# पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी का नया दांव, वाम दलों और कांग्रेस के साथ सुगबुगाहट तेज

> पश्चिम बंगाल में 15 साल का शासन गंवाने के बाद ममता बनर्जी ने आगामी विधानसभा उपचुनावों से दूरी बना ली है। अब वह अपनी पार्टी को बचाने और विपक्षी इंडिया ब्लॉक को धार देने के लिए वाम दलों और कांग्रेस के साथ मिलकर नई राजनीतिक बिसात बिछा रही हैं।

**Type:** article · **Category:** राजनीति · **Published:** 2026-09-15 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/politics/west-bengal-ki-rajaniti-men-mamata-banerjee-ka-naya-danva-vama-dalon-aura-congress-ke-satha-sugabugahata-teja-32374 · **Language:** Hindi
**Tags:** ममता बनर्जी, पश्चिम बंगाल, तृणमूल कांग्रेस, सुवेंदु अधिकारी, विधानसभा उपचुनाव, इंडिया गठबंधन, वाम दल, कांग्रेस

पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों बेहद दिलचस्प और अहम मोड़ से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आगामी विधानसभा उपचुनावों में खुद मैदान में न उतरने का कड़ा और बड़ा फैसला लिया है। उनके तमाम करीबियों और समर्थकों ने उन्हें चुनाव लड़ने का जोरदार आग्रह किया था, लेकिन उन्होंने इससे किनारा कर लिया। इस कदम ने देश के राजनीतिक गलियारों में उनके भविष्य के सियासी सफर को लेकर तमाम अटकलों को जन्म दे दिया है। कुछ समय पहले ही भारतीय जनता पार्टी की आंधी के आगे उनका लगातार 15 साल पुराना शासन ढह गया था, और उनके कभी बेहद करीबी सिपहसालार रहे सुवेंदु अधिकारी राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए।

 

## उपचुनावों से दूरी और राजनीतिक समीकरण

आगामी 6 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल में रेजीनगर और नंदीग्राम विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने जा रहे हैं। इन सीटों पर पहले जीतने वाले नेताओं ने इस्तीफा दे दिया था, जिसके चलते यहां दोबारा मतदान की नौबत आई है। रेजीनगर सीट से जीतने वाले हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी को इस क्षेत्र से उपचुनाव लड़ने का खुला न्योता दिया था और उनकी जीत तय करने का दावा भी किया था। दूसरी ओर, प्रतिद्वंद्वी गुट का नेतृत्व कर रहे रिताब्रता बनर्जी के खेमे ने साफ कहा था कि यदि ममता खुद मैदान में उतरती हैं, तो वे नंदीग्राम में अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेंगे। इसके बावजूद, 71 वर्षीय नेता ने चुनाव से दूर रहने का ही निर्णय लिया है। रेजीनगर और नौदा जैसी ये दोनों सीटें मुर्शिदाबाद जिले में आती हैं, जहां मुस्लिम आबादी करीब 70 फीसदी के आसपास है। पिछले चुनावों में यहां सियासी समीकरण बदलते दिखे थे, जहां भाजपा दूसरे और तृणमूल तीसरे स्थान पर खिसक गई थी, जो राज्य में गहरे होते ध्रुवीकरण की साफ कहानी कहता है।

 

