{
  "type": "article",
  "title": "यूपीआई चार्ज पर मोदी सरकार को घेरने वाले राहुल गांधी अपनी ही पार्टी के सांसदों के चलते कैसे बैकफुट पर आए",
  "summary": "यूपीआई ट्रांजैक्शन पर नए मर्चेंट चार्ज के विरोध में उतरे राहुल गांधी के दावों को सरकार ने संसदीय स्थायी समिति की बैठक के रिकॉर्ड के जरिए चुनौती दी है, जिसमें कांग्रेस के पांच दिग्गज सांसद भी शामिल थे।",
  "content": "यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ट्रांजैक्शन पर नए मर्चेंट चार्ज लगाने को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है, जिसने कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को केंद्र सरकार के सामने ला खड़ा किया है। विपक्ष के नेता ने एक तीखा हमला बोलते हुए इन नए ट्रांजैक्शन चार्ज को डिजिटल भुगतान पर एक अनुचित टैक्स बताया है और इसे वापस लेने की मांग की है। हालांकि, सरकार ने संसदीय रिकॉर्ड से एक महत्वपूर्ण खुलासा करके इस नैरेटिव का जवाब दिया है, जिससे विपक्ष के भीतर ही एक गहरा विरोधाभास सामने आ गया है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि जिस संसदीय समिति ने UPI के लिए एक टिकाऊ रेवेन्यू मॉडल बनाने की सिफारिश की थी, उसमें कांग्रेस के पांच प्रमुख सांसद शामिल थे और विचार-विमर्श के दौरान उनमें से किसी ने भी कोई औपचारिक असहमति दर्ज नहीं कराई थी। इसने संसदीय स्थायी समितियों में निर्णय लेने की प्रक्रिया और डिजिटल भुगतान ढांचे पर विपक्ष के राजनीतिक रुख को लेकर एक गरमागरम बहस छेड़ दी है।\n\nयूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI आज के समय में भारत की रिटेल भुगतान प्रणाली की रीढ़ बन चुका है, जो शहरी और ग्रामीण इलाकों में हर महीने अरबों ट्रांजैक्शन की सुविधा प्रदान करता है। इसकी भारी पहुंच के कारण, ट्रांजैक्शन चार्ज से जुड़ी कोई भी चर्चा तुरंत आम जनता का ध्यान और राजनीतिक बहस को अपनी ओर खींच लेती है। जब केंद्र सरकार ने कुछ उच्च-मूल्य वाले ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट चार्ज लगाने की योजना की घोषणा की, तो उम्मीद थी कि इस पर राजनीतिक विवाद होगा। हालांकि, यह खुलासा होने के बाद कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता खुद उस समिति का हिस्सा थे जिसने UPI से आय जुटाने के तरीके खोजने का सुझाव दिया था, पूरी कहानी का रुख बदल गया है। इसने विपक्ष को एक ऐसी राजनीतिक स्थिति में डाल दिया है जहां उन्हें अपनी ही पार्टी के सांसदों के फैसलों और अपने वर्तमान रुख के बीच तालमेल बिठाने में मुश्किल हो रही है।\n\nसंसदीय स्थायी समिति और कांग्रेस के पांच सांसद\nइस पूरे राजनीतिक विवाद के केंद्र में वित्त मामलों की संसदीय स्थायी समिति है, जिसकी अध्यक्षता वर्तमान में भाजपा सांसद भर्तृहरि महताब कर रहे हैं। इस बहुदलीय समिति को देश की वित्तीय नीतियों, बजटीय आवंटनों और आर्थिक रणनीतियों की समीक्षा करने का जिम्मा सौंपा गया है। समिति की कार्यवाही के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, डिजिटल भुगतान प्रणालियों की वित्तीय स्थिरता पर एक व्यापक रिपोर्ट की समीक्षा और उसे मंजूरी देने के लिए 12 अगस्त को एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी। इस प्रभावशाली समिति की संरचना काफी विविध है, जिसमें प्रमुख आर्थिक निर्णयों पर लोकतांत्रिक सहमति सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व शामिल है।