# संसद चलो मार्च के दौरान क्यों भड़के थे अभिजीत दीपके, साथियों की गुमशुदगी और पांच घंटे की बैठक का पूरा सच

> कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने 20 जुलाई के संसद चलो मार्च के दौरान अपने साथियों आशुतोष रंका और सौरव दास के गायब रहने और पांच घंटे की लंबी बैठक को लेकर खुलकर बात की है।

**Type:** article · **Category:** राजनीति · **Published:** 2026-08-30 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/politics/snsada-chalo-marcha-ke-daurana-kyon-bharake-the-abhijit-dipke-sathiyon-ki-gumashudagi-aura-pancha-ghnte-ki-baithaka-ka-pura-sacha-24744 · **Language:** Hindi
**Tags:** अभिजीत दीपके, कॉकरोच जनता पार्टी, संसद चलो मार्च, नीट यूजी विवाद, जंतर मंतर, आशुतोष रंका, सौरव दास, धर्मेन्द्र प्रधान

नई दिल्ली में 20 जुलाई को आयोजित हुए संसद चलो मार्च के दौरान का माहौल बेहद तनावपूर्ण था। सड़कों पर हजारों लोगों की भारी भीड़ उमड़ी हुई थी, चप्पे-चप्पे पर भारी पुलिस बल तैनात था और स्थिति पूरी तरह से परीक्षा की घड़ी जैसी बनी हुई थी। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके की ऊर्जा का स्तर उस समय शून्य पर पहुंच चुका था। भूख हड़ताल के लगातार तीसरे दिन उनके शरीर ने पूरी तरह से काम करना बंद कर दिया था। सुबह के वक्त ही अभिजीत बेहोश हो चुके थे और उनके पास पैदल चलने तक की ताकत नहीं बची थी, जिसके चलते उन्हें मजबूरन एक ट्रक पर सवार होना पड़ा था।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और नाटकीय मोड़ तब आया जब अभिजीत को अपने सबसे भरोसेमंद और करीबी दो साथियों आशुतोष रंका और सौरव दास की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस हो रही थी, लेकिन वे दोनों मौके से नदारद थे। अभिजीत लगातार उनके नंबरों पर फोन मिलाते रहे, लेकिन दोनों के फोन आउट ऑफ रिच आ रहे थे। एक इंटरव्यू के दौरान अभिजीत ने उस दिन के पूरे ड्रामे, अपनी गहरी नाराजगी और भाजपा नेताओं के साथ हुई पांच घंटे लंबी रहस्यमयी बैठक के राज से पर्दा उठाया है।

अभिजीत ने साक्षात्कार में उस दिन की पूरी घटना का विस्तार से ब्योरा देते हुए बताया कि सौरव और आशुतोष एक अहम बैठक में शामिल होने के लिए गए थे। भाजपा के प्रतिनिधिमंडल ने उन्हें बातचीत के लिए बुलाया था और उन्हें पूरे पांच घंटे तक बिठाकर रखा, जबकि असल बैठक केवल दस मिनट की ही चली थी। अभिजीत का साफ कहना है कि जब एक तरफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की भीड़ लगातार उग्र और बेकाबू होती जा रही थी, तब उनके दोनों मुख्य रणनीतिकार उनसे कोसों दूर थे। उन्होंने दोनों से संपर्क करने की बार-बार कोशिश की, लेकिन उनके नंबर लगातार नेटवर्क से बाहर आ रहे थे, जिससे उनका तनाव और मानसिक दबाव काफी ज्यादा बढ़ गया था।

