उत्तर प्रदेश 2027 चुनाव से पहले महिलाओं पर बड़ा दांव, रसोइयों और शिक्षामित्रों की सैलरी बढ़ी उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए योगी सरकार ने रसोइयों और शिक्षामित्रों के मानदेय में बड़ी बढ़ोतरी की है। इसके साथ ही स्वास्थ्य बीमा और अन्य सुविधाओं का तोहफा भी दिया गया है। उत्तर प्रदेश का राजनीतिक पारा चढ़ता जा रहा है क्योंकि 2027 का विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे नजदीक आ रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपनी चुनावी तैयारियों को तेज कर दिया है। राज्य की सियासत में पारंपरिक जातीय समीकरणों के अलावा किसान, युवा और रोजगार जैसे मुद्दे हर दिन चर्चा में बने रहते हैं। हालांकि, पिछले कुछ चुनावों से एक और ऐसा वर्ग है जिस पर हर दल की पैनी नजर है और वह है महिला मतदाता। उत्तर प्रदेश की राजनीति में आधी आबादी अब केवल एक चुनावी नारा बनकर नहीं रह गई है, बल्कि मतदान के समय इनकी भूमिका बेहद निर्णायक साबित होती है। इस सियासी बदलाव को सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रखा जा सकता, क्योंकि महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल, मध्यप्रदेश, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्यों में भी महिला शक्ति ने चुनावी नतीजों को पलटकर रख दिया है। इसी बड़े राजनीतिक परिदृश्य के बीच योगी आदित्यनाथ सरकार ने कई अहम कदम उठाए हैं, जिनमें स्कूलों में भोजन तैयार करने वाली रसोइयों से लेकर शिक्षामित्रों के मानदेय में इजाफा शामिल है। रक्षाबंधन के पावन पर्व से पहले करीब 3.54 लाख रसोइयों के लिए चार बड़े तोहफों का ऐलान किया गया है। राजनीतिक गलियारों में इस पूरी कवायद को आधी आबादी को साधने की एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। रसोइयों के मानदेय में ऐतिहासिक इजाफा इस पूरी राजनीतिक बिसात पर सबसे बड़ा कदम वह माना जा रहा है जिसने चुनाव से पहले चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। प्रधानमंत्री पोषण योजना के तहत स्कूलों में बच्चों के लिए खाना बनाने वाली रसोइयों का मासिक मानदेय ₹2 हजार से बढ़ाकर ₹3 हजार कर दिया गया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेशभर में लगभग 3.53 से 3.54 लाख रसोइया इस सेवा से जुड़ी हुई हैं। ये महिलाएं करीब 1.41 लाख परिषदीय और सहायता प्राप्त विद्यालयों में लगभग 1.46 करोड़ बच्चों के लिए रोजाना भोजन तैयार करती हैं। इस फैसले का सबसे अहम पहलू इसके पीछे की सामाजिक संरचना है। इन पदों पर काम करने वाले कुल कर्मियों में लगभग 93 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार ने जिस वर्ग के मानदेय में बढ़ोतरी की है, उसका सबसे बड़ा फायदा सीधे तौर पर महिलाओं के खातों तक पहुंच रहा है। यही वजह है कि जानकार इसे केवल एक साधारण प्रशासनिक फैसला न मानकर राजनीतिक दृष्टिकोण से भी काफी अहम मान रहे हैं। साल दर साल कितनी बढ़ी रसोइयों की आय? अगर पिछले कुछ वर्षों में रसोइयों को मिलने वाले मानदेय के सफर पर नजर डालें तो पूरी तस्वीर और अधिक स्पष्ट हो जाती है। एक समय इन्हें हर महीने मात्र ₹1 हजार मिलते थे। इसके बाद साल 2019 में इस राशि को बढ़ाकर ₹1 हजार 500 किया गया। फिर साल 2022 में यह मानदेय बढ़कर ₹2 हजार तक पहुंचा और अब साल 2026 में इसे बढ़ाकर ₹3 हजार कर दिया गया है। इस तरह बीते कुछ वर्षों में मानदेय में तीन गुना तक की वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि यहां यह गौर करने वाली बात है कि रसोइयों को यह भुगतान साल के 10 महीनों के लिए ही मिलता है। नई और संशोधित व्यवस्था के तहत अब इन्हें हर महीने ₹3 हजार के हिसाब से राशि मिलेगी, जिससे सालाना आधार पर यह कुल रकम ₹30 हजार तक हो जाएगी। कम आमदनी वाले और कमजोर वर्ग के परिवारों के लिए यह बढ़ोतरी काफी मायने रखती है। यही कारण है कि सरकार इस कदम को केवल वित्तीय सहायता के रूप में नहीं, बल्कि एक पुख्ता सामाजिक सुरक्षा के रूप में जनता के सामने रख रही है। वेतन के साथ मिला स्वास्थ्य और बीमा सुरक्षा कवच योगी सरकार की ओर से केवल मानदेय बढ़ाने की घोषणा ही नहीं की गई है, बल्कि इसके साथ कई अन्य कल्याणकारी प्रावधान भी जोड़े गए हैं। रसोइयों और उनके पूरे परिवार को सालाना ₹5 लाख तक की कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने का बड़ा ऐलान किया गया है। इसके अलावा किसी भी दुर्घटना की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में परिवार को ₹2 हजार 500 नहीं बल्कि ₹2 लाख की आर्थिक सहायता दिए जाने का नियम बनाया गया है। साथ ही उनके परिधान यानी ड्रेस के लिए मिलने वाली राशि को भी ₹500 से बढ़ाकर ₹1 हजार कर दिया गया है। इस तरह सरकार ने आर्थिक मदद के साथ-साथ चिकित्सा और जीवन सुरक्षा का एक पूरा पैकेज तैयार कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस योजना का प्रभाव केवल रसोई तक काम करने वाली महिला तक सीमित नहीं रहेगा। जब घर की किसी महिला की आय बढ़ती है और उसे गंभीर बीमारी या दुर्घटना के समय इलाज का भरोसा मिलता है, तो उसका मनोवैज्ञानिक और सामाजिक असर उसके पूरे परिवार तथा सगे-संबंधियों तक पहुंचता है। शिक्षामित्रों और अनुदेशकों की झोली में भी राहत रसोइयों से कुछ समय पहले ही योगी सरकार ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़े अन्य मानदेय कर्मियों जैसे शिक्षामित्रों और अनुदेशकों की आय में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी की थी। अप्रैल 2026 से शिक्षामित्रों का मानदेय ₹10 हजार से बढ़ाकर सीधे ₹1 हजार 18000 कर दिया गया, जबकि अनुदेशकों का मानदेय ₹9 हजार से बढ़ाकर ₹17 हजार कर दिया गया था। इन सभी वर्गों के लिए भी कैशलेस मेडिकल सुविधाओं का प्रावधान किया गया था। शिक्षामित्रों का मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से बेहद संवेदनशील रहा है, जहां वे स्थायी नौकरी और बेहतर मानदेय को लेकर लगातार अपनी आवाज उठाते रहे हैं। ऐसे में ₹18 हजार का बढ़ा हुआ मानदेय उनके लिए एक बड़ी आर्थिक राहत लेकर आया है। जब इस फैसले को रसोइयों के लिए हाल ही में लिए गए निर्णयों के साथ जोड़कर देखा जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार शिक्षा विभाग से जुड़े संविदा और मानदेय वाले हर बड़े वर्ग को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है। घर-घर तक पहुंच रहा सरकार का सियासी संदेश इस पूरी नीति का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू यह है कि यह जमीनी स्तर पर कैसे असर डालती है। विद्यालय में भोजन बनाने वाली रसोइया अमूमन उसी गांव या मोहल्ले के स्थानीय परिवारों से ताल्लुक रखती है। इसी तरह