# यूनिफॉर्म सिविल कोड पर 2029 का बड़ा दांव, अमित शाह के ऐलान से कैसे घिर गए अखिलेश और असदुद्दीन ओवैसी

> अमित शाह की ओर से 2029 से पहले एनडीए शासित 21 राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के ऐलान के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। इस कदम से विपक्षी दलों और मुस्लिम नेताओं की नींद उड़ गई है।

**Type:** article · **Category:** राजनीति · **Published:** 2026-09-16 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/politics/yuniphorma-sivila-koda-para-2029-ka-bara-danva-amit-shah-ke-ailana-se-kaise-ghira-gae-akhilesh-yadav-aura-asaduddin-owaisi-32558 · **Language:** Hindi
**Tags:** यूनिफॉर्म सिविल कोड, अमित शाह, अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी, एनडीए, राजनीति, उत्तर प्रदेश

पीएम नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार लगातार ऐसे कदम उठा रही है जिससे राजनीतिक गलियारों में खलबली मची रहती है। ब्रिक्स सम्मेलन में अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराने के बाद अब केंद्र सरकार की ओर से एक ऐसा एजेंडा सामने आया है जिससे विपक्षी दलों, असदुद्दीन ओवैसी और अन्य राजनीतिक विरोधियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। विपक्ष पहले से ही इस बात को लेकर असमंजस में था कि सरकार कब महिला आरक्षण विधेयक या परिसीमन से जुड़ा कदम उठाएगी, लेकिन अब एक नए और बड़े मुद्दे ने पूरी बहस की दिशा ही बदल दी है। सरकार ने साल 2029 का बड़ा एजेंडा अभी से तय कर दिया है और यह मुद्दा यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता का है। इस योजना को देश भर में एक बड़े स्तर पर लागू करने की तैयारी है और इसके लिए एक निश्चित समयसीमा भी तय कर दी गई है। इसी टाइमलाइन और ऐलान के सामने आने के बाद से विपक्षी खेमे में हलचल मच गई है।

कांग्रेस पार्टी से लेकर अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और असदुद्दीन ओवैसी तक सभी नेता इस मुद्दे पर खुलकर मैदान में आ चुके हैं। जैसे ही समान नागरिक संहिता को लेकर बात सामने आई, वैसे ही मोदी विरोधियों के बीच हड़कंप मच गया। आखिर क्यों अखिलेश यादव इस कानून का इतनी मुखरता से विरोध कर रहे हैं और यदि यह कानून लागू हो जाता है तो राहुल गांधी और अखिलेश यादव की राजनीतिक रणनीति के सामने किस तरह की गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं, यह एक बड़ा सवाल बन गया है। इस सियासी उठापटक का असर केवल विपक्षी गठबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि एनडीए के भीतर भी इसको लेकर अलग-अलग चर्चाएं शुरू हो गई हैं। एक तरफ जहां तमाम नेता इस कानून पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, वहीं पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के सामने भी नई तरह की राजनीतिक चिंताएं खड़ी हो गई हैं।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने बंगाल के राजनीतिक समीकरणों को साधने के लिए अपनी रणनीति तेज कर दी है। जब से भाजपा ने यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर अपना स्पष्ट प्लान सामने रखा है, तब से विपक्षी गठबंधन में भारी बैचेनी देखी जा रही है। इसकी मुख्य वजह यह है कि समान नागरिक संहिता हमेशा से भाजपा के प्रमुख वैचारिक वादों में शामिल रही है। जिस प्रकार से सरकार ने अपने पुराने और बड़े वादों को एक-एक करके अमलीजामा पहनाया है, उससे विपक्ष के मन में यह डर बैठ गया है कि इस वादे को भी हर हाल में पूरा कर दिया जाएगा।

पार्टी ने अपने पुराने संकल्पों के तहत अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का वादा पूरा किया और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर एक देश और एक विधान के अपने संकल्प को सिद्ध किया। अब इसके बाद अगली बारी यूनिफॉर्म सिविल कोड की है। समान नागरिक संहिता के लागू होने का मतलब यह है कि शादी, तलाक और संपत्ति जैसे पारिवारिक और नागरिक मामलों में अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ की जगह देश भर के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था लागू हो जाएगी। भाजपा का प्रयास है कि साल 2029 का समय आने से पहले ही इस वादे को भी पूरा कर दिया जाए। इसी कड़ी में गृह मंत्री अमित शाह ने इस एजेंडे को पूरा करने के लिए स्पष्ट टाइमलाइन तय करते हुए यह कह दिया है कि एनडीए शासित 21 राज्यों में इसे लागू कर दिया जाएगा।

