उत्तर प्रदेश राजनीति: मायावती का हमला और चंद्रशेखर का करारा जवाब, आखिर क्या है यह सियासी खींचतान? उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। मायावती ने सार्वजनिक प्रदर्शनों को मगरमच्छ के आंसू बताया, जिस पर चंद्रशेखर ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया और तल्ख अध्याय तब शुरू हुआ जब बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने परोक्ष रूप से युवा सांसद चंद्रशेखर आजाद की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार किया। मेरठ में दलित छात्रा ललिता गौतम की नृशंस हत्या के मामले में न्याय की मांग को लेकर चंद्रशेखर आजाद द्वारा किए जा रहे प्रदर्शनों को मायावती ने 'मगरमच्छ के आंसू' करार दिया है। उन्होंने सीधे तौर पर किसी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन जिस तरह से उन्होंने इन प्रदर्शनों और सड़कों पर उतरने की राजनीति को कठघरे में खड़ा किया, उससे यह साफ हो गया कि उनका निशाना चंद्रशेखर ही थे। मायावती का कानून और संविधान पर जोर मायावती ने मीडिया के सामने अपनी बात रखते हुए इस बात पर जोर दिया कि किसी भी अन्याय के विरुद्ध लड़ाई कानून के दायरे में रहकर लड़ी जानी चाहिए, न कि कानून को हाथ में लेकर। उन्होंने मेरठ, सहारनपुर, प्रयागराज और हरदोई जैसे जिलों में हो रहे आए दिन के प्रदर्शनों पर चिंता जताते हुए कहा कि आंदोलन करने वाले संगठन अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए पीड़ित वर्गों को उकसाते हैं। उनका आरोप था कि ऐसी पार्टियां पहले हिंसा और हंगामा कराती हैं, चक्का जाम करती हैं और फिर बाद में वहां पहुंचकर मगरमच्छ के आंसू बहाकर अपनी राजनीति चमकाती हैं। मायावती के अनुसार, इस तरह की सड़कों पर उतरने की राजनीति से पीड़ितों को न्याय नहीं मिलता, बल्कि उनके कष्ट और अधिक बढ़ जाते हैं। उन्होंने बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के बताए रास्ते पर चलकर एकजुटता और वोट की ताकत से 'सत्ता की मास्टर चाबी' हासिल करने की नसीहत दी। चंद्रशेखर का पलटवार मायावती के इन बयानों के बाद चंद्रशेखर आजाद ने भी बिना किसी देरी के मोर्चा संभाल लिया। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद समर्थकों के बीच उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर की। चंद्रशेखर ने कहा कि मायावती की बातों से उनके मन को गहरी ठेस पहुंची है। उन्होंने पूछा कि क्या उन्हें यह देखना चाहिए कि बहनों के साथ अत्याचार हो, उन पर तेजाब फेंका जाए, उन्हें मारकर लटकाया जाए और फिर 10 साल तक न्याय की प्रतीक्षा में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। चंद्रशेखर ने सीधे चुनौती देते हुए कहा कि अगर यह मगरमच्छ के आंसू बहाना है, तो वे (मायावती) भी समाज के बीच आएं और ऐसा ही करें। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे ऐसी निष्क्रियता या केवल अदालतों के भरोसे बैठने की राजनीति नहीं सीखना चाहते। उन्होंने कहा कि समाज यह देख रहा है कि उनके लिए कौन सड़क पर उतरकर संघर्ष कर रहा है और कौन केवल वोट का रिश्ता रखता है। राजनीतिक बदलाव और मायावती का रुख वर्ष 2007 से 2012 तक मायावती ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार का नेतृत्व किया था, जिस दौरान पार्कों के निर्माण और अन्य निर्णयों को लेकर वे चर्चाओं में रहीं। हालांकि 2012 के बाद से बीएसपी की चुनावी स्थिति लगातार कमजोर होती गई। साल 2014 के लोकसभा चुनावों में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ, तब से मायावती की सक्रियता और तेवर में बदलाव देखा गया। 2014 के बाद से उनकी पार्टी की चुनावी हार का सिलसिला ऐसा चला कि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनकी सीटें 19 तक सिमट गईं। इसके बाद से ही राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम रही कि उन्होंने आक्रामक रुख छोड़ दिया है। अब, चंद्रशेखर आजाद जैसे युवा नेताओं के उभरने और उनके द्वारा जमीनी स्तर पर विरोध प्रदर्शन करने की रणनीति ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां बहुजन राजनीति के भविष्य को लेकर दो अलग-अलग पीढ़ियों के बीच टकराव साफ दिख रहा है। इसका आप पर असर भारत में: दलित और वंचित वर्गों से जुड़े आंदोलनों की दिशा और नेतृत्व को लेकर आगामी चुनावों में मतदाताओं के लिए विकल्पों की स्पष्टता बढ़ेगी। उत्तर प्रदेश में: राज्य के दलित मतदाताओं को अब तय करना होगा कि वे मायावती की पारंपरिक कानूनी और संगठनात्मक राजनीति का समर्थन करते हैं या चंद्रशेखर आजाद के आक्रामक और सड़क-आधारित आंदोलन का। सवाल-जवाब 1. मायावती ने चंद्रशेखर आजाद के विरोध प्रदर्शन को क्या कहा? मायावती ने चंद्रशेखर आजाद के प्रदर्शनों को मगरमच्छ के आंसू बहाने वाला और राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित बताया है। 2. चंद्रशेखर आजाद ने मायावती को क्या जवाब दिया? चंद्रशेखर ने कहा कि उनके कार्यकर्ता सड़कों पर जान की बाजी लगाकर लड़ रहे हैं और उन्होंने मायावती से खुद भी समाज के बीच आकर संघर्ष करने की चुनौती दी। 3. मायावती का आंदोलनों के प्रति क्या सुझाव है? मायावती का मानना है कि पीड़ितों को सड़कों पर उतरने के बजाय कानून के दायरे में रहकर सर्वोच्च न्यायालय तक न्याय के लिए जाना चाहिए। 4. उत्तर प्रदेश में मायावती की राजनीतिक स्थिति कैसी है? साल 2014 के बाद से मायावती की चुनावी सीटें और पार्टी का जनाधार लगातार कम हुआ है, जिससे उनकी राजनीति के भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं। https://trendkia.com/politics/uttar-pradesh-rajaniti-mayawati-ka-hamala-aura-chandrashekhar-azad-ka-karara-javaba-akhira-kya-hai-yaha-siyasi-khinchatana-6600 TrendKia — Har trend, sabse pehle.