\n\nइस बैठक में हिस्सा लेने वाले सदस्यों में कांग्रेस पार्टी के पांच सांसद शामिल थे: पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ। ये नेता कांग्रेस पार्टी के विधायी विंग के भीतर सबसे अनुभवी और प्रभावशाली चेहरों में से कुछ का प्रतिनिधित्व करते हैं। सरकारी अधिकारियों ने इस बात पर जोर दिया है कि बैठक की आधिकारिक रूप से प्रकाशित कार्यवाही में इनमें से किसी भी विपक्षी सदस्य द्वारा UPI ट्रांजैक्शन चार्ज लगाने के प्रस्ताव पर कोई असहमति पत्र या औपचारिक विरोध दर्ज नहीं कराया गया है। औपचारिक असहमति की कमी को सत्ताधारी दल द्वारा एक मजबूत राजनीतिक तर्क के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि नीति पर विपक्ष के सार्वजनिक विरोध का जवाब दिया जा सके।\n\nयूपीआई शुल्क की सिफारिश के पीछे का आर्थिक तर्क\nइस राजनीतिक गतिरोध की गहराई को समझने के लिए, संसदीय समिति की रिपोर्ट में दिए गए आर्थिक तर्कों को देखना बेहद जरूरी है। चार्ज सिस्टम शुरू करने का मुख्य आधार UPI इकोसिस्टम की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता से जुड़ा था। रिपोर्ट में बताया गया है कि हालांकि केंद्र सरकार ने शून्य-शुल्क व्यवस्था को बनाए रखने के खर्चों की भरपाई के लिए वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 2000 करोड़ रुपये का बजटीय आवंटन किया है, लेकिन इस स्तर के डिजिटल नेटवर्क को चलाने की वास्तविक परिचालन लागत बहुत अधिक है। सरकार राष्ट्रीय खजाने पर अत्यधिक दबाव डाले बिना अनिश्चित काल तक हर एक डिजिटल ट्रांजैक्शन को पूरी तरह से सब्सिडी नहीं दे सकती है।\n\nइन भारी परिचालन खर्चों में सुरक्षित तकनीकी बुनियादी ढांचे का निर्माण और उसे अपग्रेड करना, धोखाधड़ी रोकने के लिए मजबूत सुरक्षा प्रणाली लागू करना और सैकड़ों बैंकों और भुगतान ऐप्स के बीच भारी मात्रा में होने वाले डेटा ट्रैफ़िक को संभालना शामिल है। समिति का तर्क था कि डिजिटल भुगतान प्रणाली को केवल करदाताओं के पैसे से मिलने वाली सरकारी सब्सिडी पर निर्भर रहने के बजाय अंततः एक आत्मनिर्भर मॉडल की ओर बढ़ना चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए कि डिजिटल क्रांति की रफ्तार धीमी न पड़े, तकनीकी ढांचे को लगातार निवेश की आवश्यकता होती है। समिति का मानना था कि इस निवेश का एक हिस्सा सालाना केंद्रीय बजट पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय एक व्यवस्थित रेवेन्यू मॉडल के माध्यम से जुटाया जाना चाहिए।