# अमेरिकी संसद में जीते हुए डेमोक्रेट्स को रोकने के लिए दक्षिणपंथी संस्था ने पेश किया नया कानूनी फॉर्मूला

> सेंटर फॉर रिन्यूइंग अमेरिका ने चुनाव जीतने के बावजूद प्रगतिशील और मुस्लिम सांसदों को शपथ लेने से रोकने की एक विवादास्पद रणनीति पेश की है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रस्ताव अमेरिकी संविधान के बुनियादी नियमों और धार्मिक स्वतंत्रता के सीधे खिलाफ है।

**Type:** article · **Category:** राजनीति · **Published:** 2026-11-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/politics/us-snsada-men-jite-hue-democrats-ko-rokane-ke-lie-dakshinapnthi-snstha-ne-pesha-kiya-naya-kanuni-phormula-55275 · **Language:** Hindi
**Tags:** अमेरिकी संसद, सेंटर फॉर रिन्यूइंग अमेरिका, रसेल वॉट, अमेरिकी संविधान, डेमोक्रेटिक पार्टी, प्रतिनिधि सभा, सीनेट

अमेरिकी विधायी व्यवस्था में एक असाधारण संवैधानिक टकराव की जमीन तैयार की जा रही है, जहां चुनाव में जनता का समर्थन हासिल करने के बाद भी विपक्षी उम्मीदवारों को सदन में प्रवेश से वंचित करने का फॉर्मूला गढ़ा गया है। वॉशिंगटन स्थित दक्षिणपंथी थिंक टैंक सेंटर फॉर रिन्यूइंग अमेरिका ने एक विस्तृत प्रस्ताव के जरिए यह दलील पेश की है कि यदि डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ खास नेता चुनाव जीत भी जाते हैं, तब भी उन्हें संसद की सदस्यता ग्रहण करने से रोका जा सकता है। संस्था की इस नई कार्ययोजना ने कानूनी हलकों और नीति निर्माताओं के बीच तीखी बहस छेड़ दी है, क्योंकि इसमें सीधे तौर पर निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की वैधता को चुनौती दी गई है।

## प्रगतिशील और मुस्लिम नेताओं को निशाना बनाने की दलील
संस्था के कानूनी फेलो बेंजामिन ओसबोर्न द्वारा तैयार किए गए इस दस्तावेज में मुख्य रूप से उन राजनेताओं पर निशाना साधा गया है जिन्हें वे एक कथित वैचारिक गठजोड़ का हिस्सा बताते हैं। इस प्रस्ताव का शीर्षक यह सवाल उठाता है कि क्या अमेरिकी संसद किसी ऐसे निर्वाचित सदस्य को शपथ दिला सकती है जो संविधान को कमजोर करने का इरादा रखता हो। इस विचार को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने तर्क दिया है कि जो उम्मीदवार वामपंथी या प्रगतिशील विचारों के साथ साथ मुस्लिम पृष्ठभूमि से आते हैं, उन्हें सदन की दहलीज पार करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। लेखक का दावा है कि इस समूह के लोग जिस वैचारिक बदलाव की वकालत करते हैं, वह संवैधानिक ढांचे के अनुकूल नहीं है, इसलिए वे पद की सच्ची निष्ठा की शपथ नहीं ले सकते।

इससे पहले संस्था के कार्यकारी निदेशक वेड मिलर ने भी एक अलग दस्तावेज में इसी सोच को विस्तार दिया था। उसमें चार महिला सांसदों के उस चर्चित समूह का खास तौर पर उल्लेख किया गया था, जिन्होंने वर्ष 2018 में संसद में पहली बार जीत दर्ज की थी। इन नेताओं में एलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज, रशीदा तलीब, अयाना प्रेस्ली और इल्हान उमर शामिल हैं। इसके अलावा न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और मिशिगन से सीनेट पद के दावेदार अब्दुल अल-सईद का नाम भी इस श्रेणी में रखा गया है। दस्तावेज का दावा है कि ये नेता पूंजीवाद, ईसाई मान्यताओं और पारंपरिक पश्चिमी राजनीतिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाली विचारधारा के पोषक हैं। हालांकि जिन नेताओं के नाम लिए गए हैं, उनमें से किसी ने भी खुद को मार्क्सवादी नहीं बताया है, यद्यपि ओकासियो-कोर्टेज और ममदानी लोकतांत्रिक समाजवादी के रूप में अपनी पहचान रखते हैं।

