सोनिया गांधी की आत्मकथा 'बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव' 10 नवंबर को होगी रिलीज कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी अपनी पहली आत्मकथा 'बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव' लेकर आ रही हैं, जो 10 नवंबर को रिलीज होगी। इस किताब में उनके घरेलू महिला से लेकर देश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक पदों तक के सफर की पूरी कहानी खुद उनकी जुबानी सामने आएगी। भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली परिवारों में शुमार और देश के सबसे मजबूत राजनीतिक दलों में से एक की कमान संभालने वालीं सोनिया गांधी ने अब अपने जीवन के पन्नों को खुद लिखने का फैसला किया है। पिछले पांच दशकों में उनके जीवन और राजनीतिक सफर पर अनगिनत किताबें और लेख लिखे जा चुके हैं, लेकिन यह पहला अवसर है जब उन्होंने अपनी जिंदगी की दास्तान खुद अपनी कलम से बयां की है। उनकी बहुप्रतीक्षित आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ इसी साल 10 नवंबर को पाठकों के सामने आने जा रही है, जिसकी आधिकारिक घोषणा जाने-माने प्रकाशक ‘अल्फ्रेड ए. नॉप्फ’ द्वारा की गई है। बीते पांच दशकों में एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली और घर-गृहस्ती संभालने वाली महिला से लेकर एक परिपक्व भारतीय राजनेता के रूप में उनका रूपांतरण देखना कई लोगों के लिए हैरतअंगेज रहा है। हालांकि, उनके बेहद करीबी लोग इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि यह बदलाव रातों-रात नहीं हुआ। सक्रिय राजनीति में आना कभी भी सोनिया गांधी की पहली प्राथमिकता या पसंद नहीं रहा था। यहां तक कि वे अपने पति राजीव गांधी के भी राजनीति में कदम रखने को लेकर लंबे समय तक सहज महसूस नहीं करती थीं। इसके बावजूद, यह मान लेना कि वे अपने शुरुआती दौर में देश की राजनीतिक हलचल और सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह दूर थीं, उनके राजनीतिक सफर के साथ न्याय नहीं होगा। राजनीतिक प्रशिक्षण और इंदिरा गांधी का सानिध्य फरवरी 1968 में देश के सबसे चर्चित और प्रभावशाली राजनीतिक परिवार की बहू बनते ही सोनिया गांधी का सार्वजनिक जीवन और कूटनीतिक प्रशिक्षण एक साथ शुरू हो गया था। अपने सख्त अनुशासन के लिए पहचानी जाने वाली तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की छत्रछाया में उन्होंने जो अनुभव हासिल किए, वे आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा संबल साबित हुए। उस समय देश और दुनिया के तमाम बड़े सियासी दिग्गज इंदिरा गांधी से मिलने उनके आधिकारिक आवास पर आते थे। उन्हीं मुलाकातों के बीच सोनिया गांधी का भी कांग्रेस पार्टी के कई शीर्ष नेताओं के साथ मेल-मिलाप और औपचारिक परिचय होना शुरू हो गया था। इनमें से कई नेता ऐसे थे जो कई दशकों बाद खुद सोनिया गांधी के पार्टी की कमान संभालने के दौरान भी पूरी तरह सक्रिय बने रहे। जब पहली बार उतरी थीं राजनीतिक रैली में प्रधानमंत्री आवास पर आने वाले विभिन्न राजनेताओं से सोनिया गांधी का मिलना-जुलना तो आम बात थी, लेकिन भारतीय राजनीति के विशाल जनसमूह से उनका वास्तविक सामना पहली बार 20 जून 1975 को हुआ था। उस दिन वे दिल्ली के बोट क्लब पर लगभग एक लाख लोगों की विशाल भीड़ के सामने मौजूद थीं। यह वह दौर था जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस बहुचर्चित फैसले के ठीक आठ दिन बीत चुके थे जिसमें रायबरेली से इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया गया था। इंदिरा गांधी के समर्थन में एकजुटता प्रदर्शित करने के उद्देश्य से आयोजित इस रैली के मुख्य सूत्रधार संजय गांधी थे। उनका कड़ा रुख था कि इस संकट की घड़ी में पूरे परिवार को एक मंच पर दिखना चाहिए और इसके लिए हर सदस्य की उपस्थिति अनिवार्य है। उस भीड़ के बीच सोनिया यह देखकर अवाक रह गई थीं कि कैसे इंदिरा गांधी ने नेहरू-गांधी परिवार के बलिदानों को याद करते हुए और अपनी अंतिम सांस तक जनता की सेवा करते रहने का संकल्प दोहराकर हजारों लोगों की भीड़ को पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर दिया था। अंतरराष्ट्रीय मेहमानों की आवभगत और वैश्विक नेताओं से जुड़ाव प्रधानमंत्री आवास पर आने वाले विदेशी मेहमानों की मेहमाननवाजी करने की जिम्मेदारी शुरुआत से ही सोनिया गांधी ने बखूबी संभाली थी। यह तब की बात है जब सोनिया को भारत आए हुए केवल डेढ़ साल ही पूरा हुआ था और महीना अक्टूबर 1969 का था। महात्मा गांधी जन्म शताब्दी समारोह के