संसद की स्थायी कमेटियों का पुनर्गठन, टीएमसी के हाथ से निकली दो कुर्सियां राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसदीय स्थायी कमेटियों का पुनर्गठन किया है, जिसमें कई अहम पैनलों के अध्यक्ष बदल दिए गए हैं। संसदीय कार्यप्रणाली में मंत्रालय स्तर पर निगरानी रखने वाली विभिन्न विभाग-संबंधित स्थायी समितियों में व्यापक फेरबदल हुआ है। शनिवार को जारी संगठनात्मक बदलावों के तहत राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अलग-अलग पैनलों के मुखिया तय किए। इस ताज़ा पुनर्गठन में तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि उसके हाथ से दो बेहद प्रभावशाली कमेटियों का नियंत्रण निकल गया है। दूसरी ओर, सत्ताधारी दल और उसके एनडीए सहयोगियों के साथ-साथ विपक्षी खेमे के कई दिग्गजों को उनके मौजूदा पदों पर बरकरार रखा गया है। व्यापार और रसायन पैनल में नए चेहरे कमर्शियल नीतियों और व्यापारिक मामलों से जुड़ी वाणिज्य समिति का जिम्मा अब भारतीय जनता पार्टी के सांसद सुधांशु त्रिवेदी को सौंप दिया गया है। इससे पहले इस पद की जिम्मेदारी तृणमूल कांग्रेस की सांसद डोला सेन संभाल रही थीं। इसी क्रम में केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स कमेटी में भी बड़ा फेरबदल देखा गया है। तृणमूल कांग्रेस के बागी खेमे से ताल्लुक रखने वाली सांसद काकोली घोष दस्तीदार को इस रसायन समिति का अध्यक्ष चुना गया है, जिन्होंने अपने ही पूर्व सहयोगी कीर्ति आजाद की जगह ली है। डीएमके और एनडीए के घटक दलों की स्थिति दक्षिण भारत से द्रमुक के दो दिग्गज सांसदों का प्रभाव कमेटियों में यथावत बना हुआ है। तिरुचि शिवा को उद्योग संबंधी समिति की कमान फिर से दी गई है, जबकि कनिमोझी को खाद्य, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण समिति के मुखिया के रूप में जारी रखा गया है। सत्ता पक्ष के सहयोगी दलों के बीच जदयू, शिवसेना और टीडीपी के सांसदों को भी उनके पदों पर कायम रखा गया है। परिवहन, पर्यटन और संस्कृति से जुड़े मामलों की समिति पर जदयू सांसद संजय कुमार झा काबिज रहेंगे, वहीं ऊर्जा समिति का नेतृत्व शिवसेना के सांसद श्रीरंग बारणे के पास ही रहेगा। विपक्ष के प्रमुख नेताओं पर भरोसा कायम संसदीय फेरबदल के बीच विपक्षी दलों के कई प्रमुख नेताओं की कमान में कोई कटौती नहीं की गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद शशि थरूर पहले की तरह विदेश मंत्रालय से जुड़े मामलों की समिति का नेतृत्व करते रहेंगे। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस सांसद चरणजीत सिंह चन्नी को कृषि मामलों की समिति का प्रमुख बनाए रखा गया है। इसके अलावा शिक्षा, महिला, बाल विकास, युवा और खेल समिति की बागडोर कांग्रेस के मुकुल वासनिक के पास बरकरार है। समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता राम गोपाल यादव स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण समिति के अध्यक्ष पद पर बने रहेंगे। वहीं, ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज पैनल की जिम्मेदारी कांग्रेस नेता सप्तगिरी शंकर उलाका को दोबारा दी गई है। गृह, वित्त, रक्षा और अन्य प्रमुख मंत्रालयों के पैनल भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के पास भी कई रणनीतिक पैनल बने हुए हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री राधा मोहन सिंह रक्षा मामलों की समिति की अध्यक्षता करेंगे। पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर को कोयला, खान और इस्पात से संबंधित संसदीय समिति का अध्यक्ष फिर नियुक्त किया गया है। वित्त समिति की कमान भर्तृहरि महताब के पास सुरक्षित रखी गई है, जबकि गृह मामलों की समिति का संचालन राधा मोहन दास अग्रवाल जारी रखेंगे। जल संसाधन समिति के अध्यक्ष पद पर राजीव प्रताप रूडी की निरंतरता बनी रहेगी। कार्मिक, संचार और रेलवे कमेटियों में अंदरूनी फेरबदल कुछ पैनलों में भारतीय जनता पार्टी के भीतर ही जिम्मेदारी का आदान-प्रदान हुआ है। कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय समिति में सुजीत कुमार ने अपने ही साथी सांसद बृजलाल का स्थान लिया है। रेलवे से जुड़ी समिति में पार्टी के सांसद सुधीर गुप्ता को नया अध्यक्ष बनाया गया है, जहां उनसे पहले सीएम रमेश जिम्मेदारी निभा रहे थे। संचार और सूचना प्रौद्योगिकी समिति की बागडोर एक बार फिर निशिकांत दुबे को सौंपी गई है। इसके साथ ही विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन समिति की अध्यक्षता महाराष्ट्र से पार्टी सांसद मेधा विश्राम कुलकर्णी संभालती रहेंगी। विभाग-संबंधी