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  "type": "article",
  "title": "तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक विधायकों के इस्तीफे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, राजनीति का हिस्सा बताया",
  "summary": "सुप्रीम कोर्ट ने अन्नाद्रमुक के छह बागी विधायकों के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस्तीफा देकर मंत्री बनना राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।",
  "content": "भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के गलियारों से एक बड़ा कानूनी फैसला सामने आया है, जहां देश की सर्वोच्च अदालत ने तमिलनाडु के सियासी घटनाक्रम पर अहम मुहर लगाई है। अदालत ने अन्नाद्रमुक के उन छह बागी विधायकों के खिलाफ लाई गई याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिन्होंने पार्टी के व्हिप के खिलाफ मतदान करने के बाद अपनी विधानसभा सदस्यता से स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया था। इसके पश्चात ये सभी नेता सत्तारूढ़ दल में शामिल हो गए थे। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने वकील के. सुथन की उस याचिका पर सुनवाई पूरी करते हुए यह निर्देश जारी किया, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के पूर्ववर्ती फैसले को चुनौती दी गई थी।\n\n \n\nमद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर\n शीर्ष अदालत की इस तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान साफ शब्दों में कहा कि यदि कोई जनप्रतिनिधि अपनी इच्छा से पद छोड़ता है और मंत्री पद की शपथ लेता है, तो यह संपूर्ण राजनीतिक प्रक्रिया का एक स्वाभाविक हिस्सा है। याचिकाकर्ता ने मद्रास हाईकोर्ट के 24 सितंबर के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत चुनावी खर्च की सुरक्षा के लिए एक विशेष तंत्र बनाने और दल बदलने वाले छह सदस्यों पर पांच साल का प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि किसी भी विधायक के पास अपनी विधानसभा सीट से इस्तीफा देने का बुनियादी संवैधानिक अधिकार है, और किसी भी न्यायिक आदेश के माध्यम से कानून के दायरे से बाहर जाकर कोई अतिरिक्त शर्तें नहीं थोपी जा सकती हैं।\n\n \n\nविधानसभा अध्यक्ष के फैसले और इस्तीफे का पूरा घटनाक्रम\n इससे पहले मद्रास हाईकोर्ट ने 13 अक्टूबर को तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष जेसीडी प्रभाकर के उस निर्णय को पूरी तरह वैध करार दिया था, जिसमें उन्होंने अन्नाद्रमुक के इन बागी नेताओं के इस्तीफे स्वीकार किए थे। अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष को यह भी निर्देश दिया था कि वह अन्नाद्रमुक के सचेतक कृष्णमूर्ति की उस याचिका पर आगामी दो महीनों के भीतर उचित निर्णय लें, जिसमें एस जयकुमार, मारागथम कुमारवेल, पी सत्यभामा और एसक्की सुबैया जैसे नेताओं की अयोग्यता की मांग की गई थी।\n\n निर्वाचन क्षेत्रों के आंकड़ों के अनुसार, एस जयकुमार, मारागथम कुमारवेल और पी सत्यभामा ने क्रमशः पेरुंदुरई, मदुरांतकम तथा धारापुरम सीटों से जीत हासिल करने के बाद 25 मई, 2026 को अपने पद त्याग दिए थे। इसके अगले ही दिन अंबासमुद्रम के विधायक एसक्की सुबैया ने भी अपना इस्तीफा सौंप दिया था, जबकि विरालिमालाई से सी. विजयभास्कर और करूर से एम. आर. विजयभास्कर ने क्रमशः 16 और 29 जून को विधानसभा की सदस्यता छोड़ दी थी। ये सभी नेता अप्रैल माह में संपन्न हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में अन्नाद्रमुक के चुनाव चिह्न पर विजयी हुए थे, लेकिन इस्तीफा देने के बाद इन्होंने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली पार्टी टीवीके का दामन थाम लिया था।\n\n \n\nउपचुनाव के नतीजे और संवैधानिक स्थिति\n राजनीतिक समीकरणों में आए इस बदलाव के बाद, छह अक्टूबर को राज्य में उपचुनाव आयोजित किए गए थे। इन चुनावी मुकाबलों में टीवीके के टिकट पर उतरीं मारागथम कुमारवेल और सत्यभामा ने अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों मदुरांतकम तथा धारापुरम में शानदार जीत दर्ज की। शीर्ष अदालत ने यह आदेश कृष्णमूर्ति की याचिका के साथ-साथ ‘देसिया मक्कल शक्ति काची’ द्वारा दायर एक अन्य जनहित याचिका पर संयुक्त रूप से पारित किया। अदालत ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि इन सभी विधायकों द्वारा सौंपे गए त्यागपत्र पूरी तरह से स्वैच्छिक थे और वे संविधान की 10वीं अनुसूची के तमाम प्रावधानों के अनुकूल भी थे।\n\nइसका आप पर असर\nयह फैसला उन चुनावी और राजनीतिक नियमों को स्पष्ट करता है जो दल-बदल और विधानसभा सदस्यता से जुड़े मामलों को नियंत्रित करते हैं।\n\n• भारत में: यह निर्णय स्पष्ट करता है कि जनप्रतिनिधियों के पास स्वेच्छा से इस्तीफा देने का अधिकार है और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएं तय हैं। इससे भविष्य के राजनीतिक समीकरणों और दलबदल मामलों में अदालतों के रुख की दिशा तय होगी।\n\n• तमिलनाडु में: राज्य के मतदाताओं और राजनीतिक दलों के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे छह सीटों पर हुए उपचुनावों और बागी विधायकों की कानूनी स्थिति को अंतिम रूप मिल गया है। इससे क्षेत्रीय राजनीति में सत्ता समीकरण मजबूत हुए हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह मामला तब तूल पकड़ा जब अन्नाद्रमुक के छह विधायकों ने पार्टी के व्हिप के विरुद्ध मतदान किया और बाद में अपनी विधानसभा सीटों से इस्तीफा देकर सत्तारूढ़ पार्टी का दामन थाम लिया।\n\n• दलबदल और इस्तीफा: विधायकों ने अप्रैल चुनावों में अपनी जीत के तुरंत बाद स्वेच्छा से पद छोड़े और मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के दल में शामिल हो गए।\n\n• कानूनी चुनौतियां: विपक्ष और संबंधित पक्षों ने मद्रास हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कर इन नेताओं पर पांच साल की अयोग्यता और चुनावी खर्च सुरक्षा जैसे उपायों की मांग की थी।\n\n• संवैधानिक प्रावधान: अदालत ने संविधान की 10वीं अनुसूची और स्वैच्छिक इस्तीफे के प्रावधानों की समीक्षा करते हुए याचिका को खारिज कर दिया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुप्रीम कोर्ट ने किस याचिका को खारिज किया?\nसुप्रीम कोर्ट ने अन्नाद्रमुक के छह बागी विधायकों के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया।\n\n2. किन न्यायाधीशों की पीठ ने यह फैसला सुनाया?\nयह फैसला प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनाया।\n\n3. मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में क्या निर्णय दिया था?\nमद्रास हाईकोर्ट ने विधायकों के इस्तीफे को सही ठहराया था और जनहित याचिका खारिज कर दी थी।\n\n4. इस्तीफा देने वाले विधायक किस पार्टी में शामिल हुए?\nइस्तीफा देने वाले विधायक मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके पार्टी में शामिल हुए।\n\n5. उपचुनाव कब आयोजित किए गए थे?\nइन सीटों पर उपचुनाव छह अक्टूबर को आयोजित किए गए थे।",
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  "category": "राजनीति",
  "publishedAt": "2026-10-26",
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