अमित शाह के इसी बयान के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। इस घोषणा का सबसे तीखा और शुरुआती झटका उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को लगा है। अखिलेश यादव इन दिनों राम मंदिर से जुड़े मुद्दों और अन्य विषयों को लेकर खुद को मुखर हिंदू हितैषी के रूप में पेश करने की रणनीति बना रहे थे ताकि भाजपा को घेरा जा सके। लेकिन सरकार की ओर से इस नए और बड़े मुद्दे के आने के बाद अखिलेश यादव अपनी असहजता को छिपा नहीं पा रहे हैं और विपक्षी नेताओं में वे सबसे पहले इसके विरोध में खुलकर सामने आए हैं।

अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी और लिखा कि जनता यह अच्छी तरह समझ रही है कि भाजपा जिस यूसीसी की बात कर रही है, असल में उसका दूसरा अर्थ कुछ और है। उन्होंने तंज कसते हुए इसे अंडरग्राउंड कम्यूनल कांस्पिरेसी करार दिया। उन्होंने आगे कहा कि सरकार को पहले अपने पुराने वादे पूरे करने चाहिए और उसके बाद ही किसी नए कानून की बात करनी चाहिए। उन्होंने जनता के बीच नए जुमले लाने और बहकाने का आरोप लगाते हुए कहा कि पहले सबके खातों में पंद्रह-पंद्रह लाख रुपये पहुंचाए जाएं, दो करोड़ नौकरियां दी जाएं और सबका साथ देने का दावा सच साबित किया जाए, उसके बाद ही यूसीसी पर बात की जाए।

अखिलेश यादव के इस लंबे चौड़े बयान के बाद यह सवाल उठता है कि आखिर वे इस मुद्दे को लेकर इतने परेशान क्यों हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेता अबू आजमी ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। चूंकि अमित शाह ने एनडीए शासित सभी اکیس राज्यों में इसे लागू करने की बात कही है, इसलिए सबसे ज्यादा सरगर्मी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक माहौल में देखने को मिल रही है, क्योंकि वहां आगामी चुनाव नजदीक हैं। यदि भाजपा उत्तर प्रदेश में यूनिफॉर्म सिविल कोड को जोर-शोर से आगे बढ़ाती है, तो अखिलेश यादव के सामने एक बड़ी राजनीतिक उलझन पैदा हो सकती है।

इस उलझन की कई बड़ी वजहें हैं। एक तरफ जहां मुस्लिम समुदाय और मौलाना इस मुद्दे पर बहुत मुखर होकर विरोध जता रहे हैं, वहीं यह समुदाय समाजवादी पार्टी का मुख्य और पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है। ऐसे में अखिलेश यादव को इस संवेदनशील मुद्दे पर काफी आक्रामक रुख अपनाना पड़ रहा है। दूसरी तरफ वे अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के जरिए सवर्णों, दलितों और पिछड़ों को भी अपने साथ जोड़े रखना चाहते हैं। लेकिन यदि इस कानून की वजह से राज्य में धार्मिक ध्रुवीकरण तेज होता है, तो अखिलेश यादव की राजनीतिक मुश्किलें काफी बढ़ सकती हैं। इसके अलावा राज्य की एक बड़ी हिंदू आबादी को इस कानून से कोई खास परेशानी नजर नहीं आती है। साथ ही असदुद्दीन ओवैसी भी इस मैदान में पूरी ताकत से डटे हुए हैं और इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं, जिससे अखिलेश यादव के सामने अपने मुस्लिम वोट बैंक के बंटने का भी बड़ा खतरा पैदा हो गया है।

अखिलेश यादव की इस राजनीतिक चिंता के बीच उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के एक मंत्री ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य सरकार इस कानून को लागू करने के लिए पूरी तरह तैयार है। हालांकि अभी उत्तर प्रदेश में यूनिफॉर्म सिविल कोड को औपचारिक रूप से लागू नहीं किया गया है, बल्कि केवल इसकी चर्चा मात्र से ही राज्य का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। इस विषय पर अब धर्मगुरु भी आमने-सामने आ गए हैं। एक तरफ जहां मुस्लिम मौलाना इस कानून के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ संत समाज से जुड़े लोग इसका खुले दिल से स्वागत कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में चल रही इस गहमागहमी के बीच ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी इस लड़ाई में कूदने की तैयारी कर चुका है। यूनिफॉर्म सिविल कोड और अन्य मुद्दों को लेकर आगामी 17 सितंबर को पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से जंतर-मंतर पर सेव कॉन्स्टिट्यूशन और सेव शरिया आंदोलन की शुरुआत की जाएगी। इस पूरे विवाद में असदुद्दीन ओवैसी की सक्रिय एंट्री से विपक्षी गठबंधन की मुश्किलें और अधिक बढ़ने वाली हैं, क्योंकि वे इस मामले पर बहुत आक्रामक तरीके से अपनी बात रख रहे हैं।

