# तमिलनाडु के कोलाथुर चुनाव परिणाम पर मद्रास हाईकोर्ट का फैसला, एमके स्टालिन की ईवीएम जांच और वीवीपैट गिनती वाली याचिका खारिज

> मद्रास हाईकोर्ट ने कोलाथुर सीट से टीवीके उम्मीदवार वीएस बाबू की जीत को चुनौती देने वाली एमके स्टालिन की याचिका सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया है। अदालत ने 100 फीसदी वीवीपैट पर्चियों की गिनती और ईवीएम सत्यापन की मांग पर राहत देने से इनकार कर दिया।

**Type:** article · **Category:** राजनीति · **Published:** 2026-09-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/politics/tamil-nadu-ke-kolathur-chunava-parinama-para-madras-high-court-ka-phaisala-mk-stalin-ki-evm-jancha-aura-vvpat-ginati-vali-yachika--26918 · **Language:** Hindi
**Tags:** मद्रास हाईकोर्ट, एमके स्टालिन, कोलाथुर विधानसभा, वीएस बाबू, टीवीके, ईवीएम विवाद, वीवीपैट गिनती, केंद्रीय चुनाव आयोग

तमिलनाडु के राजनीतिक गलियारों और विधिक हलकों में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत मद्रास हाईकोर्ट ने कोलाथुर विधानसभा चुनाव परिणाम से जुड़ी याचिका पर अपना निर्णय सुनाया है। चीफ जस्टिस एसए धर्माधिकारी और जस्टिस जी अरुल मुरुगन की दो सदस्यीय खंडपीठ ने डीएमके प्रमुख तथा तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन द्वारा दायर याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव में कोलाथुर निर्वाचन क्षेत्र से तमिल वेत्री कषगम (टीवीके) के विजयी प्रत्याशी वीएस बाबू के निर्वाचन को चुनौती देने वाली यह याचिका पोषणीय या सुनवाई योग्य नहीं है। अदालत के इस फैसले से चुनाव परिणाम को कानूनी माध्यम से पलटने की स्टालिन की कोशिशों पर पूर्ण विराम लग गया है।

## कोलाथुर निर्वाचन क्षेत्र का विवाद और याचिका की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के दौरान कोलाथुर सीट पर हुए मतदान और उसके नतीजों से जुड़ा हुआ है। चुनाव परिणाम घोषित होने के पश्चात डीएमके नेता एमके स्टालिन ने चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने तमिलनाडु के कोलाथुर क्षेत्र में चुनाव के दौरान इस्तेमाल की गई सभी 286 इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के व्यापक सत्यापन की मांग की थी। इससे पहले 31 अगस्त को ही मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट संकेत दिए थे कि वह मुख्य विषय पर विचार करने से पूर्व याचिका की कानूनी वैधता और इसके पोषणीय होने के पहलू का परीक्षण करेगी। अदालत ने पाया कि स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं के तहत यह याचिका विचारणीय श्रेणी में नहीं आती।

## वीवीपैट पर्चियों की शत-प्रतिशत गिनती की थी मांग
अदालत में दायर अपनी याचिका में एमके स्टालिन ने भारत के केंद्रीय चुनाव आयोग (ECI) को कड़े निर्देश देने की गुहार लगाई थी। उनकी मुख्य मांग थी कि कोलाथुर विधानसभा क्षेत्र के सभी मतदान केंद्रों पर इस्तेमाल की गई वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) मशीनों की 100% पर्चियों की भौतिक गिनती कराई जाए। इसके अतिरिक्त उन्होंने निर्वाचन क्षेत्र में तैनात की गई सभी 286 ईवीएम की बर्न मेमोरी तथा माइक्रोकंट्रोलर की गहन तकनीकी जांच की भी मांग की थी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मतदान के दौरान किसी भी प्रकार की सॉफ्टवेयर हेरफेर या तकनीकी गड़बड़ी नहीं हुई थी।

