सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, महज आपराधिक मामला लंबित होने पर सरकारी कर्मी को नहीं निकाल सकते सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी को सिर्फ इसलिए नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित है। अदालत ने एक सिपाही को हटाने के फैसले को अवैध ठहराते हुए पंजाब सरकार को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी सेवा नियमों और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़ा एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि केवल यह आधार बनाकर किसी भी सरकारी कर्मचारी को उसकी नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता कि उसके खिलाफ कोई क्रिमिनल केस पेंडिंग चल रहा है। यह बात विशेष रूप से तब लागू होती है जब कर्मचारी को कार्रवाई से पहले अपना पक्ष रखने का कोई मौका ही न दिया गया हो। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच का फैसला यह महत्वपूर्ण टिप्पणी जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने एक सिपाही की बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए की। अदालत ने इस मामले में सिपाही को नौकरी से हटाने के आदेश को पूरी तरह से गैरकानूनी करार दिया। बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि सेवामुक्त करने के समय उस कर्मचारी को किसी भी अदालत द्वारा दोषी नहीं ठहराया गया था, और केवल आपराधिक मुकदमे के लंबित होने को आधार बनाकर यह सख्त कदम उठाया गया था। अदालत की मुख्य टिप्पणियां अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि अपीलकर्ता को इसलिए सेवा से बाहर नहीं किया गया था कि उसे किसी आपराधिक अपराध में सजा मिल चुकी थी, बल्कि सिर्फ इसलिए निकाला गया क्योंकि उसके खिलाफ मुकदमा लंबित था और उसे सफाई पेश करने का अवसर तक नहीं दिया गया। अदालत ने कहा कि उन्हें ऐसा कोई भी कानून या नियम नजर नहीं आया जो किसी सरकारी नियोक्ता को पुलिस बल में एक दशक से अधिक समय से अपनी सेवाएं दे रहे कर्मी को केवल लंबित मामले के आधार पर हटाने की अनुमति देता हो। ऐसे में बर्खास्तगी के इस फैसले को किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता है। नौकरी बहाली के बजाय 5 लाख रुपये मुआवजे का आदेश मामले में दो दशक से भी अधिक लंबा समय बीत जाने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने सिपाही को दोबारा नौकरी पर बहाल करने का आदेश देने से तो परहेज किया। हालांकि, न्यायहित को ध्यान में रखते हुए अदालत ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया। इसके तहत पंजाब सरकार को यह निर्देश दिया गया कि वह प्रभावित अपीलकर्ता को मुआवजे के तौर पर कुल 5 लाख रुपये का भुगतान करे। क्या है पूरे मामले की पृष्ठभूमि इस कानूनी विवाद की शुरुआत काफी पहले हुई थी। अपीलकर्ता को सबसे पहले साल 1991 में पंजाब पुलिस के भीतर विशेष पुलिस अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया था। इसके बाद तरक्की और चयन प्रक्रिया के तहत उनका चयन पटियाला की पहली इंडियन रिजर्व बटालियन में सिपाही के पद पर हुआ था। लेकिन अगस्त 2002 में हालात तब बदल गए जब उन्हें उनकी ड्यूटी जॉइन करने से रोक दिया गया और अंदरूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की गई। इसका आप पर असर भारत में: यह फैसला देश भर के लाखों सरकारी कर्मचारियों को बड़ी राहत देता है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि केवल पेंडिंग मुकदमों के आधार पर मनमाने ढंग से नौकरी नहीं छीनी जा सकती और प्राकृतिक न्याय का पालन करना अनिवार्य है। सवाल-जवाब 1. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या मुख्य बात कही है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी को नौकरी से नहीं हटाया जा सकता है। 2. यह फैसला किस बेंच ने सुनाया है? यह फैसला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने सुनाया है। 3. अदालत ने पीड़ित सिपाही को क्या राहत दी है? लंबा समय बीत जाने के कारण नौकरी पर वापस रखने से मना करते हुए अदालत ने पंजाब सरकार को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। 4. सिपाही को किस विभाग और वर्ष में ड्यूटी जॉइन करने से रोका गया था? सिपाही को अगस्त 2002 में पटियाला की फर्स्ट इंडियन रिजर्व बटालियन में ड्यूटी जॉइन नहीं करने दी गई थी। https://trendkia.com/punjab/supreme-court-rules-pending-criminal-cases-are-not-grounds-to-dismiss-government-employees-20420 TrendKia — Har trend, sabse pehle.