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  "type": "article",
  "title": "पश्चिम बंगाल एसआईआर ट्रिब्यूनल से एक और पूर्व जज का इस्तीफा, बिस्वजीत बसु ने छोड़ी समिति",
  "summary": "पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के लिए बनाए गए न्यायाधिकरण से एक और पूर्व न्यायाधीश ने इस्तीफा दे दिया है। पिछले कुछ समय में पैनल छोड़ने वाले यह चौथे सदस्य बन गए हैं।",
  "content": "पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण कार्य से जुड़ी एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती सामने आ रही है। कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व जज बिस्वजीत बसु ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर न्यायाधिकरण से अपना इस्तीफा सौंप दिया है। उन्होंने अपने इस कदम के पीछे व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया है और कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रवींद्र विठ्ठलराव घुगे को पत्र लिखकर पद छोड़ने की जानकारी दी है।\n\nन्यायाधिकरण छोड़ने वाले चौथे सदस्य\nबिस्वजीत बसु के इस फैसले के साथ ही इस विशेष पैनल को छोड़ने वाले जजों की संख्या चार हो गई है। इससे पहले पूर्व न्यायाधीश इंद्रजीत चटर्जी ने भी इस जिम्मेदारी से खुद को अलग कर लिया था। उन्होंने अपने फैसले के पीछे कार्यालय आने-जाने में होने वाली लंबी दूरी का जिक्र किया था। उनका कहना था कि रोजाना 22 किलोमीटर का सफर तय करना उनके लिए काफी कठिन हो रहा था। उन्होंने शुरुआत में यह मानकर इस कार्यभार को स्वीकार किया था कि यह प्रक्रिया महज दो से तीन महीनों में पूरी हो जाएगी, लेकिन जिस तरह से मामलों की पेंडेंसी बढ़ रही है, उससे साफ है कि इस काम में काफी लंबा वक्त लगेगा।\n\nलगातार हो रहे हैं इस्तीफे\nइस पैनल से किनारा करने वाले जजों की फेहरिस्त में अन्य नाम भी शामिल हैं। पूर्व जस्टिस रंजीत कुमार बाग ने भी व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए इस समिति से नाता तोड़ लिया था, हालांकि उन्होंने अपने पत्र में विस्तृत वजहों का स्पष्ट रूप से जिक्र नहीं किया था। इसके अलावा, कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवज्ञानम ने भी पारिवारिक परेशानियों का हवाला देते हुए न्यायाधिकरण की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।\n\nक्या है न्यायाधिकरण का गठन\nजानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के खास निर्देशों के आधार पर इस न्यायाधिकरण का गठन किया गया था। इस पैनल में कुल 19 सेवानिवृत्त न्यायाधीश और मजिस्ट्रेट शामिल किए गए थे। इसका मुख्य उद्देश्य उन तमाम नागरिकों को एक मंच और तंत्र उपलब्ध कराना था, जिनके नाम एसआईआर प्रक्रिया पूरी होने के बाद अंतिम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए थे, ताकि वे अपने दावों की सुनवाई करवाकर दोबारा नाम जुड़वा सकें। अब चार सदस्यों के बाहर होने के बाद 19 लोगों की इस टीम में सदस्यों की संख्या घट गई है।\n\nलाखों मतदाताओं के मामलों पर असमंजस\nपश्चिम बंगाल में लगभग 60 लाख मामलों को न्यायिक समीक्षा और निर्णय के लिए लंबित रखते हुए अंतिम मतदाता सूची को 28 फरवरी के दिन प्रकाशित किया गया था। चुनाव आयोग की तरफ से यह स्पष्ट किया गया था कि जैसे-जैसे न्यायिक कार्यवाही आगे बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे पूरक सूचियों को भी जारी किया जाएगा।\n\nअगर आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले साल नवंबर के महीने में एसआईआर की आधिकारिक अधिसूचना जारी होने से पहले राज्य में पंजीकृत मतदाताओं की कुल संख्या 7,66,37,529 थी। इसके बाद जब दिसंबर में मसौदा मतदाता सूची सबके सामने आई, तो उसमें से 58,20,899 नाम हटा दिए गए थे। वहीं, इस साल 28 फरवरी को जब अंतिम सूची का प्रकाशन हुआ, तब तक हटाए गए नामों का कुल आंकड़ा 63,66,952 तक पहुंच चुका था।