## ईवीएम सत्यापन में देरी और तकनीकी कमियों के आरोप
स्टालिन ने अदालत के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा कि 7 मई को चुनाव परिणाम सार्वजनिक होने के तुरंत बाद उन्होंने 14 ईवीएम के बर्न मेमोरी तथा माइक्रोकंट्रोलर सत्यापन के लिए निर्धारित शुल्क के साथ औपचारिक आवेदन जमा कर दिया था। हालांकि मई की शुरुआत में ही आवेदन जमा करने के बावजूद केंद्रीय चुनाव आयोग ने अत्यधिक विलंब करते हुए 29 जुलाई को सत्यापन की प्रक्रिया संपन्न की। याचिकाकर्ता का आरोप था कि इस लंबी देरी के कारण प्रक्रिया पर संदेह उत्पन्न हुआ।

इसके अलावा याचिका में यह गंभीर दावा भी किया गया कि सत्यापन प्रक्रिया की शुरुआत में ही 14 में से 2 ईवीएम तकनीकी रूप से बंद हो गईं और काम करना बंद कर दिया। स्टालिन के अनुसार इन दोनों मशीनों में आई खराबी की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जानी आवश्यक थी। उन्होंने एक अन्य ईवीएम की कस्टडी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि बैलेट यूनिट और कंट्रोल यूनिट को ले जाने वाले बक्से पर लगे एड्रेस टैग पूरी तरह से खाली थे, जबकि दूसरी तरफ सील लगी हुई थी। इन तमाम विसंगतियों के बावजूद जिला निर्वाचन अधिकारी ने पूरी जांच प्रक्रिया को नियमानुसार और सफल घोषित कर दिया था।

## वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की कानूनी दलीलें
सुनवाई के दौरान जब हाईकोर्ट की पीठ ने पूछा कि स्टालिन ने चुनावी याचिका के बजाय रिट याचिका का रास्ता क्यों चुना, तो स्टालिन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने स्थिति स्पष्ट की। सिब्बल ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग ने ईवीएम सत्यापन की रिपोर्ट 29 जुलाई को दी, जो चुनाव परिणाम घोषित होने के 45 दिनों की तय वैधानिक सीमा के बाद की तारीख थी। चुनावी याचिका दायर करने की समय सीमा समाप्त हो जाने के कारण याचिकाकर्ता के पास रिट याचिका दाखिल करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक देरी की वजह से किसी नागरिक या प्रत्याशी को कानूनी उपचार से वंचित नहीं किया जा सकता।

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने वोट रिकॉर्डिंग की तकनीकी संरचना पर भी अपनी चिंताएं व्यक्त कीं। उन्होंने अदालत को बताया कि जब कोई मतदाता बैलेट यूनिट का बटन दबाता है, तो सिग्नल पहले कंट्रोल यूनिट को जाता है, जो बाद में वीवीपैट को संदेश भेजता है। सिब्बल का तर्क था कि इस व्यवस्था में वीवीपैट को बीच में रखा गया है और सिग्नल सॉफ्टवेयर के माध्यम से प्रसारित होता है, जिससे इसमें हेरफेर की तकनीकी गुंजाइश बनी रहती है।

## चुनाव आयोग का विरोध और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
दूसरी तरफ केंद्रीय चुनाव आयोग का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने स्टालिन की याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत के सामने तर्क दिया कि चुनाव परिणाम या ईवीएम प्रक्रिया को केवल जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव याचिका के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि चतुर ड्राफ्टिंग का सहारा लेकर याचिकाकर्ता ने तय सीमा बीत जाने के बाद रिट याचिका के जरिए चुनाव याचिका वाला लाभ पाने की कोशिश की है।