शिक्षामित्र भी अपने क्षेत्र में अच्छी खासी सामाजिक पहचान और पकड़ रखते हैं। इसका मतलब यह है कि सरकार द्वारा उठाया गया कोई भी कदम केवल एक फाइल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह गांव के चौपालों और बैठकों की चर्चा बन जाता है। जब किसी रसोइया के खाते में पहले की तुलना में अधिक राशि आएगी और उसके साथ इलाज की गारंटी भी होगी, तो वह परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूती देगा। ठीक इसी प्रकार शिक्षामित्रों के मानदेय में हुई वृद्धि भी उनके घरेलू बजट की तस्वीर बदल देगी। इन तमाम कल्याणकारी योजनाओं के जरिए सरकार का संदेश साधारण लाभार्थी की सीमा लांघकर पूरे परिवार और व्यापक समाज तक प्रभावी ढंग से पहुंच रहा है। चुनावी समीकरणों में क्यों खास हुई आधी आबादी? उत्तर प्रदेश का चुनावी इतिहास लंबे समय से विभिन्न जातियों के इर्द-गिर्द बुना जाता रहा है। यादव, गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम वोटों को हमेशा से अलग-अलग खानों में बांटकर चुनावी गणित तय किया जाता रहा है। लेकिन आने वाले 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों का यह पूरा समीकरण बदलता हुआ नजर आ रहा है। अब महिला मतदाताओं को किसी एक जाति या वर्ग के चश्मे से देखने के बजाय एक स्वतंत्र, बहुत बड़ी और पूरी तरह निर्णायक राजनीतिक ताकत के रूप में देखा जा रहा है। यही वजह है कि तमाम राजनीतिक दल आधी आबादी को अपने पाले में करने के लिए लगातार नई-नई रणनीतियां बना रहे हैं और योगी सरकार के ये ताजा फैसले इसी राजनीतिक दिशा में एक बड़ा कदम माने जा रहे हैं। इसका आप पर असर • भारत में: राज्य स्तर पर महिलाओं और मानदेय कर्मियों के लिए उठाए जाने वाले इस तरह के वित्तीय कदम देश के अन्य राज्यों में भी कल्याणकारी नीतियों और चुनावी रणनीतियों को प्रभावित कर सकते हैं। • उत्तर प्रदेश में: यूपी के लाखों रसोइयों, शिक्षामित्रों और उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा तथा उन्हें बेहतर स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिलेगा। सवाल-जवाब 1. उत्तर प्रदेश में रसोइयों का बढ़ा हुआ मानदेय कितना कर दिया गया है? पीएम पोषण योजना के तहत स्कूलों में खाना बनाने वाली रसोइयों का मासिक मानदेय ₹2 हजार से बढ़ाकर ₹3 हजार कर दिया गया है। 2. रसोइयों को मिलने वाले मानदेय का भुगतान कितने महीनों के लिए होता है? रसोइयों को यह मानदेय साल के 10 महीनों के लिए प्रदान किया जाता है। 3. रसोइयों और उनके परिवारों को स्वास्थ्य के लिहाज से क्या लाभ मिलेगा? रसोइयों और उनके परिवारों को सालाना ₹5 लाख तक की कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा देने की घोषणा की गई है। 4. शिक्षामित्रों और अनुदेशकों का मानदेय कब बढ़ाया गया था? अप्रैल 2026 से शिक्षामित्रों का मानदेय ₹10 हजार से बढ़ाकर ₹18 हजार और अनुदेशकों का मानदेय ₹9 हजार से बढ़ाकर ₹17 हजार कर दिया गया है। 5. रसोइयों के लिए दुर्घटना की स्थिति में कितनी आर्थिक सहायता का प्रावधान है? दुर्घटना की स्थिति में रसोइयों के लिए ₹2 लाख की आर्थिक सहायता का प्रावधान घोषित किया गया है। https://trendkia.com/politics/yogi-government-boosts-salaries-for-cooks-and-shikshamitras-ahead-of-up-2027-elections-21046 TrendKia — Har trend, sabse pehle.