सिलसिले में ‘फ्रंटियर गांधी’ के नाम से मशहूर खान अब्दुल गफ्फार खान भारत आए हुए थे। तब इंदिरा गांधी ने इस वयोवृद्ध गांधीवादी नेता की खातिरदारी और उनके खानपान की देखरेख करने का विशेष जिम्मा सोनिया को ही सौंपा था। खान अब्दुल गफ्फार खान के बाद सोनिया गांधी को इंदिरा गांधी और बाद में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान दुनिया भर के अनगिनत महत्वपूर्ण राष्ट्राध्यक्षों और वैश्विक नेताओं से मिलने का अवसर मिला। इन दिग्गजों में रोनाल्ड रीगन, मार्गरेट थेचर, यासेर अराफात, फिदेल कास्त्रो से लेकर बेनजीर भुट्टो तक के नाम शामिल रहे। उन्होंने इन सभी बड़े नेताओं की कार्यशैली को बहुत करीब से देखा और परखा था। इंदिरा गांधी इन विदेशी मेहमानों से कैसे मिलती थीं और किस तरह बात करतीं थीं, इसका प्रत्यक्ष अनुभव सोनिया को लगातार मिल रहा था। सोवियत संघ से गहरा जुड़ाव और रूसी नेताओं से मुलाकात सोनिया गांधी का रूस यानी सोवियत संघ के साथ एक विशेष और गहरा भावनात्मक जुड़ाव रहा है, जिसकी मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें थीं। पहली वजह उनके अपने पिता थे जिन पर रूसी संस्कृति और जीवनशैली का गहरा असर था। यही कारण था कि उन्होंने अपनी तीनों बेटियों के नाम रूसी रखे थे, जो सोनिया, नादिया और अनुष्का थे। दूसरी वजह शीत युद्ध के उस दौर में भारत सरकार के सोवियत संघ के साथ अत्यंत प्रगाढ़ और मधुर संबंध होना था। इसी पृष्ठभूमि में सोनिया को लियोनिद ब्रेझ़नेव से लेकर मिखाइल गोर्बाचेव तक कई प्रमुख रूसी नेताओं से बेहद आत्मीय और सौहार्दपूर्ण माहौल में मिलने का मौका मिला। आज से करीब 15 साल पहले तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने सोनिया गांधी को उनके जन्मदिन पर एक विशेष संदेश भेजा था। मेदवेदेव, जो वर्तमान में रूस की सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष और व्लादिमीर पुतिन के सबसे भरोसेमंद समर्थकों में गिने जाते हैं, ने अपने उस संदेश में लिखा था कि वे गांधी परिवार की महान विरासत को आगे बढ़ाते हुए देश में लोकतंत्र को मजबूती दे रही हैं, भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास को तेजी से आगे बढ़ा रही हैं तथा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था और वैश्विक परिदृश्य को बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही हैं। इन तमाम प्रयासों के चलते ही वे अपने देश के नागरिकों का अटूट विश्वास और पूरी दुनिया में भारी सम्मान हासिल करने में पूरी तरह कामयाब रही हैं। रूस के एक अनजान कस्बे की यात्रा का किस्सा जाने-माने कूटनीतिज्ञ से राजनेता बने नटवर सिंह ने अपनी पुस्तक ‘वॉकिंग विद लॉयन्स: टेल्स फ्रॉम अ डिप्लोमेटिक पास्ट’ में जो 2013 में प्रकाशित हुई थी, साल 2005 में सोनिया गांधी के साथ अपनी रूस यात्रा का दिलचस्प जिक्र किया है। उस समय नटवर सिंह देश के विदेश मंत्री के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने अपनी किताब में बताया कि एक आधिकारिक बैठक समाप्त होने के बाद वे दोनों हेलीकॉप्टर के जरिए व्लादिमीर नामक एक बेहद छोटे से कस्बे में पहुंचे थे। नटवर सिंह इस बात को लेकर काफी हैरान थे कि आखिर सोनिया गांधी ने अपने दौरे के लिए इस गुमनाम और अनजान शहर को क्यों चुना होगा। लेकिन जब वे वहां पहुंचे तो उन्हें इस चुनाव की असली वजह स्पष्ट हो गई। वे एक ऐसी जगह पर पहुंचे जिसकी मुख्य इमारत कभी एक चर्च हुआ करती थी और जिसे बाद में एक संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया था। उस संग्रहालय के अंदर एक अष्टकोणीय कमरा बना हुआ था जिसकी एक दीवार पर कागज की छोटी-छोटी पर्चियां करीने से चिपकाई गई थीं। सोनिया गांधी उन पर्चियों को बहुत ही गहरे और उत्सुक भाव से देख रही थीं, क्योंकि वे रूसी भाषा पढ़ने में सक्षम थीं। सवाल-जवाब 1. सोनिया गांधी की आत्मकथा का नाम क्या है? उनकी आत्मकथा का नाम 'बिलॉन्गिंग : ए जर्नी ऑफ लव' है। 2. यह पुस्तक कब रिलीज हो रही है? यह किताब इसी साल 10 नवंबर को रिलीज होने जा रही है। 3. सोनिया गांधी की आत्मकथा के प्रकाशक कौन हैं? इस जीवनी के प्रकाशक 'अल्फ्रेड ए. नॉप्फ' हैं। 4. भारतीय राजनीति से सोनिया गांधी का पहला बड़ा वास्ता कब पड़ा था? उनका वास्तविक राजनीतिक वास्ता 20 जून 1975 को दिल्ली के बोट क्लब पर हुई रैली के दौरान पड़ा था। https://trendkia.com/politics/soniya-gandhi-ki-atmakatha-belonging-a-journey-of-love-10-navnbara-ko-hogi-rilija-21270 TrendKia — Har trend, sabse pehle.