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  "title": "सोनम वांगचुक का बड़ा खुलासा, जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान अंदरूनी हलचल और बिखरते मनोबल की कहानी आई सामने",
  "summary": "सोनम वांगचुक ने एक पॉडकास्ट में खुलासा किया है कि कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में चले जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान शुरुआती दिनों के बाद भीड़ घटने पर नेता घबरा गए थे और बाहर निकलने का रास्ता तलाशने लगे थे।",
  "content": "दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर 45 दिनों तक चले उस आंदोलन के पर्दे के पीछे की उठापटक अब खुलकर सामने आ गई है, जिसने सियासी गलियारों में गहरी हलचल पैदा कर दी थी। कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले आयोजित इस छात्र आंदोलन के मुख्य चेहरे और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने एक इंटरव्यू में दावा किया है कि इस मोर्चे का नेतृत्व बाहर से जितना आक्रामक और मजबूत दिखाई दे रहा था, भीतरखाने उसकी स्थिति उतनी ही असमंजस से भरी हुई थी। वांगचुक के अनुसार, प्रदर्शन की शुरुआत में लोगों का भारी उत्साह देखने को मिला, लेकिन लगभग आठ-नौ दिन बीतते ही भीड़ पतली होने लगी, जिसका सीधा असर आयोजकों और युवा नेताओं के हौसले पर पड़ा। हालात यहां तक बिगड़ गए कि आंदोलन की कमान संभालने वाले कुछ लोग ही खुद को इस अभियान से सुरक्षित बाहर निकालने की जुगत भिड़ाने लगे थे।\n\nपॉडकास्ट में सामने आए अंदरूनी राज\nयह तमाम खुलासे सोनम वांगचुक ने यूट्यूबर प्रखर गुप्ता के साथ लगभग दो घंटे चले एक विस्तृत पॉडकास्ट के दौरान किए। उनका यह बहुचर्चित इंटरव्यू 29 अगस्त को सार्वजनिक हुआ था, जिसमें उन्होंने आंदोलन के उतार-चढ़ाव और आंतरिक कमजोरियों पर खुलकर बात की। वांगचुक ने बताया कि प्रदर्शन के दौर में सीजेपी के कुछ सदस्य बार-बार इस बात पर मंथन कर रहे थे कि इस गतिरोध को खत्म करके पीछे हटने का कोई रास्ता निकाला जाए। हालांकि उन्होंने किसी का भी नाम सार्वजनिक करने से परहेज किया, लेकिन यह जरूर स्पष्ट किया कि नेतृत्व के भीतर से ही उन्हें ऐसे सुझाव मिलने लगे थे कि अब इस पूरे घटनाक्रम से बाहर निकलने का कोई सुरक्षित विकल्प ढूंढ लिया जाना चाहिए।\n\nनेतृत्व के भीतर से उठी वापसी की मांग\nवांगचुक के बयानों के मुताबिक, एक ऐसा दौर भी आया जब संगठन के कुछ प्रमुख नेताओं ने उनके सामने हाथ तक जोड़ दिए थे। उन नेताओं का स्पष्ट कहना था कि वे अब इस संघर्ष को और आगे नहीं खींचना चाहते और किसी तरह यहां से निकलना चाहते हैं। सोनम वांगचुक का यह दावा बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि उस दौरान सार्वजनिक मंचों से लगातार यह संदेश प्रसारित किया जा रहा था कि आंदोलनकारी अपनी मांगों से एक इंच भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और उनका संकल्प पूरी तरह अडिग है।\n\nभीड़ कम होने से कमजोर हुआ हौसला\nआंदोलन की इस अंदरूनी कमजोरी को सीधे तौर पर प्रदर्शनकारियों की घटती संख्या से जोड़ते हुए वांगचुक ने बताया कि जनता का आना-जाना सीधे तौर पर नेतृत्व के मानसिकबल को प्रभावित कर रहा था। उनके अनुसार, पहले सप्ताह में भारी जनसमूह जंतर-मंतर पर उमड़ रहा था, लेकिन जैसे ही नौ दिन गुजरे, मैदान खाली होने लगा और इसके साथ ही आयोजकों का उत्साह भी ठंडा पड़ने लगा। वांगचुक का यह भी मानना था कि नेतृत्व की सोची-समझी राजनीतिक मानसिकता ने भी इस पूरे अभियान की दिशा और ऊर्जा को बदलने में एक बड़ी भूमिका अदा की थी। उनके मुताबिक, 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च से ठीक पहले की स्थिति काफी निराशाजनक हो चली थी, क्योंकि तब आयोजकों को यह लगने लगा था कि इस विरोध प्रदर्शन से अंततः कोई ठोस परिणाम हाथ नहीं आने वाला है।\n\nविकल्पों की तलाश और राहुल गांधी का जिक्र\nवांगचुक ने यह भी खुलासा किया कि जब प्रदर्शन को समेटने के संभावित तरीकों पर विचार चल रहा था, तब कई तरह के रास्तों पर चर्चा की गई थी। इसी सिलसिले में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का नाम भी विचार-विमर्श के दौरान सामने आया था, क्योंकि यह तय किया जा रहा था कि उनके अनशन को समाप्त कराने का सबसे उचित तरीका क्या हो सकता है। राहुल गांधी के नाम के जुड़ने की पृष्ठभूमि यही बातचीत थी, जिसे वांगचुक ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों और उस दौरान हुई बैठकों के आधार पर साझा किया है।