\n\nविपक्ष का विरोध और सरकार का नीतिगत बचाव\nयह राजनीतिक लड़ाई उस समय सार्वजनिक मंच पर आ गई जब राहुल गांधी ने नीतिगत बदलाव की आलोचना करते हुए एक छोटा, 39 सेकंड का वीडियो संदेश जारी किया। अपने बयान में, कांग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा और नए चार्ज सिस्टम को आम UPI उपयोगकर्ताओं पर सीधा टैक्स करार देते हुए इस फैसले को तुरंत वापस लेने की मांग की। इसके अलावा, उन्होंने आरोप लगाया कि इन शुल्कों को लागू करने का उद्देश्य अमेरिका में स्थित बहुराष्ट्रीय वित्तीय कंपनियों को फायदा पहुंचाना था, जिससे यह संकेत मिलता है कि विदेशी ताकतें भारत के डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम को प्रभावित कर रही थीं। इस तीखे हमले का उद्देश्य आम जनता को इस फैसले के खिलाफ लामबंद करना था, जिसे विपक्ष आम आदमी पर एक अनावश्यक बोझ बता रहा है।\n\nवित्त मंत्रालय ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि यह निर्णय किसी बाहरी विदेशी दबाव के बजाय पूरी तरह से घरेलू आर्थिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर लिया गया है। मंत्रालय ने यह भी साफ किया कि 0.4 प्रतिशत का मर्चेंट डिस्काउंट रेट विशेष रूप से 2000 रुपये से अधिक के चुनिंदा व्यावसायिक ट्रांजैक्शन पर लागू होगा और यह चार्ज व्यापारियों (मर्चेंट) से लिया जाएगा, न कि आम ग्राहकों से। इसके परिणामस्वरूप, व्यक्तिगत रूप से किए जाने वाले पीयर-टू-पीयर (P2P) ट्रांसफर और लगभग 96 प्रतिशत छोटे व्यापारिक ट्रांजैक्शन पूरी तरह से इन शुल्कों से मुक्त रहेंगे। सरकार का तर्क है कि यह लक्षित दृष्टिकोण छोटे व्यापारियों और आम नागरिकों के हितों की रक्षा करता है, जबकि बड़े व्यावसायिक संस्थानों को डिजिटल भुगतान बुनियादी ढांचे के रखरखाव में योगदान करने के लिए प्रोत्साहित करता है।\n\nजिरोधा के सीईओ नितिन कामथ द्वारा उठाए गए व्यावहारिक मुद्दे\nइस बहस ने वित्तीय उद्योग के विशेषज्ञों का भी ध्यान खींचा है, जिन्होंने इस चार्ज ढांचे के व्यावहारिक क्रियान्वयन को लेकर चिंताएं व्यक्त की हैं। ऑनलाइन ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म जिरोधा के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी नितिन कामथ ने इस बात पर प्रकाश डाला कि मर्चेंट चार्ज विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों को किस तरह अलग-अलग तरीके से प्रभावित कर सकते हैं। कामथ के विश्लेषण ने इस बहस में एक व्यावहारिक और व्यावसायिक दृष्टिकोण जोड़ा, जो अब तक मुख्य रूप से राजनीतिक बयानबाजी के इर्द-गिर्द घूम रही थी। उन्होंने बताया कि एक समान शुल्क ढांचे विभिन्न उद्योगों के मुनाफे और ट्रांजैक्शन के तरीकों में मौजूद भारी अंतर को ध्यान में नहीं रखता है।\n\nकामथ ने एक सामान्य रिटेल ट्रांजैक्शन और वित्तीय निवेश ट्रांसफर की तुलना करके इसे समझाया। उन्होंने कहा कि यदि कोई ग्राहक 20,000 रुपये का सामान खरीदता है, तो व्यापारी उस बिक्री से सीधा मुनाफा कमाता है और वह भुगतान प्रक्रिया की लागत को आसानी से वहन कर सकता है। इसके विपरीत, यदि कोई निवेशक UPI के माध्यम से अपने स्टॉक ट्रेडिंग खाते में 2 लाख रुपये ट्रांसफर करता है, लेकिन उस विशेष दिन कोई शेयर नहीं खरीदता है, तो स्टॉकब्रोकर को उस ट्रांजैक्शन से कोई तत्काल आय नहीं होती है। इसके बावजूद, ब्रोकर को उस ट्रांजैक्शन के लिए लगने वाले चार्ज का बोझ उठाना पड़ेगा। यह व्यावहारिक चुनौती विविध वित्तीय सेवाओं में एक समान चार्जिंग सिस्टम लागू करने की जटिलताओं को दर्शाती है और एक अधिक सूक्ष्म नियामक दृष्टिकोण की आवश्यकता को रेखांकित करती है।