पंजाब के मंत्री संजीव अरोड़ा को बड़ा झटका, हाई कोर्ट ने खारिज की जमानत याचिका पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पंजाब के कैबिनेट मंत्री संजीव अरोड़ा की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। उन्होंने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए कानूनी सुरक्षा उपायों के उल्लंघन का आरोप लगाया था। पंजाब के सियासी गलियारों से एक बड़ी खबर सामने आ रही है, जहाँ पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले के तहत पंजाब सरकार के कैबिनेट मंत्री संजीव अरोड़ा की नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। मंत्री ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी थी और कोर्ट का रुख किया था। गिरफ्तारी और रिमांड को दी थी चुनौती संजीव अरोड़ा ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर अपनी गिरफ्तारी, गिरफ्तारी के कानूनी आधार और इसके बाद दिए गए रिमांड आदेश को पूरी तरह से रद्द करने की मांग की थी। अपनी कानूनी दलीलों में उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि उनकी गिरफ्तारी के दौरान कानूनी सुरक्षा उपायों और उनके मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन किया गया है, जिसके चलते उन्हें राहत मिलने की पूरी उम्मीद थी। मंत्री के वकीलों ने दी थीं ये दलीलें सुनवाई के दौरान संजीव अरोड़ा की ओर से पक्ष रखते हुए बताया गया कि वह वर्तमान में पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं और इससे पहले राज्यसभा के सांसद भी रह चुके हैं। समाज में उनकी मजबूत प्रतिष्ठा है और उनका सार्वजनिक रिकॉर्ड पूरी तरह बेदाग रहा है। अदालत को यह भी जानकारी दी गई कि वह गत 9 मई से लगातार हिरासत में हैं। इसके अलावा, उनके वकीलों ने पीठ को बताया कि गुरुग्राम में मनी लॉन्ड्रिंग मामलों के विशेष न्यायाधीश के समक्ष उनकी तरफ से नियमित जमानत के लिए जो अर्जी लगाई गई थी, उसे भी 15 जून को खारिज कर दिया गया था। याचिका में यह भी स्पष्ट किया गया कि वह 'मैसर्स हैम्पटन स्काई रियल्टी लिमिटेड' (HSRL) के प्रमोटर और चेयरमैन हैं। वर्ष 1987 में स्थापित यह कंपनी विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक कार्यों का संचालन करती है। उनके वकील ने अदालत को बताया कि मंत्री पद संभालने के बाद से उन्होंने इस कंपनी के रोजाना के कामकाज में किसी भी तरह की हिस्सेदारी या भाग लेना बंद कर दिया था। अभियोजन पक्ष पर उठाए गए थे सवाल याचिकाकर्ता पक्ष का यह भी तर्क था कि अभियोजन पक्ष का पूरा मामला बुनियादी तौर पर ही त्रुटिपूर्ण है। उनके अनुसार, प्रतिवादी पक्ष ऐसा कोई भी 'अनुसूचित अपराध' (scheduled offence) साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है, जिससे कथित तौर पर अपराध से प्राप्त कोई आय उत्पन्न हुई हो और जिसका कोई भी सीधा संबंध याचिकाकर्ता के साथ जुड़ता हो। अरोड़ा की तरफ से तर्क दिया गया कि पूरी जाँच के दौरान जो भी साक्ष्य जुटाए गए हैं, वे मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत किसी भी अपराध के जरूरी तत्वों को साबित नहीं करते हैं। अदालत में यह पक्ष भी रखा गया कि ऐसा कोई भी ठोस सबूत पेश नहीं किया जा सका है जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता ने अपराध से मिली कथित आय को छिपाने, अपने पास रखने, हासिल करने, उसका इस्तेमाल करने या फिर उसे वैध बनाने की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की कोई भूमिका निभाई थी। तलाशी और बरामदगी को लेकर उठाए गए सवाल अपनी याचिका में मंत्री की ओर से यह भी बात