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  "type": "article",
  "title": "धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोपों में घिरे निशु और संजय आजाद, एफआईआर की अर्जी पर पटियाला हाउस कोर्ट करेगा सुनवाई",
  "summary": "सोशल मीडिया पर देवी-देवताओं के खिलाफ कथित आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट करने के मामले में निशु आजाद और संजय आजाद पर एफआईआर दर्ज कराने की याचिका पटियाला हाउस कोर्ट पहुंच गई है, जिस पर अदालत में सुनवाई होगी।",
  "content": "राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत में सोशल मीडिया पर हिंदू देवी-देवताओं के संबंध में कथित रूप से विवादित टिप्पणियां करने के मामले में एक याचिका दायर की गई है। इस कानूनी अर्जी में निशु आजाद और उनके पिता संजय आजाद के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। मुख्य महानगर दंडाधिकारी की अदालत ने इस मामले को औपचारिक रूप से स्वीकार करते हुए विचार के लिए 23 सितंबर 2026 की तारीख निर्धारित की है।\n\nसुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता ने दी थी साइबर थाने में शिकायत\nइस पूरे मामले की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड अमिता सचदेवा द्वारा की गई कानूनी पहल से हुई। उन्होंने सबसे पहले 5 सितंबर को नई दिल्ली जिला साइबर पुलिस स्टेशन में दोनों आरोपियों के विरुद्ध एक लिखित शिकायत सौंपी थी। जब शिकायतकर्ता को पुलिस की तरफ से तत्काल अपेक्षित कानूनी कार्रवाई होती नहीं दिखी, तब उन्होंने पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश जारी करवाने के लिए अदालत की शरण ली।\n\nअदालत में पेश की गई याचिका में यह स्पष्ट आरोप लगाया गया है कि निशु आजाद के सोशल मीडिया प्रोफाइल से जानबूझकर हिंदू आस्था से जुड़े प्रतीकों पर हमला किया गया। शिकायत में विशेष रूप से भगवान शिव, भगवान श्रीकृष्ण, मां सरस्वती और मां दुर्गा को लेकर साझा की गई कथित आपत्तिजनक पोस्टों का ब्योरा दिया गया है।\n\nकिन कानूनी धाराओं के तहत केस दर्ज करने की है मांग?\nयाचिकाकर्ता ने नए आपराधिक कानून यानी भारतीय न्याय संहिता (BNS) के विभिन्न कड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई की गुहार लगाई है। इसमें मुख्य रूप से बीएनएस की धारा 196 शामिल है, जो धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता और वैमनस्य फैलाने से जुड़ी है। इसके साथ ही धारा 299 के तहत भी कार्रवाई की मांग की गई है, जो किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करने से संबंधित है।\n\nइसके अतिरिक्त याचिका में सूचना प्रौद्योगिकी कानून के सुसंगत प्रावधानों और बीएनएस की धारा 353 का भी संदर्भ दिया गया है। अदालत अब यह तय करेगी कि क्या प्रारंभिक साक्ष्यों के आधार पर जांच एजेंसी को सीधे मामला दर्ज करने का निर्देश दिया जाना चाहिए या अन्य कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।\n\nइलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और आईपी लॉग सुरक्षित रखने की गुहार\nमामले में डिजिटल साक्ष्यों की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत से एक महत्वपूर्ण अंतरिम राहत की भी मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद विवादित पोस्ट, अकाउंट से जुड़े इंटरनेट प्रोटोकॉल यानी आईपी लॉग और अन्य तकनीकी डिजिटल रिकॉर्ड को तुरंत संरक्षित किया जाए।\n\nशिकायतकर्ता का तर्क है कि जांच के दौरान इन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से छेड़छाड़ या उन्हें डिलीट किए जाने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में समय रहते डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित होने से पुलिस जांच में ठोस मदद मिलेगी और अदालत के समक्ष पुख्ता तकनीकी प्रमाण पेश किए जा सकेंगे।