\n\nविवाद का विश्लेषण: बैठक में उपस्थिति बनाम स्पष्ट सहमति\nइस राजनीतिक बहस का मुख्य बिंदु यह है कि क्या समिति में कांग्रेस के पांच सांसदों की मौजूदगी का मतलब सरकार के विशिष्ट चार्ज ढांचे को उनकी सहमति मिलना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी बहुदलीय विधायी बैठक में शामिल होने का मतलब यह नहीं होता कि कोई सांसद सरकार द्वारा बाद में लागू किए जाने वाले हर एक प्रशासनिक विवरण से पूरी तरह सहमत है। संसदीय समिति की रिपोर्ट ने सामान्य रूप से डिजिटल भुगतान के लिए एक चरणबद्ध, टिकाऊ रेवेन्यू मॉडल विकसित करने की सिफारिश की थी। इसने उन सटीक प्रतिशत या ट्रांजैक्शन सीमाओं को तय नहीं किया था जिन्हें बाद में लागू किया गया।\n\nहालांकि, कार्यकारी शाखा द्वारा 2000 रुपये से अधिक के चुनिंदा ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत का विशिष्ट चार्ज लगाने का निर्णय बाद में लिया गया एक प्रशासनिक निर्णय है। इसलिए, जहां सरकार समिति की सहमति का उपयोग विपक्ष के विरोधाभास को उजागर करने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में कर रही है, वहीं विपक्ष का तर्क है कि जिस विशिष्ट तरीके से इन शुल्कों को लागू किया जा रहा है, वह उपभोक्ताओं और छोटे व्यवसायों दोनों को नुकसान करता है। यह चल रहा विवाद भारत की आर्थिक नीतियों को आकार देने में विधायी निगरानी और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच के नाजुक संतुलन को दर्शाता है, विशेष रूप से डिजिटल फाइनेंस जैसे तेजी से बदलते क्षेत्रों में।\n\nइसका आप पर असर\nइस फैसले का सबसे बड़ा असर डिजिटल लेनदेन करने वाले व्यापारियों और बड़े ट्रांजैक्शन करने वाले ग्राहकों पर पड़ेगा।\n\n• मर्चेंट चार्ज का दायरा: नए नियम के तहत 2000 रुपये से अधिक के चुनिंदा व्यापारिक भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत का मर्चेंट चार्ज लगेगा। यह चार्ज सीधे आम ग्राहकों से नहीं लिया जाएगा बल्कि इसे व्यापारियों को चुकाना होगा।\n• छोटे कारोबारियों को राहत: देश के लगभग 96 प्रतिशत छोटे व्यापारियों को इस नए चार्ज से पूरी तरह मुक्त रखा गया है। इसका मतलब है कि छोटे किराना दुकानदारों और स्थानीय विक्रेताओं पर इसका कोई वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा।\n• आम ग्राहकों के लिए मुफ्त सेवाएं: व्यक्तिगत स्तर पर होने वाले पीयर-टू-पीयर (P2P) ट्रांजैक्शन पूरी तरह से मुफ्त रहेंगे। आप अपने दोस्तों या परिवार के सदस्यों को बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के पैसे भेजना जारी रख सकते हैं।\n• ब्रोकरेज और निवेश पर असर: स्टॉक ट्रेडिंग या म्यूचुअल फंड निवेश के लिए बड़े डिजिटल ट्रांसफर करने वाले मध्यस्थों पर इस चार्ज का बोझ बढ़ सकता है। जिरोधा जैसे प्लेटफॉर्म्स को बिना तत्काल कमाई के भी ट्रांजैक्शन फीस का भुगतान करना प़ड़ सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह फैसला यूपीआई भुगतान प्रणाली को बिना सरकारी सब्सिडी के आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से लिया गया है। संसदीय समिति ने इस बात पर जोर दिया था कि डिजिटल ढांचे की सुरक्षा और रखरखाव के लिए एक स्थायी राजस्व मॉडल की आवश्यकता है।