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  "type": "article",
  "title": "सांताक्रूज के पीड़ित परिवार को बॉम्बे हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत, मतदाता सूची से कटे नाम 10 दिनों में बहाल करने का सख्त निर्देश",
  "summary": "बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने चुनाव आयोग को सांताक्रूज के 6 सदस्यीय परिवार का नाम 10 दिनों के भीतर मतदाता सूची में जोड़ने का आदेश दिया है और आयोग की रोक लगाने की मांग को खारिज कर दिया है।",
  "content": "बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने राज्य में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के एक बहुचर्चित मामले में फैसला सुनाते हुए प्रभावित परिवार को बड़ी राहत प्रदान की है। उच्च न्यायालय ने भारत चुनाव आयोग को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह आगामी 10 दिनों के भीतर परिवार के सभी सदस्यों के नाम मतदाता सूची में पुनः शामिल करे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि आयोग पहले संबंधित परिवार के पते का भौतिक सत्यापन पूरा करे और उसके बाद उनके मतदाता अधिकारों को बहाल करे।\n\nपते की पुष्टि के बाद मतदाता सूची में दर्ज होंगे नाम\nजस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की संयुक्त पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए राहत का रास्ता साफ किया। अदालत ने कहा कि नागरिक के मतदान के अधिकार की अनदेखी तकनीकी खामियों के आधार पर नहीं की जा सकती। आयोग को निर्देश दिया गया है कि वह सांताक्रूज के स्थानीय पते की पुष्टि करे और उसके तुरंत बाद 10 दिनों के समयबद्ध दायरे में सभी छह नागरिकों का नामांकन सुनिश्चित करे।\n\nसुप्रीम कोर्ट के मामले से अलग है यह याचिका\nसुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि सर्वोच्च न्यायालय में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े एक व्यापक विषय पर सुनवाई चल रही है, लेकिन यह व्यक्तिगत याचिका उस मामले के अधीन नहीं आती है। पीठ ने टिप्पणी की कि हम इस याचिका को स्वीकार कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में SIR के सामान्य ढांचे पर सुनवाई जारी है, परंतु यह याचिका व्यक्तिगत प्रशासनिक त्रुटि का मामला है और SIR के उस मूल विवाद से पूरी तरह अलग है।\n\nसांताक्रूज विधानसभा क्षेत्र का पूरा घटनाक्रम\nयह पूरा विवाद गोवा के सांताक्रूज विधानसभा क्षेत्र के निवासी परेश वसंत सालगांवकर और उनके परिवार के पांच अन्य सदस्यों से जुड़ा हुआ है। परेश सालगांवकर के परिवार ने कुछ समय पूर्व उसी विधानसभा क्षेत्र के भीतर अपना नया आवास बदला था। नए स्थान पर स्थानांतरित होने के बाद, उन्होंने मतदान प्रक्रिया का पालन करते हुए स्थानीय बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से संपर्क किया। बीएलओ के मार्गदर्शन और निर्देश के अनुसार परिवार के सभी 6 सदस्यों ने अपने पते को अद्यतन कराने के लिए फॉर्म-8 भरकर जमा कर दिया था।\n\nफॉर्म-8 खारिज होने और हाईकोर्ट पहुँचने की वजह\nजब चुनाव आयोग द्वारा SIR की ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की गई, तो परिवार यह देखकर स्तब्ध रह गया कि उनमें से किसी का भी नाम सूची में शामिल नहीं था। बाद में उन्हें यह सूचित किया गया कि चुनाव पंजीकरण अधिकारी (ERO) ने उनके फॉर्म-8 आवेदनों को खारिज कर दिया है। सबसे गंभीर बात यह थी कि निरस्तीकरण की यह जानकारी परिवार को तब दी गई जब दावा और आपत्ति दर्ज कराने की निर्धारित समयसीमा समाप्त हो चुकी थी। इसके बाद आयोग के अधिकारियों ने उन्हें नए मतदाता के रूप में फॉर्म-6 भरने की सलाह दी। परिवार ने इस सलाह का विरोध किया, क्योंकि फॉर्म-6 पहली बार वोटर बनने वालों के लिए होता है, जबकि पहले से पंजीकृत मतदाताओं के विवरण संशोधन के लिए फॉर्म-8 ही वैधानिक रूप से मान्य है। इसी प्रशासनिक विसंगति से तंग आकर परिवार ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया।