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  "type": "article",
  "title": "संसद में बड़े विधेयकों की सुगबुगाहट तेज, बीजेपी और कांग्रेस ने जारी किए व्हिप",
  "summary": "संसद के आगामी सत्र को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सरकार के संभावित बड़े बिलों की चर्चा के बीच बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने अपने सांसदों के लिए व्हिप जारी कर दिया है।",
  "content": "भारतीय संसद के गलियारों में इन दिनों सियासी पारा सातवें आसमान पर है और हर तरफ इस बात की चर्चा जोरों पर है कि सरकार आने वाले दिनों में कौन सा बड़ा कदम उठाने जा रही है। लंबे समय से इस बात पर कयास लगाए जा रहे थे कि एफसीआरए यानी विदेशी चंदा विनियमन कानून से जुड़ा बिल और डिलिमिटेशन यानी परिसीमन से जुड़ा विधेयक कब सदन के पटल पर आएगा। पहले विपक्षी खेमे की तरफ से लगातार यह सवाल उठाए जा रहे थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह कहां हैं, लेकिन अब राजनीतिक हलकों में यह सवाल पूरी तरह गायब हो चुका है। इसकी वजह यह है कि संसद के भीतर कुछ बहुत बड़ा होने की सुगबुगाहट तेज हो गई है और इसी आशंका ने विपक्षी गठबंधन यानी इंडी खेमे में भारी खलबली मचा दी है।\n\nसांसदों के लिए जारी हुए सख्त व्हिप\nसंसदीय गतिविधियों में अचानक आए इस उबाल के बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने अपने सभी सांसदों के लिए औपचारिक रूप से व्हिप जारी कर दिया है। पार्टी ने अपने तमाम सांसदों को आगामी 11, 12 और 13 अगस्त को अनिवार्य रूप से संसद भवन में मौजूद रहने के निर्देश दिए हैं। पीछे-पीछे मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी ने भी अपने सभी सांसदों को सदन में उपस्थित रहने के लिए कह दिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दोनों तरफ से इस तरह के कड़े निर्देश आने से यह संकेत साफ मिल रहा है कि अगले कुछ दिनों में सदन के भीतर कोई बहुत बड़ा सियासी ड्रामा या विधायी उलटफेर देखने को मिल सकता है, जिसके डर से अभी से हड़कंप मचा हुआ है और लगातार व्हिप पर व्हिप जारी किए जा रहे हैं।\n\nविपक्ष के तेवरों पर आंकड़ों की रणनीति\nविपक्षी दलों की तरफ से लगातार दिखाए जा रहे हंगामेदार तेवरों का मुकाबला करने के लिए मोदी सरकार ने पूरी तरह से आंकड़ों की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। अगले चार दिनों के भीतर संसद में कुछ ऐसा होने वाला है जिससे विपक्ष के होश उड़ सकते हैं। हालांकि सरकार की तरफ से अभी तक परिसीमन और एफसीआरए बिल को लेकर कोई आधिकारिक और लिखित घोषणा नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक दलों की आंतरिक हलचल और व्हिप जारी होने की घटनाएं बहुत कुछ बयां कर रही हैं। कांग्रेस पार्टी ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी कीमत पर एफसीआरए बिल को पारित नहीं होने देगी। कांग्रेस का यह भी कहना है कि यदि इस विधेयक को आगे बढ़ाने की कोई गुंजाइश बनती भी है, तो इस पर अंतिम फैसला विपक्षी इंडी गठबंधन के साथियों के साथ व्यापक चर्चा के बाद ही लिया जाएगा।\n\nविदेशी चंदे के कानून पर बंटा विपक्ष\nएफसीआरए बिल के मुद्दे पर पूरा विपक्षी गठबंधन एकजुट नजर नहीं आ रहा है, बल्कि इसमें वैचारिक दरारें साफ दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खर्गे ने इस पर खुलकर अपनी बात रखते हुए कहा कि वे इस विधेयक का कड़ा विरोध करेंगे। उन्होंने आगे बताया कि इस मामले को लेकर एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें सदन के फ्लोर लीडर्स की हमेशा होने वाली बैठक के अनुरूप ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा। खर्गे का मानना है कि सभी विपक्षी दलों के नेता मिलकर जो भी फैसला करेंगे, उनकी पार्टी उसी रास्ते पर आगे बढ़ेगी और उसी के तहत अपनी रणनीति तय करेगी।\n\nएनसीपी सांसदों की प्रधानमंत्री से मुलाकात के मायने\nएक तरफ जहां कांग्रेस इस बिल के विरोध का दावा कर रही है, वहीं विपक्षी खेमे के ही कुछ अन्य सांसदों ने मोदी सरकार के संभावित कदमों के प्रति एक नरम रुख दिखाना शुरू कर दिया है। शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के कुल आठ सांसद संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने वाले हैं। इस अहम मुलाकात के राजनीतिक गलियारों में दूरगामी मायने निकाले जा रहे हैं। क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि मोदी सरकार ने इस बड़े बिल को आसानी से पास कराने के लिए अपने आंकड़ों का गणित साधना शुरू कर दिया है और विपक्षी एकता में सेंध लगनी शुरू हो गई है?