अपनी शारीरिक स्थिति का जिक्र करते हुए अभिजीत ने स्पष्ट किया कि 20 जुलाई का दिन उनकी भूख हड़ताल का तीसरा दिन था। उन्होंने यह स्वीकार किया कि उन्हें इस बात का कोई अनुभव नहीं था कि भूख हड़ताल के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और क्या करना या नहीं करना चाहिए। पहले दो दिनों तक वे लगातार भीड़ को संबोधित करते रहे और लोगों से बातचीत करते रहे, जिसकी वजह से तीसरे दिन उनकी बची-कुची शारीरिक ताकत भी पूरी तरह से समाप्त हो गई थी। मार्च वाले दिन सुबह ही वे चक्कर खाकर गिर पड़े थे, जिसके कारण उन्हें पैदल मार्च करने के बजाय ट्रक का सहारा लेना पड़ा था।

अभिजीत ने आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि अगर आशुतोष और सौरव उस गंभीर वक्त पर जंतर-मंतर पर ही मौजूद रहते, तो भीड़ को नियंत्रित करना और संसद मार्च का सही ढंग से नेतृत्व करना काफी आसान हो जाता। उन्होंने यह भी कहा कि अगर उन्हें इस तरह की अप्रत्याशित स्थिति का पहले से अंदाजा होता, तो वे अपने दोनों प्रवक्ताओं को उस बैठक में जाने के लिए कभी अनुमति नहीं देते और उन्हें साफ तौर पर मना कर देते।

सीजेपी का यह संसद मार्च असल में नीट यूजी परीक्षा में बड़े पैमाने पर हुई धांधलियों और गड़बड़ियों के विरोध में छेड़े गए 37 दिनों के लंबे आंदोलन का एक बेहद अहम हिस्सा था। 20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र के ठीक पहले दिन प्रदर्शनकारियों का यह सैलाब जंतर-मंतर से आगे बढ़कर संसद मार्ग, रायसीना रोड, जनपथ, कनॉट प्लेस और इंडिया गेट तक फैल गया था। इस उग्र प्रदर्शन के दौरान कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों और दिल्ली पुलिस के बीच तीखी झड़पें भी देखने को मिली थीं। इस चौतरफा भारी दबाव के चलते आखिरकार 25 जुलाई को तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था, जिसके बाद सीजेपी ने अपने इस आंदोलन को समाप्त करने की घोषणा की थी।

## इसका आप पर असर
यह राजनीतिक घटनाक्रम देश भर के राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्र आंदोलनों और प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करता है।

- **भारत में:** छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा प्रबंधों और पुलिस व प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति पर कड़ा असर पड़ता है। इससे देश भर में बड़े राजनीतिक आंदोलनों की रणनीतिक तैयारियों और बातचीत के तौर-तरीकों पर नए सिरे से चर्चा शुरू होती है।
- **नई दिल्ली में:** जंतर-मंतर, संसद मार्ग और कनॉट प्लेस जैसे प्रमुख इलाकों में होने वाले इस तरह के उग्र प्रदर्शनों से स्थानीय यातायात बुरी तरह प्रभावित होता है और आम नागरिकों तथा दुकानदारों को भारी आवाजाही की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

## सवाल-जवाब

### 1. अभिजीत दीपके किस पार्टी के संस्थापक हैं?
अभिजीत दीपके कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक हैं।

### 2. संसद चलो मार्च का आयोजन कब किया गया था?
संसद चलो मार्च का आयोजन 20 जुलाई को किया गया था।

### 3. अभिजीत दीपके अपने किन साथियों पर गुस्सा हुए थे?
अभिजीत दीपके अपने दो साथियों आशुतोष रंका और सौरव दास पर गुस्सा हुए थे।

### 4. भाजपा प्रतिनिधिमंडल की बैठक कितने समय चली थी?
भाजपा प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक केवल 10 मिनट चली थी, लेकिन दोनों नेताओं को 5 घंटे तक बिठाकर रखा गया था।

### 5. CJP का आंदोलन किस परीक्षा को लेकर था?
यह आंदोलन नीट यूजी परीक्षा में हुई धांधलियों और गड़बड़ियों के विरोध में था।

### 6. आंदोलन कब और कैसे समाप्त हुआ था?
तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के 25 जुलाई को इस्तीफा देने के बाद यह 37 दिवसीय आंदोलन समाप्त हुआ था।

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