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  "title": "उत्तर प्रदेश: कांग्रेस को बड़ा नुकसान, 35 वर्षों से जुड़े वरिष्ठ नेता अशोक सिंह ने पार्टी छोड़ी",
  "summary": "यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस को अपने गढ़ इटावा में तगड़ा झटका लगा है। लंबे समय तक पार्टी के साथ रहे अशोक सिंह ने कारण बताओ नोटिस मिलने के बाद इस्तीफा दे दिया है।",
  "content": "लखनऊ: आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों में व्यस्त कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। पार्टी को अपने ही एक वरिष्ठ नेता के इस्तीफे से गहरा नुकसान उठाना पड़ा है। एआईसीसी (AICC) के सदस्य अशोक सिंह ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने त्याग पत्र को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के पास भेजा है। अशोक सिंह की गिनती उत्तर प्रदेश के उन प्रमुख नेताओं में होती है, जिनका पार्टी से जाना किसी बड़े झटके से कम नहीं है।\n\n35 वर्षों का लंबा राजनीतिक सफर\nइस्तीफे में अशोक सिंह ने स्पष्ट किया है कि वे पिछले 35 वर्षों से कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े थे और पूरे समर्पण के साथ पार्टी के हितों के लिए कार्य कर रहे थे। अपनी राजनीतिक यात्रा के दौरान उन्होंने करीब 20 वर्षों तक एआईसीसी के सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त, उन्होंने एक लंबे कार्यकाल तक पार्टी के प्रवक्ता की जिम्मेदारी संभाली और उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के संगठन मंत्री के पद पर भी कार्यरत रहे। एनएसयूआई (NSUI), युवा कांग्रेस और प्रदेश कांग्रेस में उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहकर संगठन को मजबूती देने का प्रयास किया।\n\nअनुशासन समिति का नोटिस और नाराजगी\nअशोक सिंह के इस्तीफे के पीछे का मुख्य कारण पार्टी की अनुशासन समिति द्वारा 4 जुलाई 2026 को जारी किया गया कारण बताओ नोटिस है। इस नोटिस में उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था। अशोक सिंह ने इस कार्रवाई को अपने वर्षों के समर्पण का अपमान माना है। उनका कहना है कि 35 वर्षों की लंबी निष्ठा के बाद इस तरह के आरोपों और नोटिस से वे काफी आहत हैं, जिसके चलते उन्होंने खुद को पार्टी से अलग करने का कठिन निर्णय लिया है।\n\nबीजेपी के मंच पर देखी गई उपस्थिति\nसूत्रों के अनुसार, इटावा क्षेत्र की राजनीति में अपनी पैठ रखने वाले अशोक सिंह को हाल ही में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के एक कार्यक्रम में मंच साझा करते हुए देखा गया था। उनकी इस उपस्थिति के बाद ही कांग्रेस के अन्य स्थानीय नेताओं ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसी शिकायत पर संज्ञान लेते हुए कांग्रेस नेतृत्व ने उनसे स्पष्टीकरण मांगा था, जिसने बाद में उनके इस्तीफे की पटकथा लिख दी।\n\nसपा के साथ गठबंधन का असर\nइटावा जिला समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके परिवार का पारंपरिक और मजबूत गढ़ माना जाता है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, और ऐसी प्रबल संभावना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में भी ये दोनों दल एक साथ मैदान में उतरेंगे। स्थानीय स्तर पर कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं और नेताओं को यह महसूस होने लगा है कि सपा के साथ गठबंधन की राजनीति में उनकी अपनी पहचान धुंधली हो रही है। उन्हें लगता है कि इन इलाकों में कांग्रेस का अस्तित्व केवल एक सहयोगी दल बनकर रह गया है। माना जा रहा है कि अशोक सिंह की यह नाराजगी इसी राजनीतिक घुटन का परिणाम है, जहां उन्हें भविष्य में अपने लिए कोई विशेष स्थान नजर नहीं आ रहा था।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में गठबंधन की राजनीति के चलते पुराने और अनुभवी नेताओं के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस को अपने जमीनी नेटवर्क को बचाए रखने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।\n\nइटावा में: स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं को इस इस्तीफे के बाद अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं और भविष्य की रणनीति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता हो सकती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. अशोक सिंह ने कांग्रेस से इस्तीफा क्यों दिया?\nअशोक सिंह पार्टी की अनुशासन समिति द्वारा 4 जुलाई 2026 को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस से आहत थे, जिसमें उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था।\n\n2. अशोक सिंह कितने वर्षों से कांग्रेस से जुड़े थे?\nअशोक सिंह पिछले 35 वर्षों से कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़े हुए थे और विभिन्न पदों पर कार्य कर रहे थे।\n\n3. अशोक सिंह को किस घटना के बाद नोटिस मिला था?\nअशोक सिंह को तब नोटिस मिला था जब उन्हें इटावा में बीजेपी के मंच पर देखा गया था, जिसकी शिकायत पार्टी के अन्य नेताओं ने की थी।\n\n4. इटावा में कांग्रेस के सामने क्या समस्या है?\nइटावा समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता है, और सपा-कांग्रेस गठबंधन के कारण स्थानीय कांग्रेस नेताओं को लगता है कि उनकी भूमिका केवल सहयोगी दल तक ही सीमित रह गई है।",
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  "category": "राजनीति",
  "publishedAt": "2026-07-09",
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