\n\nइस पूरे घटनाक्रम पर सफाई देते हुए एनसीपी की लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने कहा कि यदि बाहर बारिश हो रही है तो इंसान छाता या रेनकोट ही लेगा। उन्होंने कहा कि वे देश के प्रधानमंत्री से मिलने जा रही हैं तो क्या वह वहां जाकर बिना बात के छोटे-मोटे किंतु-परंतु करेंगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीति में ऐसा बचकाना बर्ताव नहीं होता क्योंकि यह बहुत ही जिम्मेदारी का काम है। प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति का हमेशा आदर होना चाहिए और वे सभी सांसद किसी नीतिगत काम के लिए ही प्रधानमंत्री से मिलने जा रहे हैं। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि आजकल ऐसा दौर आ गया है कि कोई भी किसी से मिलता है तो उसे केवल गॉसिप का मुद्दा बना दिया जाता है, जो कि इस देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है। सुले ने कहा कि आज देश में नीति निर्माण जैसे गंभीर विषयों को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है और उनके जैसे जिम्मेदार सांसदों को इस तरह की ओछी बातों से बहुत गहरा दुख होता है।\n\nमहाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ी हलचल\nशरद पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सभी आठ लोकसभा सांसद आगामी 10 अगस्त को संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे। यह मुलाकात अलग-अलग नीतिगत और क्षेत्रीय मुद्दों पर होने वाली है। जैसे ही इस तय मुलाकात की खबरें बाहर आईं, महाराष्ट्र की सियासत में एक भूचाल सा आ गया और तमाम तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं। लेकिन इस सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि आखिर विपक्षी दलों को एफसीआरए या परिसीमन जैसे विधेयकों से इतनी अधिक दिक्कत और घबराहट क्यों महसूस हो रही है?\n\nसीटों के समीकरण और परिसीमन की जरूरत\nइस पूरे मामले पर अपनी बात रखते हुए बीजेपी सांसद मनोज तिवारी ने कहा कि जब पिछली बार कोई अहम बिल आया था, तो उस वक्त भी विपक्षी दलों ने भारी दबाव के बीच उसका समर्थन किया था, जो कि बिल्कुल सही था। लेकिन उनका यह भी तर्क है कि बनाए गए कानूनों को जमीन पर लागू भी किया जाना चाहिए। और कानून तभी सही मायनों में लागू हो सकता है जब समय पर परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जाए। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर की आबादी आज से करीब बीस साल पहले जितनी हुआ करती थी और आज जितनी है, उसमें जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। संविधान के नियमों के अनुसार प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या करीब 12 से 15 लाख के आसपास होनी चाहिए, लेकिन मौजूदा समय में कई ऐसी सीटें हैं जहां मतदाताओं का आंकड़ा बढ़कर 40 लाख तक पहुंच गया है।\n\nमनोज तिवारी ने खुद का हवाला देते हुए कहा कि वे जिस निर्वाचन क्षेत्र से सांसद हैं, अकेले वहीं पर लगभग 26 लाख वोटर मौजूद हैं। ऐसे में जनप्रतिनिधि जनता के साथ पूरा न्याय कैसे कर सकता है। यदि समय के साथ लोकसभा सीटों की संख्या में इजाफा नहीं किया जाएगा, तो प्रशासनिक कामकाज कैसे सुचारू रूप से चल पाएगा और अगर परिसीमन की प्रक्रिया ही नहीं होगी, तो भला सीटों की संख्या में बढ़ोतरी कैसे संभव हो पाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल घुमा-फिराकर महिलाओं के सशक्तिकरण का विरोध करना चाहते हैं। उन्हें पूरा विश्वास है कि देश के तमाम समझदार सांसद इस बात को भली-भांति समझ चुके हैं और आने वाले समय में महिला आरक्षण बिल निश्चित रूप से पारित होकर रहेगा, जबकि राहुल गांधी सिर्फ देखते ही रह जाएंगे।\n\nक्या संसद में संख्याबल जुटाने में जुटी है सरकार?