स्थायी समितियों का ढांचा और भूमिका संसद की विभाग-संबंधित स्थायी समितियां सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और उनके महकमों के कामकाज की विस्तृत समीक्षा करने का सबसे अहम मंच मानी जाती हैं। आधिकारिक व्यवस्था के तहत ऐसी कुल 24 विभाग-संबंधित स्थायी समितियां गठित होती हैं। प्रत्येक समिति में कुल 31 सदस्यों को शामिल किया जाता है, जिनमें से 21 सदस्य लोकसभा से और 10 सदस्य राज्यसभा से मनोनीत होते हैं। इन सभी समितियों का कार्यकाल सामान्य तौर पर एक साल की अवधि का होता है। इसका आप पर असर संसदीय समितियों का पुनर्गठन संसद के भीतर नीतिगत फैसलों की समीक्षा प्रक्रिया को सीधे तौर पर तय करता है। • विधायी कामकाज पर असर: मंत्रालयों की योजनाओं, खर्चों और नए कानूनों के ड्राफ्ट की पड़ताल अब नए अध्यक्षों की देखरेख में होगी। इसका सीधा मतलब यह है कि जनता से जुड़े नीतिगत बिलों पर जांच की रफ्तार और प्राथमिकताओं में बदलाव देखने को मिल सकता है। • विपक्ष की भूमिका: कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की निगरानी कमेटियों में विपक्षी नेताओं के बने रहने से संसदीय जांच में संतुलन कायम रहेगा। इससे सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्षी दल भी जनहित के मुद्दों पर अपनी मजबूत आवाज उठा सकेंगे। • क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व: तमिलनाडु, बिहार, महाराष्ट्र और पंजाब जैसे राज्यों के प्रमुख सांसदों के पास अहम कमेटियां रहने से क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय मंच मिलेगा। इससे स्थानीय जरूरतों और केंद्रीय नीतियों के बीच बेहतर समन्वय की उम्मीद बंधती है। • जवाबदेही और पारदर्शिता: 24 स्थायी समितियों के 31-31 सदस्य पूरे साल सरकारी महकमों की कार्यप्रणाली की निगरानी करेंगे। आम नागरिकों के टैक्स के पैसे के उपयोग और योजनाओं के क्रियान्वयन पर संसद की कड़ी नजर बनी रहेगी। ऐसा क्यों हुआ संसद की विभाग-संबंधित स्थायी समितियों का कार्यकाल सामान्यतः एक वर्ष का होता है, जिसके पूरा होने पर उनका नियमित पुनर्गठन किया जाता है। राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष संयुक्त रूप से संसद के दोनों सदनों के सदस्यों को इन समितियों में नामित करते हैं। • नियमित कार्यकाल की समाप्ति: स्थायी समितियों का गठन सामान्यतः एक वर्ष की अवधि के लिए किया जाता है। तय समय सीमा पूरी होने के बाद नए सत्रों के लिए कमेटियों का नवीनीकरण संवैधानिक व विधायी परंपरा का हिस्सा है। • राजनीतिक और संगठनात्मक संतुलन: दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारी विभिन्न दलों की सदस्य संख्या और दलीय संतुलन को ध्यान में रखकर अध्यक्षों का चयन करते हैं। इसी प्रक्रिया के तहत कुछ दलों की हिस्सेदारी में बदलाव हुआ, जबकि कई सहयोगियों और विपक्षी नेताओं को बरकरार रखा गया। • मंत्रालयों की निगरानी की निरंतरता: संसद के सत्र न चलने के दौरान भी मंत्रालयों के कामकाज की सतत जांच बनाए रखने के लिए इन समितियों की सक्रियता अनिवार्य होती है। नए अध्यक्षों और सदस्यों के चयन के बाद अब ये समितियां पूरे साल विभिन्न सरकारी नीतियों की जांच करेंगी। सवाल-जवाब 1. संसदीय समितियों का पुनर्गठन किसने किया? यह पुनर्गठन राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा किया गया है। 2. वाणिज्य समिति का नया अध्यक्ष किसे बनाया गया है? भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी को वाणिज्य समिति का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जिन्होंने डोला सेन का स्थान लिया। 3. संसद में कुल कितनी विभाग-संबंधित स्थायी समितियां हैं? लोकसभा की आधिकारिक जानकारी के अनुसार संसद में कुल 24 विभाग-संबंधित स्थायी समितियां होती हैं। 4. प्रत्येक स्थायी समिति में कितने सांसद होते हैं? प्रत्येक स्थायी समिति में 31 सदस्य होते हैं, जिनमें 21 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से शामिल किए जाते हैं। 5. इन स्थायी समितियों का कार्यकाल कितने समय का होता है? संसद की इन विभाग-संबंधित स्थायी समितियों का कार्यकाल सामान्य तौर पर एक साल की अवधि का होता है। 6. विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष कौन बने रहेंगे? कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद शशि थरूर विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष पद पर बने रहेंगे। https://trendkia.com/politics/snsada-ki-sthayi-kametiyon-ka-punargathana-tmc-ke-hatha-se-nikali-do-kursiyan-42401 TrendKia — Har trend, sabse pehle.