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  "title": "राजस्थान के महनसर में मौजूद है 193 साल पुरानी सोने की दुकान, जहां आज भी होती है दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश की पूजा",
  "summary": "झुंझुनूं के महनसर कस्बे में स्थित 'सोने की साळ' नामक ऐतिहासिक दुकान में 1830 में सोने की स्याही से उकेरे गए देवी-देवताओं के भित्ति चित्रों की आज भी हर दीपावली पर पूजा की जाती है।",
  "content": "शेखावाटी क्षेत्र के झुंझुनूं जिले का महनसर कस्बा अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए देश-विदेश में खास पहचान रखता है। यहां के महनसर कस्बे में एक बेहद अनोखी और प्राचीन दुकान मौजूद है, जिसकी दीवारों पर लगभग 193 साल पहले सोने की स्याही से देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश के चित्र उकेरे गए थे। आज भी समय के साथ आधुनिकता आने के बावजूद इन स्वर्णिम कलाकृतियों की महत्ता कम नहीं हुई है और दीपावली के पावन पर्व पर इनकी विधि-विधान से पूजा की जाती है। पोदार परिवार के लोग आज भी अपने पुरखों की इस अमूल्य परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ निभाते आ रहे हैं और त्योहार के मौके पर इन चित्रों के सामने नतमस्तक होकर इलाके में अमन, चैन और बरकत की कामना करते हैं।\n\nसोने की साळ का ऐतिहासिक और व्यावसायिक महत्व\nमहनसर में स्थित इस ऐतिहासिक व्यावसायिक प्रतिष्ठान को स्थानीय स्तर पर 'सोने की साळ' के रूप में जाना जाता है। इस भव्य इमारत का निर्माण वर्ष 1830 में सेठ हरकंठराय पोद्दार द्वारा करवाया गया था। उस दौर में यह जगह केवल खरीद-फरोख्त का अड्डा नहीं हुआ करती थी, बल्कि यह उस कालखंड के वैभव, वास्तुकला और कलात्मक उत्कृष्टता का बेजोड़ नमूना थी। उस जमाने में यहां बड़े पैमाने पर सोने और चांदी का कारोबार होता था। देश के कोने-कोने और विदेशों से आने वाले बड़े व्यापारियों को अपनी आर्थिक मजबूती का अहसास कराने के लिए इस दुकान की दीवारों पर सोने की असली परत और स्याही का इस्तेमाल कर मनमोहक चित्र बनवाए गए थे। इन कलाकृतियों में धार्मिक प्रसंगों के साथ-साथ पारंपरिक भारतीय संस्कृति और गहरी आस्था को सर्वोपरि रखा गया था ताकि कारोबार में भी शुभता बनी रहे।\n\nअष्टकमल पर विराजमान मां लक्ष्मी का अद्भुत भित्ति चित्र\nइस ऐतिहासिक साळ के भीतर बने एक विशेष कक्ष में मां लक्ष्मी का भित्ति चित्र अपनी अत्यंत सूक्ष्म और अनूठी बनावट के कारण सैलानियों और कला प्रेमियों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र रहता है। इस पवित्र कलाकृति में देवी लक्ष्मी को एक अष्टकमल की चौकी पर विराजमान दिखाया गया है। उनके चारों तरफ चार हाथियों को दर्शाया गया है जिन पर महावत भी सवार हैं। इनमें से दो हाथी अपनी सूंड से मां लक्ष्मी का जल से अभिषेक करते हुए नजर आते हैं, जबकि बाकी के दो हाथी उनके चरणों को पखार रहे हैं। इस पूरे दृश्य में देवी की कृपा, वैभव और समृद्धि के भाव को बेहद खूबसूरती के साथ दीवारों पर उतारा गया है। इसके अलावा दुकान के मुख्य प्रवेश द्वार पर भगवान गणेश का स्वर्णिम चित्र सुसज्जित है, जहां दो महिलाएं चंवर डुलाती नजर आती हैं और दो पुरुष हाथ जोड़कर विनायक की स्तुति कर रहे हैं।