## संस्था के संस्थापक और बजटीय शक्तियों का विवाद
सेंटर फॉर रिन्यूइंग अमेरिका की नींव रसेल वॉट ने रखी थी, जो प्रोजेक्ट 2025 के मुख्य रणनीतिकारों में शुमार रहे हैं और इस समय ऑफिस ऑफ मैनेजमेंट एंड बजट के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान जब रसेल वॉट को इस पद के लिए नामित किया गया था, तब मुस्लिम समुदाय पर उनकी पुरानी टिप्पणियों को लेकर भारी विरोध हुआ था। उस समय उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर यह दावा किया था कि इस्लाम धर्म को मानने वालों की धार्मिक समझ में खोट है और वे ईश्वर को सही मायने में नहीं पहचानते।

रसेल वॉट और उनके करीबी सहयोगी खुद को कट्टर संवैधानिक परंपरावादी कहते हैं, लेकिन उन पर प्रशासनिक सत्ता को मजबूत करने के लिए विधायिका के अधिकारों पर अतिक्रमण करने के आरोप लगते रहे हैं। अमेरिकी व्यवस्था के तहत संघीय सरकार के कामकाज के लिए धनराशि मंजूर करने और उसका आवंटन तय करने का अधिकार पूरी तरह संसद के पास है। इसके बावजूद उन्होंने संसद से पारित खरबों डॉलर के फंड को रोकने, उसमें देरी करने या उसे खारिज करने के कई कदम उठाए हैं। पिछले वर्ष उन्होंने पांच अरब डॉलर की विदेशी सहायता राशि पर रोक लगा दी थी, जबकि चालू वर्ष में आठ सौ मिलियन डॉलर से अधिक की रकम वापस छीन ली गई। मेन राज्य की सीनेटर सुसान कॉलिन्स ने सितंबर माह के अंत में आगाह किया था कि यह वित्तीय फैसला इंपाउंडमेंट कंट्रोल एक्ट का सीधा उल्लंघन हो सकता है।

## कानूनी विशेषज्ञों की राय और संवैधानिक सुरक्षा
संवैधानिक मामलों के जानकारों ने इस पूरे कानूनी विचार को सिरे से खारिज कर दिया है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ के प्रोफेसर रिचर्ड पिल्डेस का कहना है कि यह पुरानी व्यवस्थाओं को राजनीतिक स्वार्थ के लिए मोड़ने की एक नई कोशिश है। उनके अनुसार अदालतें इस तरह की व्याख्या को कभी मान्यता नहीं देंगी। वहीं ब्राउन यूनिवर्सिटी में राजनीति और संवैधानिक कानून के प्रोफेसर कोरी ब्रेटशनाइडर ने भी स्पष्ट किया कि यह पूरी कवायद संविधान की आड़ लेकर विरोधियों पर हमला बोलने जैसी है, जिसे कोई भी अदालत तुरंत खारिज कर देगी।

विशेषज्ञों का जोर इस बात पर भी है कि किसी भी सांसद को उसके मजहब या आस्था के आधार पर अयोग्य ठहराना अमेरिकी कानून के तहत पूरी तरह असंभव है। संविधान का स्पष्ट आदेश है कि किसी भी सरकारी या निर्वाचित पद पर बैठने के लिए कोई धार्मिक कसौटी तय नहीं की जा सकती। प्रोफेसर ब्रेटशनाइडर का मानना है कि दक्षिणपंथी विचारक केवल माहौल का परीक्षण करने के लिए ऐसे विचार उछाल रहे हैं ताकि यह देखा जा सके कि जनता और व्यवस्था में इसकी कितनी स्वीकार्यता बनती है। इस पूरे मामले पर अब्दुल अल-सईद के चुनावी कार्यालय या संस्था की ओर से किसी भी तरह की औपचारिक टिप्पणी नहीं की गई है।

## सदन के संख्याबल और ऐतिहासिक मिसाल का असर
यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर क्रिश्चियन ग्रोस का विश्लेषण है कि इस प्रकार की योजना की सफलता सीधे तौर पर चुनावों के बाद सीटों के अंतर पर निर्भर करेगी। यदि सीनेट में डेमोक्रेटिक पार्टी केवल एक या दो सीटों के मामूली अंतर से बढ़त बनाती है, तो रिपब्लिकन सदस्य सत्ता पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए चुनावी परिणामों को चुनौती देने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन यदि यह अंतर चार सीटों या उससे अधिक का होता है, तो ऐसे हथकंडे अपनाना लगभग नामुमकिन हो जाएगा, क्योंकि बड़े पैमाने पर जीते हुए उम्मीदवारों को रोकने की योजना बेहद हास्यास्पद साबित होगी।

