# आबूराज नामकरण के सम्मान में संत बजरंगदास महाराज ने 200 किलोमीटर दंडवत चलकर पूरी की कठिन साधना

> राजस्थान के पर्वतीय स्थल माउंट आबू का नाम बदलकर आबूराज किए जाने के सरकारी निर्णय के प्रति आभार जताने के लिए सोजत के संत बजरंगदास महाराज ने 45 दिनों की दुर्गम दंडवत यात्रा संपन्न की।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-09-27 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/aburaj-namakarana-ke-sammana-men-snta-bajrangdas-maharaj-ne-200-kilomitara-dndavata-chalakara-puri-ki-kathina-sadhana-39251 · **Language:** Hindi
**Tags:** आबूराज, माउंट आबू, महंत बजरंगदास महाराज, दंडवत यात्रा, राजस्थान, पाली, सिरोही, अग्नेश्वर महादेव

राजस्थान के सुप्रसिद्ध और इकलौते पर्वतीय पर्यटन केंद्र माउंट आबू की सांस्कृतिक पहचान को नया रूप देते हुए राज्य सरकार ने इसका नाम आबूराज करने का आदेश जारी किया। इस ऐतिहासिक घोषणा के प्रति अपनी गहरी निष्ठा व्यक्त करने के लिए पाली जिले के एक संत ने अनोखी तपस्या का मार्ग चुना। सोजत स्थित गंगाबेरी गौशाला के संचालक महंत बजरंगदास महाराज ने इस निर्णय का स्वागत करने के लिए 200 किलोमीटर से अधिक दूरी की बेहद दुष्कर दंडवत यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की। पूरे मारवाड़ तथा सिरोही अंचल में संतों और आम श्रद्धालुओं के बीच उनकी इस अटूट धार्मिक लगन की व्यापक स्तर पर सराहना की जा रही है।

## पाली के सोजत से शुरू हुआ था डेढ़ महीने का तपस्वी सफर
प्रशासनिक स्तर पर नाम परिवर्तन की आधिकारिक स्वीकृति मिलते ही महंत बजरंगदास महाराज ने अपनी इस अनूठी प्रतिज्ञा का एलान किया था। उन्होंने 3 अगस्त के दिन पाली जिले के सोजत नगर में मौजूद गंगाबेरी गौशाला परिसर से अपनी दंडवत यात्रा का शुभारंभ किया। इस यात्रा की विशेषता यह थी कि संत को हर कदम पर जमीन पर लेटकर साष्टांग प्रणाम करते हुए आगे बढ़ना था। मानसून के मौसम में मूसलाधार बारिश, चिपचिपी कीचड़ और अरावली की पथरीली चढ़ाई जैसी कठिन चुनौतियों के बावजूद संत ने अपना क्रम रुकने नहीं दिया। लगभग डेढ़ महीने तक अनवरत चली इस आत्मिक यात्रा के दौरान उनके समर्पित सेवादार और श्रद्धालु भी हर समय उनके साथ पैदल चलते रहे।

## सड़क मार्ग पर विभिन्न गांवों और मंदिरों में उमड़ी भीड़
सोजत से प्रस्थान करने के बाद यह आध्यात्मिक कारवां पाली शहर, सांडेराव और सुमेरपुर के मुख्य मार्गों से आगे बढ़ा। जैसे ही यह जत्था सीमा पार करके सिरोही जिले में दाखिल हुआ, सिरोड़ी गांव के निवासियों ने संत का पुष्प वर्षा और जयकारों के साथ स्वागत किया। अपनी इस लंबी साधना के दौरान संत ने बामनवाड़जी महादेव मंदिर, सिरोड़ी के सोनाधारी महादेव मंदिर, अनादरा और मामाजी बावसी जैसे प्रमुख आस्था केंद्रों पर मत्था टेका और पूजा-अर्चना की। यात्रा मार्ग में पड़ने वाली बस्तियों में स्थानीय नागरिकों, महिलाओं और साधु-संतों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी, जिन्होंने संत के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया।

## देलवाड़ा के अग्नेश्वर महादेव मंदिर में विधिवत पूर्णाहुति
पैंतालीस दिनों से अधिक समय तक कठिन शारीरिक श्रम और श्रद्धा का परिचय देते हुए महंत बजरंगदास महाराज आखिरकार आबूराज के देलवाड़ा क्षेत्र पहुंचे। यहां स्थित ऐतिहासिक अग्नेश्वर महादेव मंदिर के प्रांगण में उनकी इस 200 किलोमीटर की दंडवत यात्रा की विधिवत पूर्णाहुति हुई। गंतव्य पर पहुंचने पर महंत निरंजन गिरी महाराज की अगुवाई में स्थानीय संतों और हजारों श्रद्धालुओं ने उनका स्वागत किया। इस सफल समापन के उपलक्ष्य में मंदिर परिसर में एक भव्य भजन संध्या आयोजित की गई, जिसमें देर रात तक भक्तगण भजनों की स्वर लहरियों में लीन रहे।

## औपनिवेशिक छाप मिटाकर प्राचीन सांस्कृतिक स्वरूप की बहाली
पर्वतीय नगरी का नाम आबूराज करने का विचार अचानक सामने नहीं आया था, बल्कि इसके पीछे एक लंबा वैचारिक आंदोलन काम कर रहा था। स्थानीय निवासियों और आध्यात्मिक संगठनों का कहना था कि ब्रिटिश हुकूमत ने अपने प्रशासनिक कामकाज की सहूलियत के लिए इस क्षेत्र को माउंट आबू पुकारना शुरू किया था। पौराणिक ग्रंथों और स्थानीय लोक परंपरा में इस पावन भूभाग को सदियों से अर्बुदांचल और आबूराज के रूप में मान्यता प्राप्त रही है। अपनी इस खोई हुई ऐतिहासिक पहचान को पुनर्स्थापित कराने के लिए जून 2025 में 53 सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं ने संतों के नेतृत्व में एक विशाल कलश यात्रा भी निकाली थी। सरकार द्वारा जनआकांक्षाओं का सम्मान करते हुए नया नाम तय किए जाने से पूरे क्षेत्र में हर्ष का माहौल बना हुआ है।