\n\nविशालकाय साळ में रामायण और कृष्ण लीलाओं का अंकन\nयह ऐतिहासिक व्यापारिक स्थल लगभग 100 फीट लंबा और 20 फीट चौड़ा है, जिसे तीन अलग-अलग हिस्सों में बांटकर शानदार स्वर्णिम चित्रकारी की गई है। पहले हिस्से में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जन्म से लेकर उनके राज्याभिषेक तक के संपूर्ण रामायण काल के प्रसंगों को बहुत बारीकी से उकेरा गया है। दूसरे हिस्से में भगवान श्रीकृष्ण की बाल्यकाल की लीलाओं और रासलीला से जुड़े जीवंत चित्र बनाए गए हैं जो दर्शकों का मन मोह लेते हैं। तीसरे और अंतिम हिस्से में सुंदर प्राकृतिक फूलों और रंग-बिरंगी फुलवारियों की मनमोहक आकृतियां बनाई गई हैं। इस पूरी साळ की दीवारों पर सोने की स्याही से की गई यह नक्काशी उस समय के स्थानीय भारतीय कलाकारों के बेजोड़ कौशल को बयां करती है। हालांकि, दो शताब्दियों पुरानी इस अद्भुत कलाकृति में कुल कितनी मात्रा में सोने का उपयोग हुआ था, इसका सटीक हिसाब लगाना आज के समय में मुमकिन नहीं है।\n\nपरिवार की पीढ़ियों द्वारा सहेजी गई अनमोल विरासत\nवर्तमान समय में यह ऐतिहासिक धरोहर श्योबक्सराय पोदार ट्रस्ट, महनसर (बिसाऊ) की देखरेख में पूरी तरह सुरक्षित और संरक्षित है। परिवार के सदस्य कुलदीप पोदार के अनुसार, उनके परिवार की नई और पुरानी पीढ़ियां अपने पूर्वजों द्वारा शुरू की गई इस महान परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रही हैं। हर साल दीपावली के शुभ दिन पर महनसर की इस प्रसिद्ध साळ में मां लक्ष्मी और भगवान गणेश के प्राचीन चित्रों की विशेष आरती उतारी जाती है और पूजा-अर्चना की जाती है। शेखावाटी की यह स्वर्णिम धरोहर आज भी इस आंचल के गौरवशाली अतीत और कला प्रेमियों के लिए एक जीवित मिसाल बनी हुई है।\n\nइसका आप पर असर\nमहनसर की इस ऐतिहासिक धरोहर का असर स्थानीय संस्कृति और पर्यटन पर सीधा पड़ता है।\n\n• राजस्थान में: यह ऐतिहासिक स्थल पर्यटकों को आकर्षित करता है और स्थानीय सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देता है।\n• झुंझुनूं में: महनसर कस्बे के निवासियों और व्यापारियों के लिए यह पुरानी परंपराएं और पारिवारिक विरासत गर्व का विषय बनी हुई हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह ऐतिहासिक इमारत 1830 में व्यावसायिक समृद्धि को दर्शाने के लिए बनाई गई थी।\n\n• व्यापारिक प्रदर्शन: सेठ हरकंठराय पोद्दार ने देश-विदेश के व्यापारियों को अपनी आर्थिक संपन्नता दिखाने के लिए दीवारों पर सोने की परतें लगवाई थीं।\n• धार्मिक आस्था: उस दौर के व्यापारियों ने अपने कारोबार में बरकत और शुभता के लिए देवी-देवताओं के भित्ति चित्रों को प्राथमिकता दी थी।\n• परिवार का संरक्षण: पोदार परिवार आज भी अपनी पुरानी परंपराओं के प्रति निष्ठावान रहते हुए हर साल इनकी पूजा करता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. महनसर की 'सोने की साळ' का निर्माण कब हुआ था?\nइस ऐतिहासिक दुकान का निर्माण वर्ष 1830 में सेठ हरकंठराय पोद्दार ने करवाया था।\n\n2. इस दुकान की दीवारों पर किस सामग्री से चित्रकारी की गई है?\nइस दुकान की दीवारों पर सोने की वास्तविक परत और सोने की स्याही से भित्ति चित्र उकेरे गए हैं।\n\n3. वर्तमान में इस ऐतिहासिक धरोहर की देखरेख कौन करता है?\nयह ऐतिहासिक साळ श्योबक्सराय पोदार ट्रस्ट, महनसर के संरक्षण में पूरी तरह सुरक्षित है।\n\n4. दीपावली पर यहां किन चित्रों की पूजा की जाती है?\nदीपावली के अवसर पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश के प्राचीन स्वर्णिम चित्रों की पूजा और आरती की जाती है।\n\n5. इस ऐतिहासिक साळ का आकार कितना है?\nयह ऐतिहासिक साळ लगभग 100 फीट लंबी और 20 फीट चौड़ी है।",
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