## संगठन पर नियंत्रण की जंग और पारिवारिक दखل

सत्ता जाने के बाद से ही ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले धड़े और रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी तृणमूल गुट के बीच पार्टी के असली नाम और उसके ‘दो फूलों’ वाले चुनाव चिह्न पर मालिकाना हक पाने के लिए भीषण कानूनी व राजनीतिक संघर्ष चल रहा है। इस प्रतिष्ठित चुनाव चिह्न को खुद ममता ने ही डिजाइन किया था। पार्टी के भीतर से और बाहर जाने वाले नेताओं ने खुलकर इस बात की चर्चा की है कि सरकार और प्रशासन चलाने के भारी दबाव ने संगठन की पकड़ को कमजोर कर दिया था। हालांकि ममता ने कभी कड़ा रुख अपनाते हुए सार्वजनिक तौर पर नेताओं को डांटा और लीडरशिप कमेटियों को भंग करके दोबारा गठित किया, लेकिन ज्यादातर मौकों पर उन्हें अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के हाथों में संगठन की बागडोर जाते हुए बेबस देखना पड़ा। अब वह जमीनी स्तर से पार्टी को फिर से मजबूत करने की बात कह रही हैं, लेकिन अंदरूनी कलह और कानूनी लड़ाइयों ने उनकी राह को बेहद कांटेदार बना दिया है.

 

## विपक्षी खेमे में नई गोलबंदी और कांग्रेस-लेफ्ट से नजदीकी

सत्ता से बेदखल होने और पार्टी में दोफाड़ होने के बाद, ममता बनर्जी ने अपने धुर विरोधियों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। उन्होंने उन कम्युनिस्टों और कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर नया समीकरण साधने की कोशिश शुरू कर दी है, जिनसे उनका रिश्ता 1998 में पूरी तरह टूट गया था। इसके साथ ही, वह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी इंडिया ब्लॉक को एकजुट करने की अपनी मुहिम में भी जुटी हुई हैं। हालांकि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी और एम.के. स्टालिन की द्रविड़ मुनेत्र कड़गम जैसी क्षेत्रीय पार्टियां इस विपक्षी मंच से दूरी बना चुकी हैं, फिर भी कई नेताओं को पूरा भरोसा है कि ममता के व्यक्तिगत सियासी रिश्ते 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले तमाम दलों को एक मंच पर वापस ला सकते हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ममता अब राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का चेहरा बनने के बजाय क्षेत्रीय राजनीति पर ही अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहती हैं, जबकि उनके अन्य रणनीतिकार इसे उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं की एक बड़ी सियासी चाल के रूप में देखते हैं.

 

## भ्रष्टाचार के आरोप और भविष्य की चुनौतियां

पूर्ववर्ती सरकार के इन पंद्रह सालों के सफर पर अब धोखाधड़ी, गबन, रिश्वतखोरी, जबरन वसूली और तस्करी जैसे गंभीर और संगीन आरोपों के काले बादल मंडरा रहे हैं। इन तमाम विवादों ने तृणमूल कांग्रेस की साख को गहरा धक्का पहुंचाया है। एक तरफ जहां पार्टी के भीतर वर्चस्व की लड़ाई जारी है, वहीं दूसरी तरफ ममता बनर्जी के सामने अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाने की कठिन चुनौती है। बंगाल की राजनीति की यह नई चाल आने वाले समय में देश के राष्ट्रीय विपक्षी गठबंधन के भविष्य और राज्य की सियासत की दिशा तय करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगी। जब तक ममता अपने संगठन पर पूरी तरह से नियंत्रण बहाल नहीं कर लेतीं, तब तक भाजपा के मजबूत सियासी रथ के पहियों को रोकना उनके लिए किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा।

## इसका आप पर असर
ममता बनर्जी के चुनाव न लड़ने के फैसले और बंगाल की राजनीति में हो रहे नए गठजोड़ का सीधा असर राज्य के आम मतदाताओं और राजनीतिक माहौल पर पड़ेगा।

    - **पश्चिम बंगाल में:** आगामी उपचुनावों के नतीजे यह तय करेंगे कि राज्य में विपक्षी ताकतों और तृणमूल के असंतुष्ट धड़े का भविष्य क्या होगा। मतदाताओं को नए राजनीतिक समीकरणों के बीच स्थानीय मुद्दों पर स्पष्ट विकल्प देखने को मिलेगा।