प्रतिनिधि सभा में भी इसका पूरा दारोमदार बहुमत के समीकरण पर टिकेगा। यदि रिपब्लिकन पार्टी अपना संख्याबल बचाने में सफल रहती है, तो वह जीते हुए डेमोक्रेट्स को सदन में आने से रोकने के लिए मतदान का सहारा ले सकती है। इतिहास में ऐसा पहले भी देखा जा चुका है। वर्ष 1967 में हार्लेम से चुने गए एडम क्लेटन पॉवेल जूनियर को सदन में बैठने से रोक दिया गया था। वह न्यूयॉर्क राज्य से संसद पहुंचने वाले पहले अश्वेत प्रतिनिधि थे और उन पर वित्तीय हेराफेरी के आरोप लगाकर यह कदम उठाया गया था। प्रोफेसर ग्रोस का कहना है कि यदि वर्ष 2027 की नई संसद शुरू होने तक यह विवाद अदालतों में खिंचता है, तो अंततः जजों के स्थगन आदेश से ही तय होगा कि निर्वाचित सदस्य शपथ ले पाएंगे या नहीं, जिससे न्यायपालिका और विधायिका के बीच सीधा टकराव पैदा हो सकता है।

हालांकि पिल्डेस साफ कहते हैं कि ऐसा होना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं दिखता। इसके बावजूद विशेषज्ञों की चिंता यह है कि भले ही यह रणनीति कानूनी तौर पर टिक न पाए, लेकिन विरोधियों को डराने और कानूनी तंत्र का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में करने का डर बना रहता है, जैसा कि संघीय जांच एजेंसी के पूर्व निदेशक जेम्स कॉमी पर आरोप लगाने के प्रयासों में देखने को मिला था।

## इसका आप पर असर
अमेरिकी संसद में निर्वाचित प्रतिनिधियों को रोकने के इस कानूनी प्रस्ताव से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, चुनावी वैधता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक नीतियों पर दूरगामी असर पड़ सकता है।

- **भारत में प्रभाव:** अमेरिकी विधायी व्यवस्था में अस्थिरता और विदेशी सहायता या रक्षा बजट में देरी से नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच चल रहे द्विपक्षीय समझौतों की गति प्रभावित हो सकती है। भारतीय नीति निर्माताओं को अमेरिकी संसद के शक्ति संतुलन और बजट नीतियों पर करीबी नजर रखनी होगी ताकि रणनीतिक कार्यक्रमों में कोई रुकावट न आए।
- **वैश्विक प्रवासियों पर:** अमेरिका में रहने वाले भारतीय और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नागरिक अधिकारों को लेकर संशय बढ़ सकता है। यदि धार्मिक या वैचारिक आधार पर निर्वाचित नेताओं को चुनौती दी जाती है, तो सार्वजनिक जीवन में अल्पसंख्यक भागीदारी पर प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ सकता है।
- **मतदाताओं के अधिकार:** चुनाव में डाले गए जनमत को प्रशासनिक या कानूनी युक्तियों से खारिज करने की कोशिश चुनावी व्यवस्था के प्रति आम जनता के भरोसे को कमजोर कर सकती है। मतदाताओं के सामने यह अनिश्चितता खड़ी हो सकती है कि उनके द्वारा चुना गया प्रतिनिधि सदन में अपनी आवाज उठा पाएगा या नहीं।
- **द्विपक्षीय विदेशी सहायता:** बजट कार्यालय द्वारा फंड रोके जाने की प्रशासनिक आदतों से विकासशील देशों और वैश्विक सहायता कार्यक्रमों को मिलने वाली वित्तीय मदद में अनिश्चितता पैदा हो सकती है। संबंधित संस्थाओं और गैर-सरकारी संगठनों को अपने बजट और अनुदान के समयबद्ध वितरण को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी।

## ऐसा क्यों हुआ
यह राजनीतिक और कानूनी विवाद अमेरिकी विधायी शक्ति और प्रशासनिक प्रभुत्व के बीच जारी गहरे वैचारिक संघर्ष के कारण उत्पन्न हुआ है। दक्षिणपंथी रणनीतिकारों ने संसद के भीतर प्रगतिशील और अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए नए कानूनी रास्ते तलाशने शुरू किए हैं।