\nविपक्षी खेमे के भीतर इस बात को लेकर जबरदस्त हड़कंप और खलबली मची हुई है कि कहीं ऐसा न हो कि वे लोग सदन के भीतर सिर्फ हंगामा करते रह जाएं और मौका देखकर मोदी सरकार आखिरी वक्त में कोई बड़ा ऐतिहासिक विधेयक चुपचाप पास करा ले। हालांकि सरकार की तरफ से अभी तक एफसीआरए, परिसीमन या महिला आरक्षण जैसे विधेयकों को लेकर कोई औपचारिक और अंतिम घोषणा नहीं की गई है, लेकिन केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बहुत साफ शब्दों में यह कह दिया है कि ये सभी बिल सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ये दोनों महत्वपूर्ण विधेयक सदन में निश्चित रूप से पेश किए जाएंगे, हालांकि इन्हें कब पटल पर लाया जाएगा और कब पारित कराया जाएगा, इसकी सटीक जानकारी उचित समय आने पर बाद में साझा की जाएगी।\n\nउत्तर से दक्षिण तक परिसीमन पर छिड़ी बहस\nइसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नए नवनिर्वाचित सांसदों के साथ हुई बैठक और गृह मंत्री अमित शाह की अलग-अलग राजनीतिक दलों के सांसदों के साथ लगातार हो रही मुलाकातों ने देश की सियासी हलचल को और अधिक तेज कर दिया है। लेकिन संसद के गलियारों में इस समय केवल एफसीआरए बिल की ही चर्चा नहीं गूंज रही है, बल्कि एक ऐसा दूसरा मुद्दा भी है जिसने दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत तक की राजनीति में भूचाल ला रखा है। वह मुद्दा और कोई नहीं बल्कि डिलिमिटेशन यानी परिसीमन का है, जिसने राजनीतिक दलों की नींद उड़ा रखी है।\n\nएफसीआरए को लेकर चल रही पूरी लड़ाई मुख्य रूप से विदेशी फंडिंग और राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता को लेकर है, लेकिन परिसीमन का सवाल सीधे तौर पर सत्ता के सबसे बड़े गणित से जुड़ा हुआ है। यही एकमात्र मुख्य वजह है कि विपक्ष के कई बड़े दलों और नेताओं की रातों की नींद इस एक शब्द के नाम से गायब हो चुकी है। दक्षिण भारत के क्षेत्रीय दलों को इस बात का गहरा डर सता रहा है कि यदि देश की बढ़ती हुई जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का नया बंटवारा किया गया, तो उनकी पारंपरिक राजनीतिक ताकत में भारी कमी आ सकती है। इसके विपरीत, उत्तर भारत के कई बड़े राज्यों को इस परिसीमन से भारी राजनीतिक फायदा मिलने की पूरी संभावना दिखाई दे रही है, जिसके कारण क्षेत्रीय संतुलन को लेकर गहमागहमी और बढ़ गई है।\n\nआखिर क्यों बेचैन है विपक्ष?\nयह पूरा मामला केवल संसद के भीतर सीटों की संख्या को घटाने या बढ़ाने भर का नहीं है, बल्कि आने वाले कई दशकों के लिए देश की असल राजनीतिक ताकत किसके हाथों में सुरक्षित रहेगी, इसकी भी एक बहुत बड़ी जंग बनता जा रहा है। यही बड़ी वजह है कि संसद के इस सत्र में एफसीआरए के साथ-साथ परिसीमन बिल को लेकर भी अटकलों और कयासों का बाजार पूरी तरह गर्म है। अब सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि आखिर डिलिमिटेशन यानी परिसीमन वास्तव में है क्या, विपक्षी दल इसके नाम से इतने ज्यादा बेचैन क्यों हो रहे हैं और मोदी सरकार इसे अमलीजामा पहनाने के लिए क्या पुख्ता तैयारियां कर रही है। परिसीमन का सीधा और स्पष्ट मतलब लोकसभा तथा विधानसभा क्षेत्रों की भौगोलिक सीमाओं और कुल सीटों की संख्या का नए सिरे से पुनर्निर्धारण करना होता है, जो पूरी तरह से देश की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित होता है ताकि बदलती आबादी के अनुपात को सही किया जा सके।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: संसद में संभावित बड़े विधयेकों और परिसीमन की चर्चाओं का देश के राजनीतिक समीकरणों और भावी चुनावी सीटों के बंटवारे पर गहरा असर पड़ सकता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. संसद सत्र को लेकर बीजेपी और कांग्रेस ने क्या कदम उठाया है?\nबीजेपी और कांग्रेस दोनों ने ही अपने सभी सांसदों के लिए संसद में उपस्थित रहने हेतु व्हिप जारी किया है।\n\n2. सांसदों को संसद में कब उपस्थित रहने को कहा गया है?\nसांसदों को आगामी 11, 12 और 13 अगस्त को संसद में अनिवार्य रूप से मौजूद रहने के निर्देश दिए गए हैं।\n\n3. एनसीपी के कितने सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने वाले हैं?\nशरद पवार गुट के एनसीपी के सभी 8 लोकसभा सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे।\n\n4. डिलिमिटेशन बिल को लेकर दक्षिण भारत के दलों को क्या डर है?\nदक्षिण भारत के दलों को डर है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों के नए बंटवारे से उनकी राजनीतिक ताकत कम हो सकती है।",
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  "category": "राजनीति",
  "publishedAt": "2026-08-09",
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