\n\n• बुनियादी ढांचे की भारी लागत: डिजिटल ट्रांजैक्शन के बढ़ते दबाव के कारण तकनीकी ढांचे और सर्वर के रख-रखाव का खर्च बहुत बढ़ गया है। समिति का मानना था कि लगातार बढ़ती सुरक्षा और धोखाधड़ी रोकने की लागत को केवल सरकारी मदद से पूरा नहीं किया जा सकता।\n• सब्सिडी पर निर्भरता कम करना: सरकार ने शून्य-शुल्क व्यवस्था बनाए रखने के लिए वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 2000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, लेकिन यह राशि पर्याप्त नहीं है। इस प्रणाली को दीर्घकालिक रूप से चलाने के लिए खुद का आय स्रोत विकसित करना आवश्यक माना गया।\n• संसदीय सहमति का आधार: वित्त मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने सर्वसम्मति से एक चरणबद्ध रेवेन्यू मॉडल विकसित करने की सिफारिश की थी। इस बैठक में मौजूद विपक्षी सांसदों ने भी इस वित्तीय आवश्यकता को स्वीकार करते हुए कोई असहमति दर्ज नहीं की थी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. नए यूपीआई नियम के तहत कितना चार्ज लगाया गया है?\n2000 रुपये से अधिक के चुनिंदा व्यावसायिक ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत का मर्चेंट चार्ज लगाया गया है।\n\n2. क्या आम ग्राहकों को यूपीआई पेमेंट करने पर कोई चार्ज देना होगा?\nनहीं, यह चार्ज केवल व्यापारियों (मर्चेंट) पर लागू होगा और ग्राहकों को अपने सामान्य भुगतानों पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना होगा।\n\n3. इस निर्णय का विरोध करने वाले कांग्रेसी सांसदों को लेकर क्या विवाद है?\nराहुल गांधी इस चार्ज का विरोध कर रहे हैं, लेकिन सरकार का कहना है कि उनकी ही पार्टी के पांच सांसद उस समिति में शामिल थे जिसने यूपीआई के लिए चार्ज सिस्टम की सिफारिश की थी।\n\n4. क्या पीयर-टू-पीयर (P2P) यानी दोस्तों को पैसे भेजने पर भी चार्ज लगेगा?\nनहीं, व्यक्तिगत रूप से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति (P2P) को किए जाने वाले सभी यूपीआई ट्रांसफर पूरी तरह से मुफ्त रहेंगे।\n\n5. जिरोधा के सीईओ नितिन कामथ ने इस नीति को लेकर क्या चिंता जताई है?\nउन्होंने कहा कि यह नियम स्टॉकब्रोकर्स जैसे मध्यस्थों को प्रभावित करेगा, जहां ग्राहक अपने ट्रेडिंग अकाउंट में बड़े फंड ट्रांसफर करते हैं लेकिन ब्रोकर को उससे कोई तत्काल कमाई नहीं होती है।",
  "url": "https://trendkia.com/politics/up-ai-charja-para-modi-sarakara-ko-gherane-vale-rahul-gandhi-apani-hi-parti-ke-sansadon-ke-chalate-kaise-baikaphuta-para-ae-32942",
  "category": "राजनीति",
  "publishedAt": "2026-09-17",
  "tags": [
    "यूपीआई चार्ज",
    "राहुल गांधी",
    "पी चिदंबरम",
    "संसदीय समिति",
    "डिजिटल भुगतान",
    "वित्त मंत्रालय",
    "नितिन कामथ"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}