- **वैचारिक ध्रुवीकरण:** अमेरिकी राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण के चलते रूढ़िवादी संस्थाएं प्रगतिशील एजेंडे को रोकने के लिए परंपरागत विधायी तौर-तरीकों से आगे जाकर आक्रामक रणनीतियां बना रही हैं। इसी सोच के तहत चुनाव जीतने के बावजूद विरोधियों को सदन में प्रवेश से रोकने के तर्कों को सार्वजनिक बहस में लाया गया है।
- **प्रशासनिक शक्ति विस्तार:** ऑफिस ऑफ मैनेजमेंट एंड बजट के नेतृत्व द्वारा संसद से स्वीकृत बजट को रोकने के पूर्व कदमों ने कार्यपालिका की शक्तियों को अभूतपूर्व तरीके से बढ़ाने का प्रयास किया है। संस्था से जुड़े रणनीतिकारों का मानना है कि पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।
- **अदालती और ऐतिहासिक मिसालें:** वर्ष 1967 में एडम क्लेटन पॉवेल जूनियर को संसद में बैठने से रोकने की ऐतिहासिक घटना का अध्ययन करके कुछ रणनीतिकार दोबारा वैसा ही दबाव बनाने की संभावना तलाश रहे हैं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने उस समय भी निर्वाचित प्रतिनिधि को पद से बाहर रखने के कदम को खारिज कर दिया था।
- **संकीर्ण चुनावी मार्जिन:** आगामी विधायी चुनावों में दोनों प्रमुख दलों के बीच सीटों का अंतर बेहद कम रहने की संभावना ने ऐसे विवादास्पद कानूनी विचारों को हवा दी है। जब बहुमत का अंतर एक या दो सीटों पर सिमट जाता है, तो हर सीट को कानूनी विवादों में उलझाने की राजनीतिक मंशा बढ़ जाती है।

## सवाल-जवाब

### 1. सेंटर फॉर रिन्यूइंग अमेरिका ने अपनी रिपोर्ट में क्या दावा किया है?
संस्था का तर्क है कि चुनाव जीतने के बाद भी प्रगतिशील और मुस्लिम पृष्ठभूमि के कुछ सांसदों को अमेरिकी संसद में शपथ लेने और बैठने से रोका जा सकता है।

### 2. इस प्रस्ताव का मुख्य लेखक कौन है?
इस दस्तावेज को जॉर्जटाउन लॉ स्कूल के स्नातक और संस्था के लीगल फेलो बेंजामिन ओसबोर्न ने लिखा है।

### 3. संस्था के संस्थापक रसेल वॉट कौन हैं?
रसेल वॉट प्रोजेक्ट 2025 के प्रमुख रणनीतिकार हैं और वर्तमान में अमेरिकी सरकार के ऑफिस ऑफ मैनेजमेंट एंड बजट के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं।

### 4. किन प्रमुख राजनेताओं को इस प्रस्ताव में निशाना बनाया गया है?
इसमें अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज, रशीदा तलीब, अयाना प्रेस्ली, इल्हान उमर, जोहरान ममदानी और अब्दुल अल-सईद के नाम शामिल हैं।

### 5. क्या अमेरिकी संविधान किसी सांसद को धर्म के आधार पर रोकने की अनुमति देता है?
नहीं, अमेरिकी संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी भी सार्वजनिक या निर्वाचित पद के लिए कोई धार्मिक परीक्षण नहीं लिया जा सकता।

### 6. कानूनी विशेषज्ञों का इस योजना के बारे में क्या कहना है?
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह विचार कानूनी रूप से टिक नहीं सकता और अदालतें इसे तुरंत खारिज कर देंगी।

### 7. संसद में जीते हुए सदस्य को रोकने की कौन सी पुरानी मिसाल दी गई है?
वर्ष 1967 में प्रतिनिधि सभा ने हार्लेम से चुने गए पहले अश्वेत प्रतिनिधि एडम क्लेटन पॉवेल जूनियर को फंड के दुरुपयोग के आरोपों के चलते बैठने से रोक दिया था।

### 8. क्या रसेल वॉट पर संसद के बजट संबंधी अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगा है?
हां, उन्होंने संसद द्वारा मंजूर 5 अरब डॉलर की विदेशी सहायता और 800 मिलियन डॉलर से अधिक की राशि पर रोक लगाई थी, जिसे सीनेटर सुसान कॉलिन्स ने इंपाउंडमेंट कंट्रोल एक्ट का संभावित उल्लंघन बताया था।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._