाल में इस संवैधानिक निकाय को महज एक कठपुतली बनाकर रख दिया गया था। अपने संबोधन में उन्होंने के वी के सुंदरम से लेकर नवीन चावला तक कई पूर्व चुनाव आयुक्तों के नाम सिलसिलेवार ढंग से गिनाए। पात्रा ने विस्तार से रेखांकित किया कि किस प्रकार कांग्रेस सरकारों ने सेवानिवृत्ति के पश्चात इन पूर्व चुनाव आयुक्तों को विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर बैठाकर उपकृत करने का काम किया। उन्होंने कहा कि आज जब जनता कांग्रेस को लगातार लोकतांत्रिक रूप से नकार चुकी है, तब अपनी राजनीतिक खिसियाहट मिटाने के लिए पार्टी के नेता भाजपा पर बेबुनियाद और अनर्गल आरोप मढ़ रहे हैं। 2009 के आम चुनाव और चयन समिति में हुआ बदलाव भाजपा सांसद ने ऐतिहासिक घटनाक्रम को साझा करते हुए दावा किया कि नवीन चावला को वर्ष 2005 में चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। बाद में 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान वह देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर आसीन थे। पात्रा ने याद दिलाया कि उसी 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए को सत्ता मिली थी। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को सामने रखकर उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व और आयोग के आपसी समीकरणों पर गंभीर सवाल खड़े किए। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयुक्तों के चयन के विधायी नियमों में हुए हालिया बदलावों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2023 तक नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया में केवल प्रधानमंत्री की भूमिका प्रमुख रहा करती थी, जबकि नई व्यवस्था के तहत गठित चयन समिति में लोकसभा में विपक्ष के नेता को भी आधिकारिक तौर पर शामिल किया गया है, जिससे प्रक्रिया पहले से कहीं अधिक पारदर्शी बन चुकी है। एसआईआर विवाद और आयोग के भीतर असंतोष की बातें संबित पात्रा की यह तीखी प्रतिक्रिया ऐसे वक्त में आई है जब एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज पर विपक्षी दल लगातार घेराबंदी कर रहे हैं। इस पूरे विवाद में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा निर्णय लेने और संस्थान को हाईजैक करने के गंभीर आरोप सामने आए। आयोग के दो साथी चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से यह आपत्ति जताई गई कि ज्ञानेश कुमार बाकी दोनों आयुक्तों की राय सुने बिना अपनी मर्जी से आयोग का संचालन कर रहे हैं और लिए गए फैसलों की जानकारी उन्हें संचार माध्यमों से मिल रही है। इन दोनों चुनाव आयुक्तों ने दस महीनों के भीतर चौदह बार इस स्थिति की शिकायत की और कैबिनेट सचिव को औपचारिक पत्र भी भेजे, जिन पर कोई जवाब नहीं मिला। हालांकि चुनाव आयोग ने इन सभी बातों पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि किसी भी संवैधानिक संस्थागत विचार-विमर्श में विभिन्न दृष्टिकोणों का होना स्वाभाविक प्रक्रिया है और एसआईआर से जुड़े सभी अंतिम फैसले पूरी सर्वसम्मति के साथ लिए गए हैं। इसका आप पर असर चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और राजनीतिक टकराव का सीधा असर देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर पड़ता है। • चुनावी शुचिता पर असर: चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों से आम नागरिकों का मतदान प्रक्रिया पर भरोसा सीधे प्रभावित होता है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया और कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित होना हर मतदाता के अधिकार से जुड़ा है। • संस्थागत सुधारों का महत्व: चयन समिति में विपक्ष के नेता को शामिल करने जैसे नियम चुनावी तंत्र में संतुलन लाते हैं। इससे यह तय होता है कि सरकारें अपनी सुविधानुसार एकतरफा नियुक्तियां न कर सकें। • आंतरिक मतभेद और निगरानी: संवैधानिक आयोगों के अंदर मतभेदों की शिकायतों से प्रशासनिक जवाबदेही की मांग तेज होती है। नागरिकों के लिए यह जानना जरूरी है कि चुनावी नियमों से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लागू हों। • राजनीतिक जवाबदेही: राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप से यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों के पिछले रिकॉर्ड की समीक्षा सार्वजनिक चर्चा में बनी रहेगी। मतदाता चुनावी तंत्र की विश्वसनीयता को हर राजनीतिक दल के आचरण से तौल सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ यह राजनीतिक टकराव चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच कार्यप्रणाली को लेकर उपजे गंभीर मतभेदों की खबरों के सार्वजनिक होने के बाद शुरू हुआ। • आंतरिक कार्यप्रणाली पर आपत्ति: दो चुनाव आयुक्तों ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा आयोग को मनमर्जी से चलाया जा रहा है और साथी आयुक्तों की राय नजरअंदाज की जा रही है। इसी के चलते उन्होंने दस महीनों में चौदह बार शिकायतें दर्ज कराईं और कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे। • विपक्ष द्वारा सरकार की घेराबंदी: आयोग में मतभेद और एसआईआर पर असहमति की खबरें सामने आते ही विपक्षी दलों ने सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त पर दबाव बढ़ा दिया। विपक्ष ने संवैधानिक संस्था पर नियंत्रण के आरोप लगाए। • भाजपा का तीखा पलटवार: विपक्षी हमले के जवाब में भाजपा सांसद संबित पात्रा ने कांग्रेस के पुराने दौर के चुनाव आयुक्तों और 2009 के चुनावों का जिक्र कर कांग्रेस को उसके अपने पिछले फैसलों पर घेरना शुरू किया। • आयोग का औपचारिक रुख: चुनाव आयोग ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया कि अलग-अलग विचार विमर्श का हिस्सा हैं और एसआईआर से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से ही लिए गए थे। सवाल-जवाब 1. संबित पात्रा ने कांग्रेस पर क्या मुख्य आरोप लगाए? संबित पात्रा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने अपने पचास साल के शासन में चुनाव आयोग को कठपुतली बनाकर रखा और सेवानिवृत्ति के बाद पूर्व चुनाव आयुक्तों को विभिन्न पदों से उपकृत किया। 2. नवीन चावला को लेकर संबित पात्रा ने क्या तथ्य रखे? पात्रा ने बताया कि नवीन चावला को 2005 में चुनाव आयुक्त बनाया गया था और वह 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त थे, जिसमें यूपीए गठबंधन जीता था। 3. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में 2023 के बाद क्या बदलाव हुआ? 2023 तक नियुक्ति में केवल प्रधानमंत्री की भूमिका प्रमुख थी, जबकि वर्तमान समिति में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष को भी शामिल किया गया है। 4. चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने क्या शिकायतें की थीं? उन्होंने आरोप लगाया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार उनकी सलाह सुने बिना फैसले ले रहे हैं और दस महीनों में उन्होंने चौदह बार कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर इसकी शिकायत की। 5. आंतरिक मतभेदों पर चुनाव आयोग का क्या स्पष्टीकरण आया? चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि अलग-अलग विचार विमर्श का स्वाभाविक हिस्सा हैं और एसआईआर से जुड़े अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। https://trendkia.com/politics/sambit-patra-cites-naveen-chawla-era-to-counter-congress-allegations-over-election-commission-37330 TrendKia — Har trend, sabse pehle.