## इसका आप पर असर
यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने की दिशा में कदम बढ़ने से देश के आम नागरिकों के पारिवारिक और कानूनी मामलों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं, जिसका सीधा असर हर व्यक्ति के दैनिक जीवन और कानूनों पर पड़ेगा।

- **भारत में:** देश भर में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में सभी धर्मों के नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू होने की प्रक्रिया तेज होगी। इससे विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव आएगा और सभी के लिए एक साझा कानूनी प्रक्रिया तय होगी।
- **उत्तर प्रदेश में:** आगामी चुनावों और राजनीतिक सरगर्मी के बीच राज्य में धार्मिक और सामाजिक समीकरणों पर गहरा असर पड़ेगा। राजनीतिक दलों के बीच इस मुद्दे पर ध्रुवीकरण बढ़ने से स्थानीय मतदाताओं के बीच वैचारिक बहस तेज होगी।
- **कानूनी प्रक्रिया:** अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ की जगह एक समान नागरिक संहिता आने से अदालतों में पारिवारिक मामलों के निपटारे के तरीके में बड़ा बदलाव आ सकता है।
- **राजनीतिक असर:** विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों के विरोध प्रदर्शनों के कारण आम जनता को सार्वजनिक आयोजनों और यातायात में हंगामे या प्रदर्शनों का सामना करना पड़ सकता है।
- **मतदाता वर्ग:** विभिन्न समुदायों के वोट बैंक पर सीधा असर पड़ने के कारण राजनीतिक दल अपनी रणनीतियों में बदलाव करेंगे जिसका प्रभाव आगामी चुनावों पर पड़ेगा।

## ऐसा क्यों हुआ
यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर सरकार की तरफ से अचानक उठाए गए इस कदम के पीछे पार्टी के वैचारिक वादों को पूरा करने की लंबी राजनीतिक रणनीति जुड़ी हुई है।

- **वैचारिक प्रतिबद्धता:** भाजपा ने अपने पुराने घोषणापत्रों और वादों के तहत पहले ही राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 हटाने जैसे बड़े कदम उठाए हैं, जिसके बाद समान नागरिक कोड को लागू करना उनका अगला प्रमुख वैचारिक संकल्प है।
- **समयसीमा का निर्धारण:** सरकार ने साल 2029 का लक्ष्य तय करते हुए एनडीए शासित 21 राज्यों में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की समयसीमा तय की है ताकि प्रक्रिया को तय समय के भीतर पूरा किया जा सके।
- **राजनीतिक समीकरण:** उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में आगामी चुनावों को देखते हुए और विपक्षी दलों को राजनीतिक रूप से घेरने के उद्देश्य से इस मुद्दे को सबसे आगे लाया गया है।
- नया एजेंडा सेट होने से विपक्ष की मौजूदा रणनीति और उन मुद्दों की धार कमजोर हो गई है जिन पर वे सरकार को घेरने की तैयारी कर रहे थे।

## सवाल-जवाब

### 1. यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने के लिए सरकार ने क्या टाइमलाइन तय की है?
गृह मंत्री अमित शाह के मुताबिक, साल 2029 से पहले एनडीए शासित 21 राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू किया जाएगा।

### 2. अखिलेश यादव ने यूनिफॉर्म सिविल कोड को क्या नया नाम दिया है?
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर इस कानून को अंडरग्राउंड कम्यूनल कांस्पिरेसी करार दिया है।

### 3. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कब और कहां आंदोलन शुरू करने जा रहा है?
पर्सनल लॉ बोर्ड आगामी 17 सितंबर को जंतर-मंतर पर सेव कॉन्स्टिट्यूशन-सेव शरिया आंदोलन की शुरुआत करेगा।

### 4. यूनिफॉर्म सिविल कोड के दायरे में कौन से मामले आते हैं?
इसके तहत शादी, तलाक और परिवार से जुड़े दूसरे सिविल मामलों में धर्म के आधार पर अलग-अलग पर्सनल लॉ की जगह एक समान कानून होता है।

### 5. इस मुद्दे पर सबसे पहले किसने खुलकर विरोध जताया है?
विपक्षी नेताओं में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने सबसे पहले इस मुद्दे पर खुलकर विरोध जताया है।

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