जोर देकर कही गई कि प्रतिवादी जाँच एजेंसी द्वारा उनके खुद के आवास, उनके बेटे के घर और 'मैसर्स हैम्पटन स्काई रियल्टी लिमिटेड' के दफ्तर परिसरों पर व्यापक स्तर पर छापेमारी और तलाशी ली गई थी। इसके बावजूद एजेंसी को वहाँ से कोई भी आपत्तिजनक दस्तावेज, बिना किसी हिसाब-किताब वाली संपत्ति, डिजिटल रिकॉर्ड या ऐसा कोई भी सबूत हाथ नहीं लगा जो यह साबित कर सके कि याचिकाकर्ता ने किसी भी तरह का कोई गैरकानूनी अपराध किया है। इसका आप पर असर यह अदालत का फैसला पंजाब के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि एक सेवारत कैबिनेट मंत्री की जमानत याचिका खारिज होने से राज्य की राजनीति पर सीधा असर पड़ा है। - भारत में: देशभर में मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के मामलों में केंद्रीय जाँच एजेंसियों की कानूनी कार्रवाई और न्यायिक रुख को लेकर एक कड़ा संदेश गया है। ऐसे मामलों में आरोपित राजनीतिक हस्तियों के लिए कानूनी राहत पाना और अधिक कठिन हो गया है। - पंजाब में: राज्य सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री के लगातार हिरासत में रहने और जमानत खारिज होने से प्रशासनिक कामकाज और राजनीतिक समीकरणों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। विपक्षी दलों द्वारा सरकार पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है और राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। ऐसा क्यों हुआ संजीव अरोड़ा की जमानत याचिका खारिज होने का मुख्य कारण केंद्रीय जाँच एजेंसी द्वारा पेश किए गए साक्ष्य और मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम के कड़े कानूनी प्रावधान रहे हैं। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला सुनाया। - कानूनी प्रावधान: प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत दर्ज मामलों में जमानत देने के लिए अदालत को यह संतुष्ट होना पड़ता है कि प्रथम दृष्टया आरोपी दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए वह कोई अपराध नहीं करेगा। - पिछली कानूनी प्रक्रिया: गुरुग्राम की विशेष अदालत द्वारा पहले ही 15 जून को उनकी जमानत अर्जी खारिज की जा चुकी थी, जिसके बाद उच्च न्यायालय ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुए राहत देने से इनकार कर दिया। - जाँच का दायरा: प्रवर्तन निदेशालय द्वारा उनके और उनके परिवार से जुड़े परिसरों पर की गई तलाशी और वित्तीय लेनदेन की जाँच को आधार बनाकर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। सवाल-जवाब 1. संजीव अरोड़ा कौन हैं? संजीव अरोड़ा पंजाब सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं और वह राज्यसभा के पूर्व सांसद भी रह चुके हैं। 2. हाई कोर्ट ने किस मामले में फैसला सुनाया है? हाई कोर्ट ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत दर्ज मामले में उनकी नियमित जमानत याचिका को खारिज किया है। 3. संजीव अरोड़ा को किस मामले में गिरफ्तार किया गया था? उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया था और वह 9 मई से हिरासत में हैं। 4. इससे पहले उनकी जमानत अर्जी कहाँ खारिज हुई थी? गुरुग्राम में PMLA के विशेष न्यायाधीश के समक्ष दायर उनकी नियमित जमानत अर्जी 15 जून को खारिज कर दी गई थी। 5. वह किस कंपनी से जुड़े रहे हैं? वह 'मैसर्स हैम्पटन स्काई रियल्टी लिमिटेड' (HSRL) के प्रमोटर और चेयरमैन हैं। https://trendkia.com/punjab/punjab-ke-mntri-sanjeev-arora-ko-bara-jhataka-high-court-ne-kharija-ki-jamanata-yachika-48149 TrendKia — Har trend, sabse pehle.