दामा शेषाद्रि नायडू ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता को मतदान प्रक्रिया या मशीनों की विश्वसनीयता पर कोई संदेह था, तो उन्हें शुरुआती चरण में ही उचित मंच पर मामला उठाना चाहिए था। समय सीमा बीत जाने के बाद अदालत आने का कोई औचित्य नहीं बनता। इसके साथ ही उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय के उस महत्वपूर्ण फैसले का भी हवाला दिया जिसमें 100% वीवीपैट पर्चियों की रीकाउंटिंग की मांग को खारिज कर दिया गया था। नायडू ने चेतावनी दी कि यदि इस तरह की याचिकाओं को स्वीकार किया जाने लगा, तो यह एक नई परंपरा की शुरुआत होगी और हर चुनाव के बाद पराजित उम्मीदवार अदालतों का रुख करने लगेंगे।

## इसका आप पर असर
मद्रास हाईकोर्ट का यह निर्णय चुनाव विवादों, ईवीएम सत्यापन की समय सीमा और अदालती याचिकाओं के कानूनी दायरे के संबंध में बेहद स्पष्ट संदेश देता है।

- **भारत में:** यह निर्णय स्पष्ट करता है कि चुनावी नतीजों या मशीनों की प्रक्रिया को केवल तय 45 दिनों की वैधानिक सीमा के भीतर 'चुनाव याचिका' दाखिल करके ही चुनौती दी जा सकती है। देश भर के उम्मीदवारों के लिए यह स्पष्ट है कि देरी होने पर साधारण रिट याचिका के जरिए चुनाव परिणाम को चुनौती नहीं दी जा सकती।
- **तमिलनाडु में:** कोलाथुर सीट पर टीवीके प्रत्याशी वीएस बाबू की चुनावी जीत कानूनी रूप से पूरी तरह बहाल रहेगी। इससे क्षेत्र के मतदाताओं के बीच चुनावी नतीजे को लेकर बनी अनिश्चितता समाप्त हो गई है।
- **मतदाताओं के लिए प्रभाव:** सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों के अनुरूप 100 फीसदी वीवीपैट पर्चियों की भौतिक पुनर्गणना की मांग को दोबारा खारिज किया गया है, जिससे मौजूदा वोटिंग और ऑडिट प्रक्रिया की वैधता बनी रहेगी।
- **राजनीतिक दलों के लिए सबक:** चुनाव के बाद मशीनों के सत्यापन या जांच की अर्जी देने वाले प्रत्याशियों को समय सीमा का विशेष ध्यान रखना होगा, ताकि उनकी विधिक अपीलें खारिज न हों।

## सवाल-जवाब

### 1. मद्रास हाईकोर्ट ने एमके स्टालिन की याचिका पर क्या फैसला सुनाया?
हाईकोर्ट ने एमके स्टालिन की याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने 100% वीवीपैट गिनती और ईवीएम जांच की मांग स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

### 2. कोलाथुर सीट से 2026 के चुनाव में किसकी जीत हुई थी?
कोलाथुर विधानसभा सीट से तमिल वेत्री कषगम (टीवीके) के उम्मीदवार वीएस बाबू ने जीत हासिल की थी।

### 3. स्टालिन की ओर से वकील कपिल सिब्बल ने क्या दलील दी?
कपिल सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव आयोग ने 29 जुलाई को सत्यापन रिपोर्ट दी, जो 45 दिनों की चुनावी याचिका सीमा के बाद थी। इसलिए रिट याचिका दाखिल करनी पड़ी।

### 4. केंद्रीय चुनाव आयोग ने कोर्ट में क्या रुख अपनाया?
चुनाव आयोग के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि चुनाव नतीजों को केवल चुनाव याचिका के जरिए चुनौती दी जा सकती है और सुप्रीम कोर्ट 100% वीवीपैट गिनती के खिलाफ फैसला दे चुका है।

### 5. याचिका में कितनी मशीनों की जांच की मांग की गई थी?
याचिका में कोलाथुर निर्वाचन क्षेत्र की सभी 286 ईवीएम और वीवीपैट मशीनों की 100% पर्चियों की गिनती कराने की मांग की गई थी।

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