\n\nइसका आप पर असर\nधार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले सोशल मीडिया मामलों में अदालत की यह सुनवाई डिजिटल अभिव्यक्ति और कानूनी सीमाओं के प्रति नागरिकों को सतर्क करती है।\n\n• भारत में: सोशल मीडिया पर किसी भी धर्म या आस्था के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट करने पर बीएनएस की धाराओं और आईटी एक्ट के तहत सीधी कानूनी कार्रवाई हो सकती है। यूजर्स को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सामग्री साझा करते समय वैमनस्य और कानूनी दायित्वों का ध्यान रखना जरूरी है।\n• दिल्ली में: स्थानीय साइबर पुलिस थानों में दर्ज शिकायतों पर अदालती निगरानी बढ़ने से जांच प्रक्रियाओं में तेजी आ सकती है। राजधानी के नागरिकों के लिए साइबर मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप के कानूनी रास्ते और अधिक स्पष्ट होते हैं।\n• डिजिटल रिकॉर्ड पर: सोशल मीडिया पर डाली गई सामग्री और आईपी लॉग को सुरक्षित रखने की मांग यह दिखाती है कि पोस्ट डिलीट करने के बाद भी डिजिटल साक्ष्य मिटाना आसान नहीं होता। ऑनलाइन मामलों में तकनीकी प्रमाणों की भूमिका जांच का सबसे मजबूत आधार बन रही है।\n• कानूनी प्रावधानों पर: नए आपराधिक कानूनों यानी बीएनएस के तहत धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने से जुड़ी धाराओं का परीक्षण अब अदालतों में शुरू हो चुका है। ऐसे मामलों से यह तय होगा कि सोशल मीडिया के विवादों में नए कानूनों की व्याख्या किस तरह की जाएगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह कानूनी विवाद सोशल मीडिया पर देवी-देवताओं पर की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों और उस पर पुलिस की ओर से तुरंत मुकदमा दर्ज न किए जाने के कारण उत्पन्न हुआ।\n\n• सीधा कारण: निशु आजाद के सोशल मीडिया हैंडल से भगवान शिव, श्रीकृष्ण, मां सरस्वती और मां दुर्गा को लेकर कथित तौर पर आपत्तिजनक सामग्री साझा की गई थी। इस सामग्री को धार्मिक आस्था का अपमान मानते हुए कानूनी शिकायत दर्ज कराई गई।\n• अदालत जाने की वजह: सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता अमिता सचदेवा ने 5 सितंबर को नई दिल्ली के साइबर पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी की मांग की थी। पुलिस द्वारा अपेक्षित त्वरित कार्रवाई न किए जाने पर उन्होंने पटियाला हाउस कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।\n• इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का आधार: साइबर मामलों में पोस्ट हटाने या सबूत मिटाने की संभावना के चलते याचिकाकर्ता ने आईपी लॉग और संबंधित डिजिटल रिकॉर्ड्स को तुरंत सुरक्षित करने का अनुरोध अदालत से किया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. पटियाला हाउस कोर्ट में यह याचिका किसके खिलाफ दायर की गई है?\nयह याचिका निशु आजाद और उनके पिता संजय आजाद के खिलाफ सोशल मीडिया पर कथित आपत्तिजनक पोस्ट को लेकर दायर की गई है।\n\n2. याचिकाकर्ता ने किन देवी-देवताओं के संदर्भ में विवादित पोस्ट का आरोप लगाया है?\nयाचिका में भगवान शिव, भगवान श्रीकृष्ण, मां सरस्वती और मां दुर्गा से जुड़ी पोस्टों पर आपत्ति जताई गई है।\n\n3. इस मामले में अदालत में सुनवाई कब निर्धारित की गई है?\nपटियाला हाउस कोर्ट के मुख्य महानगर दंडाधिकारी के समक्ष इस मामले की सुनवाई 23 सितंबर 2026 को होगी।\n\n4. याचिकाकर्ता ने किन कानूनी धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज करने की मांग की है?\nयाचिका में बीएनएस की धारा 196, धारा 299, धारा 353 और आईटी कानून के तहत मामला दर्ज करने का अनुरोध किया गया है।\n\n5. शिकायतकर्ता ने अदालत जाने से पहले पुलिस में कब शिकायत दी थी?\nशिकायतकर्ता ने 5 सितंबर को दिल्ली के नई दिल्ली जिला साइबर पुलिस स्टेशन में पहली शिकायत दी थी।",
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  "category": "पंजाब",
  "publishedAt": "2026-09-22",
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