\n\n20 जुलाई के संसद मार्च के बाद आया नया मोड़\nवांगचुक के अनुसार, 20 जुलाई को हुए संसद मार्च के बाद इस आंदोलन की पूरी तस्वीर ही पलट गई। उस मार्च के दौरान भड़की हिंसा और उसके तुरंत बाद पुलिस द्वारा की गई सख्त कार्रवाई ने इस ठंडे पड़ते अभियान को अचानक से एक नई ऊर्जा प्रदान कर दी। इससे ठीक पहले, 18 जुलाई को पुलिस ने वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से जबरन उठाकर अस्पताल पहुंचा दिया था, जिसके बाद उन्होंने जनता से अपील की थी कि वे संसद मार्च में भारी तादाद में शिरकत करें। उनका कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम के बाद आंदोलन में एक बार फिर से जान फूंक दी गई और नेताओं का गिरा हुआ मनोबल भी तेजी से मजबूत हो उठा।\n\nशुरुआत से शामिल नहीं होना चाहते थे वांगचुक\nबातचीत के दौरान वांगचुक ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी योजना शुरू से इस प्रदर्शन का हिस्सा बनने की बिल्कुल नहीं थी। जब सीजेपी ने 20 जून से अपने साधारण अभियान को बड़े धरने-प्रदर्शन में बदलने का निर्णय लिया, तब उसके कर्ताधर्ताओं ने वांगचुक से समर्थन मांगा था। उन्हें पहले ही संकेत दे दिया गया था कि इस मुहिम में शामिल होने का मतलब अनशन की राह चुनना भी हो सकता है। हालांकि, उन दिनों स्विट्जरलैंड में एक विज्ञान सम्मेलन में उनकी उपस्थिति पहले से तय थी, इसलिए उन्होंने संगठन को साफ कह दिया था कि वे 28 जून से ही इस मोर्चे से जुड़ पाएंगे, जबकि पार्टी चाहें तो अपना प्रदर्शन 20 जून से ही शुरू कर सकती है। वांगचुक के इस रुख से सीजेपी के नेता खासे हैरान रह गए थे, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि वे पहले दिन से ही उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे। आखिरकार, तय कार्यक्रम के मुताबिक वांगचुक 28 जून को जंतर-मंतर पहुंचे और वहां के युवा नेतृत्व को पहले आठ दिनों तक मोर्चा संभालते देखने के बाद ही उन्होंने अपना अनशन शुरू किया था।\n\nइसका आप पर असर\nयह खबर मुख्य रूप से राजनीतिक आंदोलनों के भीतर की कार्यप्रणाली और आयोजकों के रणनीतिक निर्णयों से जुड़ी है, जिसका सीधा असर आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी पर नहीं पड़ता है।\n\n• भारत में: देश भर के राजनीतिक कार्यकर्ताओं और छात्र संगठनों के लिए यह वाकया बड़े सार्वजनिक आंदोलनों के भीतर आने वाले उतार-चढ़ाव और मानसिक दबाव को समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है।\n• दिल्ली में: राष्ट्रीय राजधानी में होने वाले बड़े धरना-प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से इस तरह के आयोजनों के आंतरिक घटनाक्रम और पुलिस कार्रवाई से जुड़ी नीतियां स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बनती हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सोनम वांगचुक ने आंदोलन के बारे में यह खुलासे कहां किए?\nसोनम वांगचुक ने यह खुलासे यूट्यूबर प्रखर गुप्ता के साथ एक पॉडकास्ट में किए जो 29 अगस्त को सामने आया।\n\n2. जंतर-मंतर पर आंदोलन कितने दिनों तक चला था?\nयह आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर पर 45 दिनों तक चलाया गया था।\n\n3. नेतृत्व घबराहट में क्यों आ गया था?\nशुरुआती दिनों के बाद भीड़ कम होने लगी और नेताओं का मनोबल गिरने लगा, जिससे वे बाहर निकलने का रास्ता तलाशने लगे।\n\n4. किस घटना के बाद आंदोलन में दोबारा ऊर्जा आई?\n20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा और उसके बाद की पुलिस कार्रवाई के बाद आंदोलन में फिर से ऊर्जा आई।\n\n5. सोनम वांगचुक आंदोलन से कब जुड़े थे?\nसोनम वांगचुक स्विट्जरलैंड में एक विज्ञान सम्मेलन के कारण 28 जून को इस आंदोलन में शामिल हुए थे।",
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  "category": "राजनीति",
  "publishedAt": "2026-08-31",
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