\n\nचुनाव आयोग की तकनीकी दलीलें और सॉफ्टवेयर की कमी\nअदालत में सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की तरफ से उपस्थित वकील गौरीश अग्नि ने आयोग की कार्रवाई का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि SIR की प्रक्रिया सामान्य स्पेशल समरी Revision (SSR) से पूरी तरह भिन्न होती है। आयोग की दलील थी कि पुराने पते पर एन्यूमरेशन स्लिप जमा न होने के कारण आयोग का डिजिटल सॉफ्टवेयर फॉर्म-8 के आवेदनों को उनके पुराने EPIC डेटा के साथ लिंक नहीं कर सका। इस तकनीकी बाधा की वजह से सिस्टम ने आवेदनों को स्वतः खारिज कर दिया। आयोग ने यह भी तर्क दिया कि ड्राफ्ट सूची में नाम न होना तकनीकी तौर पर नाम काटा जाना नहीं माना जा सकता, क्योंकि SIR में पुरानी सूची का उपयोग केवल संदर्भ के तौर पर किया जाता है।\n\nअदालत द्वारा आदेश पर रोक की मांग खारिज\nआयोग के वकील गौरीश अग्नि ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि इस आदेश के क्रियान्वयन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए, ताकि चुनाव आयोग इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सके। हालांकि, जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की पीठ ने आयोग की इस रोक संबंधी याचिका को सिरे से खारिज कर दिया और 10 दिनों के भीतर मतदाता सूची में नाम जोड़ने के अपने आदेश को बरकरार रखा।\n\nइसका आप पर असर\nयह फैसला चुनाव आयोग की तकनीकी गलतियों के कारण मतदाता सूची से बेदखल हुए नागरिकों के लिए एक बड़ा कानूनी नजीर स्थापित करता है।\n\n• भारत में: यह निर्णय स्पष्ट करता है कि निर्वाचन आयोग का डिजिटल सॉफ्टवेयर किसी भी नागरिक के पंजीकृत मतदान अधिकार को केवल तकनीकी मैपिंग में विफलता के आधार पर नहीं छीन सकता। यदि मतदाताओं ने प्रक्रिया के अनुसार फॉर्म-8 जमा किया है, तो प्रशासनिक देरी या सॉफ्टवेयर त्रुटि के कारण उन्हें दोबारा नए मतदाता (फॉर्म-6) के रूप में आवेदन करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।\n• गोवा में: सांताक्रूज और संपूर्ण गोवा राज्य में SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से बाहर हुए अन्य परिवारों के लिए अपने मतदाता अधिकार पुनः प्राप्त करने का कानूनी रास्ता साफ हो गया है। 10 दिनों के भीतर पते के सत्यापन के बाद संबंधित परिवार का नाम पुनः मतदाता सूची में शामिल हो जाएगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह कानूनी विवाद मतदाता सूची संशोधन के दौरान तकनीकी और प्रशासनिक चूक के कारण उत्पन्न हुआ।\n\n• आवास परिवर्तन: परेश सालगांवकर के परिवार ने सांताक्रूज विधानसभा क्षेत्र में ही नया मकान लिया और बीएलओ की सलाह पर फॉर्म-8 जमा किया।\n• सॉफ्टवेयर मैपिंग में विफलता: चुनाव आयोग के SIR सॉफ्टवेयर में पुराने पते की एन्यूमरेशन स्लिप लिंक न हो पाने की वजह से फॉर्म-8 के आवेदन पुराने EPIC डेटा से कनेक्ट नहीं हो सके और स्वचालित रूप से खारिज हो गए।\n• आपत्ति की समयसीमा खत्म होना: चुनाव अधिकारियों ने आवेदनों के खारिज होने की जानकारी परिवार को दावा-आपत्ति की समयसीमा समाप्त होने के बाद दी, जिससे उनके पास प्रशासनिक सुधार का विकल्प नहीं बचा।\n• आयोग की अनुचित सलाह: आयोग ने उन्हें पंजीकृत मतदाता होने के बावजूद नए मतदाता का फॉर्म-6 भरने की सलाह दी, जिसके खिलाफ परिवार ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बॉम्बे हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को क्या आदेश दिया है?\nहाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को सांताक्रूज के 6 सदस्यों वाले परिवार का पता सत्यापित कर 10 दिनों में उनका नाम मतदाता सूची में जोड़ने का निर्देश दिया है।\n\n2. परिवार के सदस्यों का नाम मतदाता सूची से क्यों छूटा था?\nसांताक्रूज में नया घर लेने पर उन्होंने फॉर्म-8 भरा था, लेकिन आयोग के सॉफ्टवेयर में पुराने EPIC डेटा से मैपिंग न होने के कारण उनके आवेदन तकनीकी वजहों से खारिज हो गए थे।\n\n3. चुनाव आयोग ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ क्या मांग की थी?\nचुनाव आयोग के वकील ने आदेश पर रोक लगाने की मांग की ताकि इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सके, लेकिन हाईकोर्ट ने रोक लगाने से इनकार कर दिया।\n\n4. फॉर्म-8 और फॉर्म-6 में क्या अंतर है?\nफॉर्म-8 पहले से पंजीकृत मतदाताओं के पते या विवरण में सुधार के लिए होता है, जबकि फॉर्म-6 केवल पहली बार वोटर बनने वाले लोगों के लिए होता है।",
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