\n\nइस पूरे ट्रिब्यूनल के कंधों पर इन्हीं हटाए जाने वाले नामों से जुड़े मुकदमों और दावों के निस्तारण की बड़ी जिम्मेदारी है। आने वाले समय में जो भी पूरक सूचियां प्रकाशित होंगी, उनमें इन्हीं न्यायिक जांच के नतीजों को शामिल किए जाने की उम्मीद है। जिन पात्र आवेदकों के दावे वैध पाए जाएंगे और स्वीकार किए जाएंगे, उन्हें मतदाता सूची में अपना नाम दोबारा दर्ज कराने का मौका मिल सकेगा।\n\nइसका आप पर असर\nयह न्यायाधिकरण पश्चिम बंगाल के उन लाखों मतदाताओं के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी सहारा था जिनके नाम सूची से हटा दिए गए थे।\n\n• पश्चिम बंगाल में: लगभग 60 लाख लंबित मामलों की सुनवाई कर रहे पैनल से एक के बाद एक जजों के हटने से पूरी न्यायिक प्रक्रिया और सत्यापन कार्य की गति धीमी हो सकती है। इससे प्रभावित नागरिकों को अपनी अपील के निपटारे के लिए और अधिक समय तक इंतजार करना पड़ सकता है।\n• राष्ट्रीय स्तर पर: मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण से जुड़े इस तरह के बड़े प्रशासनिक घटनाक्रम देश की चुनावी व्यवस्था और न्यायिक पैनलों के कामकाज पर बड़ा असर डालते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारी संख्या में मामलों के निपटारे के लिए समयसीमा और कार्यभार का प्रबंधन कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nन्यायाधिकरण के सदस्यों द्वारा लगातार इस्तीफा दिए जाने के पीछे कई व्यावहारिक और व्यक्तिगत कारण सामने आए हैं। जजों ने कार्यभार संभालने के बाद काम के भारी बोझ और लंबी अवधि को इसकी मुख्य वजह बताया है।\n\n• लंबी दूरी और समय: पूर्व न्यायाधीश इंद्रजीत चटर्जी ने रोजाना 22 किलोमीटर आने-जाने में होने वाली कठिनाई को अपना पद छोड़ने का मुख्य कारण बताया था।\n• कार्यभार का अनुमान: शुरुआत में सदस्यों ने सोचा था कि यह पूरी प्रक्रिया कुछ ही महीनों में सिमट जाएगी, लेकिन लंबित मामलों की विशाल संख्या ने यह साफ कर दिया कि इसमें बहुत अधिक समय लगेगा।\n• व्यक्तिगत कारण: बिस्वजीत बसु और रंजीत कुमार बाग जैसे जजों ने अपने इस्तीफे के पीछे व्यक्तिगत और पारिवारिक वजहों का हवाला दिया है, जिसके चलते वे इस लंबी चलने वाली जिम्मेदारी को आगे जारी नहीं रख सके।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बिस्वजीत बसु कौन हैं?\nबिस्वजीत बसु कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व जज हैं जिन्होंने हाल ही में एसआईआर न्यायाधिकरण से इस्तीफा दिया है।\n\n2. बिस्वजीत बसु ने अपना इस्तीफा किसे सौंपा?\nउन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रवींद्र विठ्ठलराव घुगे को पत्र लिखकर अपना इस्तीफा भेजा है।\n\n3. न्यायाधिकरण से इस्तीफा देने वाले वे कौन से नंबर के सदस्य हैं?\nवे इस विशेष पैनल से इस्तीफा देने वाले चौथे सदस्य बन गए हैं।\n\n4. इस न्यायाधिकरण का गठन क्यों किया गया था?\nसुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर उन लोगों के लिए एक तंत्र प्रदान करने हेतु इसका गठन किया गया था जिनके नाम एसआईआर प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची से हटा दिए गए थे।\n\n5. अंतिम मतदाता सूची कब प्रकाशित की गई थी?\nपश्चिम बंगाल की अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी को प्रकाशित की गई थी।",
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  "publishedAt": "2026-11-07",
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