    - **राष्ट्रीय स्तर पर:** विपक्षी इंडिया ब्लॉक के भीतर रणनीतिक बदलाव आने की संभावना है। क्षेत्रीय दलों के रुख में बदलाव से आगामी राष्ट्रीय चुनावों में विपक्ष की एकजुटता और सीटों के तालमेल पर सीधा असर पड़ सकता है।

    - **राजनीतिक ध्रुवीकरण:** मुर्शिदाबाद और आसपास के जिलों में चल रहे सियासी फेरबदल से स्थानीय समुदायों के बीच राजनीतिक समीकरण बदलेंगे। इससे शासन व्यवस्था और विकास कार्यों पर जनता की सीधी प्रतिक्रिया देखने को मिलेगी।

    - **संगठन की स्थिति:** पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान से कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच असमंजस की स्थिति बन सकती है। प्रशासनिक स्थिरता और स्थानीय विकास योजनाओं पर इसका असर पड़ना तय है।

## ऐसा क्यों हुआ
ममता बनर्जी द्वारा उपचुनावों से दूरी बनाने और वाम दलों तथा कांग्रेस के साथ नया राजनीतिक संपर्क साधने के पीछे कई कारण छिपे हैं।

    - **सत्ता परिवर्तन का असर:** इस साल हुए चुनावों में भाजपा की भारी जीत के बाद 15 साल पुराना शासन समाप्त हो गया, जिससे पार्टी को जमीनी स्तर पर भारी झटका लगा।

    - **संगठन में दोफाड़:** पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर गंभीर मतभेद उभर आए और प्रतिद्वंद्वी धड़े के साथ चुनाव चिह्न और नाम को लेकर कानूनी संघर्ष छिड़ गया।

    - **भ्रष्टाचार के आरोप:** शासनकाल के दौरान लगे धोखाधड़ी, गबन और रिश्वतखोरी जैसे गंभीर आरोपों के कारण पार्टी की छवि को बड़ा नुकसान पहुंचा था।

    - **विपक्षी एकजुटता की मजबूरी:** राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए ममता बनर्जी पुराने वैचारिक मतभेदों को भुलाकर नए गठजोड़ तलाश रही हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. ममता बनर्जी ने आगामी विधानसभा उपचुनाव लड़ने से क्यों इनकार किया है?
उन्होंने मौजूदा और पूर्व सहयोगियों के आग्रह के बावजूद उपचुनाव न लड़ने का फैसला किया है, जिससे उनके व्यापक राजनीतिक हितों को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

### 2. पश्चिम बंगाल में विधानसभा उपचुनाव कब और किन सीटों पर होंगे?
पश्चिम बंगाल की रेजीनगर और नंदीग्राम विधानसभा सीटों पर आगामी 6 अक्टूबर को उपचुनाव आयोजित किए जाएंगे।

### 3. सुवेंदु अधिकारी वर्तमान में किस पद पर हैं?
सुवेंदु अधिकारी वर्तमान में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने पिछले चुनावों में ममता बनर्जी को हराया था।

### 4. मुर्शिदाबाद जिले की इन सीटों पर मुख्य राजनीतिक समीकरण क्या है?
मुर्शिदाबाद जिले में मुस्लिम आबादी करीब 70 प्रतिशत है, जहां पिछले चुनावों में भाजपा दूसरे और तृणमूल तीसरे स्थान पर खिसक गई थी।

### 5. पार्टी के चुनाव चिह्न को लेकर किनके बीच विवाद चल रहा है?
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले धड़े और रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले प्रतिद्वंद्वी तृणमूल गुट के बीच पार्टी के नाम और 'दो फूलों' वाले लोगो को लेकर संघर्ष जारी है।

### 6. ममता बनर्जी अब किन दलों के साथ गठबंधन की कोशिश कर रही हैं?
ममता बनर्जी ने अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी कम्युनिस्टों और कांग्रेस पार्टी की ओर गठबंधन का हाथ बढ़ाया है।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._