# सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के नाम और निशान पर तीखी बहस के बीच गूंजे ठहाके, कपिल सिब्बल से सीजेआई सूर्यकांत ने पूछा पिता या बेटा कौन जीता

> सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के नाम और चुनाव निशान विवाद पर सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे गुट के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तीखी कानूनी दलीलें रखीं, वहीं सीजेआई सूर्यकांत के एक सवाल पर पूरा कोर्ट रूम ठहाकों से गूंज उठा.

**Type:** article · **Category:** राजनीति · **Published:** 2026-08-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/politics/supreme-court-men-shiv-sena-ke-nama-aura-nishana-para-tikhi-bahasa-ke-bicha-gunje-thahake-kapil-sibal-se-cji-surya-kant-ne-puchha--15898 · **Language:** Hindi
**Tags:** शिवसेना, सुप्रीम कोर्ट, कपिल सिब्बल, सूर्यकांत, उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे, चुनाव आयोग, राजनीति

महाराष्ट्र के बहुचर्चित राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़े शिवसेना नाम और 'तीर-कमान' चुनाव निशान विवाद की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में एक अनोखा और हल्का-फुल्का क्षण देखने को मिला. देश की सर्वोच्च अदालत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व वाली पीठ के समक्ष उद्धव ठाकरे गुट और एकनाथ शिंदे गुट के बीच चल रही कानूनी लड़ाई पर विस्तृत सुनवाई चल रही थी. उद्धव ठाकरे पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल चुनाव आयोग द्वारा एकनाथ शिंदे गुट के पक्ष में दिए गए निर्णय को चुनौती देते हुए अपनी गंभीर दलीलें पेश कर रहे थे. इसी बीच सीजेआई सूर्यकांत के एक अचानक पूछे गए दिलचस्प सवाल ने अदालत के गंभीर माहौल को क्षण भर में मुस्कुराने और ठहाके लगाने में बदल दिया.

## अदालत कक्ष में हल्का क्षण: सीजेआई सूर्यकांत का सवाल और कपिल सिब्बल का जवाब
अदालत में जारी तीखी बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भारत के निर्वाचन आयोग के एक पुराने फैसले का उदाहरण दिया. यह उदाहरण एक ऐसी राजनीतिक पार्टी के आंतरिक विवाद से जुड़ा था, जिसमें पार्टी पर वर्चस्व और नियंत्रण को लेकर पिता और पुत्र के बीच कानूनी खींचतान हुई थी. इस संदर्भ पर टिप्पणी करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने हल्के अंदाज में मुस्कुराते हुए कपिल सिब्बल से पूछा, "कौन जीता, पिता या बेटा?"

सीजेआई के इस सवाल का जवाब देते हुए कपिल सिब्बल ने भी मुस्कुराकर तपाक से कहा, "बेटे की जीत हुई. मैंने बेटे की पैरवी की थी." वरिष्ठ वकील का यह हाजिरजवाबी भरा उत्तर सुनते ही सुप्रीम कोर्ट के पूरे हॉल में ठहाके गूंज उठे और कुछ समय के लिए कानूनी दांव-पेचों के तनावपूर्ण माहौल में हंसी की लहर दौड़ गई.

## शिवसेना के नाम और तीर-कमान निशान पर मुख्य कानूनी लड़ाई
सुप्रीम कोर्ट के सामने वर्तमान में विचारणीय मुख्य प्रश्न यह है कि पार्टी में हुए ऐतिहासिक विभाजन के बाद असली शिवसेना के रूप में किस गुट को मान्यता दी जानी चाहिए और पार्टी के आधिकारिक नाम के साथ-साथ 'तीर-कमान' जैसे ऐतिहासिक चुनाव चिह्न पर किस पक्ष का वैधानिक अधिकार बनता है. इससे पूर्व भारत के निर्वाचन आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें असली शिवसेना का दर्जा दिया था और पार्टी का नाम तथा चुनाव निशान उन्हें आवंटित कर दिया था. निर्वाचन आयोग के इसी फैसले की संवैधानिक वैधता को उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनौती दी है.

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अपनी दलीलों का मुख्य ध्यान इस बात पर केंद्रित किया कि निर्वाचन आयोग ने फैसला सुनाते समय पार्टी के आधिकारिक संविधान और संगठनात्मक संरचना से जुड़े मूलभूत दस्तावेजों का उचित और निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं किया. उन्होंने अदालत को बताया कि आयोग ने सामने मौजूद महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी करके एकतरफा निष्कर्ष निकाला है.

## निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया और दस्तावेजों पर कपिल सिब्बल की आपत्तियां
कपिल सिब्बल ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए का विशेष रूप से उल्लेख किया. उन्होंने पीठ को बताया कि इस कानूनी प्रावधान के अनुसार, यदि किसी राजनीतिक दल के नाम, उसके मुख्य कार्यालय के पते, उसके शीर्ष पदाधिकारियों या उसकी संगठनात्मक संरचना में कोई भी बदलाव होता है, तो उसकी लिखित जानकारी निर्वाचन आयोग को देना अनिवार्य होता है. सिब्बल के अनुसार, उद्धव ठाकरे गुट ने कानून में तय किए गए सभी नियमों और प्रक्रियाओं का पूरी निष्ठा से पालन करते हुए समय-समय पर आवश्यक जानकारियां निर्वाचन आयोग को उपलब्ध कराई थीं.

सिब्बल ने अदालत के सामने दावा किया कि निर्वाचन आयोग के पास शिवसेना का 2018 में स्वीकृत संविधान भी विधिवत मौजूद था, लेकिन इसके बावजूद फैसले के समय उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया. उन्होंने कहा कि उस दस्तावेज पर स्वयं निर्वाचन आयोग की आधिकारिक मोहर लगी हुई थी. सिब्बल ने तर्क दिया कि यदि आयोग को यह अंदेशा था कि यह दस्तावेज बाद में तैयार किया गया है या फर्जी है, तो आयोग को उसी समय कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए थी. उन्होंने गंभीर आरोप लगाया कि आयोग ने पार्टी के वास्तविक सांगठनिक ढांचे को समझने का प्रयास करने के बजाय पहले से तय मानसिकता और निष्कर्ष के आधार पर दस्तावेजों की जांच की.

## संगठनात्मक ढांचे और पक्ष प्रमुख पद की संवैधानिक स्थिति
अपनी कानूनी बहस को आगे बढ़ाते हुए सिब्बल ने शिवसेना के आंतरिक संविधान की बारीकियों को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि पार्टी के संविधान के अनुसार 'पक्ष प्रमुख' का पद केवल निर्वाचन प्रक्रिया के माध्यम से तय किया जाता है, किसी बागी गुट के प्रस्ताव से नहीं. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पार्टी की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली इकाई राष्ट्रीय कार्यकारिणी है और संगठन के भीतर विभिन्न पदों के दायित्व और अधिकार संविधान में स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं.

कपिल सिब्बल ने वर्ष 2018 की पार्टी की सामान्य सभा की बैठक का विवरण देते हुए बताया कि उस दौरान 12 उप-नेताओं को मनोनीत किया गया था, जबकि 21 उप-नेता लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित हुए थे. सिब्बल के अनुसार, इस संपूर्ण चुनावी प्रक्रिया और मनोनयन से जुड़े सभी आवश्यक प्रामाणिक दस्तावेज निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड में पहले से मौजूद थे. जब शिंदे गुट की ओर से इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए गए, तो सिब्बल ने पुनः जोर देकर कहा कि यदि दस्तावेज बाद में तैयार किए गए होते, तो यह निर्वाचन आयोग का वैधानिक कर्तव्य था कि वह उस समय उचित जांच और कार्रवाई करता.

## जस्टिस बागची के सवाल: दस्तावेजों की सूचना और 10वीं अनुसूची की प्रासंगिकता
मामले की गहराई से जांच करते हुए पीठ के सदस्य जस्टिस बागची ने भी सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण और तीखे सवाल खड़े किए. जस्टिस बागची ने पूछा कि जब पार्टी के भीतर नेताओं और पदाधिकारियों की संख्या में बदलाव हुए, तो क्या निर्वाचित सदस्यों के संबंध में विस्तृत जानकारी आयोग को औपचारिक रूप से नहीं भेजी गई थी? इसके उत्तर में सिब्बल ने स्पष्ट किया कि संगठन से जुड़े निर्वाचित और मनोनीत दोनों ही श्रेणियों के सदस्यों की पूरी जानकारी निर्वाचन आयोग को नियमानुसार दी गई थी.

जस्टिस बागची ने शिंदे गुट द्वारा उठाए गए उस तर्क का भी जिक्र किया जिसमें दावा किया गया था कि संबंधित दस्तावेज बाद की तारीखों में तैयार किए गए थे. इस पर कपिल सिब्बल ने अदालत का ध्यान एक बार फिर उन दस्तावेजों पर दर्ज निर्वाचन आयोग की आधिकारिक मुहर और प्राप्ति रसीद की ओर आकर्षित किया, जिससे यह सिद्ध होता है कि दस्तावेज पहले से आयोग के पास जमा थे.

## अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल और मुख्यमंत्री पद के बाद बढ़ा समर्थन
सुनवाई का एक बेहद अहम हिस्सा राजनीतिक दल में हुए विभाजन को तय करने में निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र की सीमा पर केंद्रित रहा. जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि किसी राजनीतिक दल में विभाजन से उत्पन्न होने वाले प्रश्नों को संविधान की 10वीं अनुसूची के सिद्धांतों के संदर्भ में भी देखा जाना आवश्यक है. उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या पार्टी में बाद में घटित हुए घटनाक्रमों को निर्वाचन आयोग अपने अंतिम फैसले का मुख्य आधार बना सकता है.

सीजेआई सूर्यकांत ने भी इस दलील पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि निर्वाचन आयोग के पास इस विषय पर निर्णय लेने का अधिकार क्षेत्र ही नहीं था, तो मामले की आगे जांच करने का प्रश्न ही खड़ा नहीं होता. हालांकि, यदि आयोग के पास वैधानिक अधिकार क्षेत्र मौजूद था और उसने उसका गलत या अनुचित इस्तेमाल किया, तो यह एक अलग कानूनी मुद्दा बनता है. इसके उत्तर में सिब्बल ने तर्क रखा कि आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग किया और जिस समय यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया, उस समय उसके सामने पर्याप्त और निष्पक्ष दस्तावेज उपलब्ध ही नहीं थे.

सिब्बल ने शिंदे गुट को मिले राजनीतिक समर्थन में आई तेजी का विश्लेषण करते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति राज्य का मुख्यमंत्री बन जाता है, तो स्वाभाविक रूप से कई जनप्रतिनिधि और नेता उसके साथ जुड़ने लगते हैं. लेकिन उनके अनुसार, इस बाद की राजनीतिक स्थिति का उपयोग पहले से चले आ रहे अवैध घटनाक्रमों को वैध ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता. सिब्बल ने आरोप लगाया कि एकनाथ शिंदे को पहले मुख्यमंत्री पद पर बैठाया गया और उसके बाद उनके पक्ष में आए विधायकों की संख्या को राजनीतिक समर्थन के रूप में पेश करके आयोग को गुमराह किया गया. उन्होंने अंत में जोर दिया कि उद्धव ठाकरे को 'पक्ष प्रमुख' के पद से हटाने का कोई भी कानूनी या संवैधानिक अधिकार बागी विधायकों के पास नहीं था, क्योंकि पार्टी संविधान में पदमुक्ति और चुनाव की प्रक्रिया बिल्कुल स्पष्ट है.

## इसका आप पर असर
**भारत में:** यह मामला देश में राजनीतिक दलों की आंतरिक लोकतंत्र, विभाजन और चुनाव चिह्नों के आवंटन से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट करने के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है.

**महाराष्ट्र में:** सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सीधा असर राज्य की राजनीति, शिवसेना के दोनों गुटों के भविष्य और आगामी चुनावों में पार्टी के नाम एवं चुनाव निशान के इस्तेमाल पर पड़ेगा.

## सवाल-जवाब

### 1. सुप्रीम कोर्ट में किस मुद्दे पर सुनवाई हो रही थी?
सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के आधिकारिक नाम और 'तीर-कमान' चुनाव निशान पर अधिकार को लेकर उद्धव ठाकरे गुट और एकनाथ शिंदे गुट के बीच चल रहे विवाद पर सुनवाई हो रही थी.

### 2. उद्धव ठाकरे गुट की ओर से कोर्ट में क्या मुख्य दलील दी गई?
कपिल सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग ने पार्टी के 2018 के संविधान और संगठनात्मक ढांचे को नजरअंदाज करके शिंदे गुट को नाम और निशान सौंपने का फैसला जल्दबाजी में किया.

### 3. सुनवाई के दौरान ठहाके किस सवाल पर लगे?
जब कपिल सिब्बल ने पिता-पुत्र के पार्टी विवाद का पुराना उदाहरण दिया, तब सीजेआई सूर्यकांत ने मुस्कुराते हुए पूछा कि 'कौन जीता, पिता या बेटा?', जिस पर सिब्बल ने जवाब दिया कि बेटे की जीत हुई थी.

### 4. चुनाव आयोग के फैसले को लेकर क्या तर्क दिए गए?
सिब्बल ने कहा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29ए के तहत आयोग को सभी बदलावों की जानकारी दी गई थी और 2018 के संविधान पर आयोग की आधिकारिक मुहर भी लगी हुई थी.

### 5. संविधान की 10वीं अनुसूची का उल्लेख क्यों किया गया?
जस्टिस बागची ने कहा कि राजनीतिक दल में विभाजन से जुड़े कानूनी सवालों को संविधान की 10वीं अनुसूची के दायरे में और आयोग के अधिकार क्षेत्र के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

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