## इसका आप पर असर
माउंट आबू का नाम बदलकर आबूराज किए जाने और इस पर संतों के समर्थन से क्षेत्र के सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।

- **राजस्थान में प्रशासनिक दस्तावेज:** राज्य के सभी सरकारी अभिलेखों, सड़क संकेतों और विभागीय पत्राचार में अब माउंट आबू के स्थान पर आबूराज शब्द का प्रयोग अनिवार्य हो जाएगा। स्थानीय निवासियों और व्यापारियों को आने वाले समय में अपने आधिकारिक रिकॉर्ड्स और पतों में इस नए नाम को अद्यतन करना होगा।
- **सिरोही और मारवाड़ में पर्यटन:** इस नाम परिवर्तन और संत समाज के व्यापक आयोजनों से स्थानीय धार्मिक पर्यटन को नई ऊर्जा मिलने की उम्मीद है। देश भर से आने वाले सैलानियों के लिए हिल स्टेशन की पुरानी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान फिर से स्थापित होगी।
- **नागरिकों और यात्रियों के लिए टिकट प्रणाली:** राज्य परिवहन, रेलवे और ऑनलाइन यात्रा बुकिंग पोर्टलों पर चरणबद्ध तरीके से गंतव्य का नाम बदला जाएगा। यात्रियों को आने वाले दिनों में यात्रा आरक्षण करते समय दोनों नामों के विकल्प देखने को मिल सकते हैं।
- **स्थानीय पहचान और विरासत:** क्षेत्र के स्थानीय निवासियों की दशकों पुरानी सांस्कृतिक पहचान अब औपचारिक सरकारी दर्जा पा चुकी है। इससे स्थानीय संस्कृति और औपनिवेशिक काल से पूर्व के इतिहास को सहेजने के प्रयासों को बल मिलेगा।

## ऐसा क्यों हुआ
माउंट आबू का नाम आबूराज करने और उसके समर्थन में दंडवत यात्रा निकलने की मुख्य वजह औपनिवेशिक विरासत को हटाकर क्षेत्र की पौराणिक पहचान को बहाल करना है।

- **औपनिवेशिक नामकरण का विरोध:** ब्रिटिश काल में इस भूभाग का नाम प्रशासनिक सुविधा के अनुसार माउंट आबू रखा गया था, जिसके चलते स्थानीय समाज लंबे समय से असंतुष्ट था। लोगों की मांग थी कि अंग्रेजों द्वारा दिया गया नाम हटाकर मूल पहचान वापस लाई जाए।
- **पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यता:** प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में इस पर्वतीय क्षेत्र को सदियों से अर्बुदांचल और आबूराज कहा जाता रहा है। इसी धार्मिक पृष्ठभूमि के आधार पर संत समाज इस नाम को औपचारिक मान्यता दिलाने के लिए निरंतर प्रयासरत था।
- **जन संगठनों का संगठित दबाव:** जून 2025 में 53 सामाजिक संगठनों और संतों ने मिलकर शहर में एक विशाल कलश यात्रा निकाली थी, जिसने सरकार पर फैसला लेने का दबाव बनाया। राज्य सरकार द्वारा मांग स्वीकार किए जाने के बाद संतों ने इस संकल्प को पूरा मानकर कृतज्ञता स्वरूप यात्रा निकाली।
- **आस्था और संकल्प की अभिव्यक्ति:** महंत बजरंगदास महाराज ने सरकार के फैसले का सम्मान करने और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए अपनी व्यक्तिगत साधना के तहत इस 200 किलोमीटर की दंडवत यात्रा का संकल्प लिया था।

## सवाल-जवाब

### 1. माउंट आबू का नया नाम क्या रखा गया है?
राजस्थान सरकार ने राज्य के एकमात्र हिल स्टेशन माउंट आबू का नाम बदलकर 'आबूराज' कर दिया है।

### 2. संत बजरंगदास महाराज ने यह दंडवत यात्रा क्यों की?
उन्होंने माउंट आबू का नाम बदलकर आबूराज किए जाने के राज्य सरकार के निर्णय के प्रति खुशी, समर्थन और सम्मान व्यक्त करने के लिए यह यात्रा की।

### 3. यह दंडवत यात्रा कहां से शुरू होकर कहां समाप्त हुई?
यह यात्रा पाली जिले के सोजत स्थित गंगाबेरी गौशाला से शुरू होकर आबूराज (माउंट आबू) के देलवाड़ा स्थित अग्नेश्वर महादेव मंदिर में संपन्न हुई।

### 4. इस यात्रा को पूरा होने में कितना समय लगा और कुल दूरी कितनी थी?
इस दंडवत यात्रा में लगभग डेढ़ महीने (करीब 45 दिन) का समय लगा और इसकी कुल दूरी 200 किलोमीटर से अधिक थी।

### 5. माउंट आबू का नाम बदलने की मांग क्यों की जा रही थी?
स्थानीय लोगों और संतों का तर्क था कि 'माउंट आबू' अंग्रेजों द्वारा दिया गया नाम था, जबकि प्राचीन काल से इसे अर्बुदांचल और आबूराज के नाम से जाना जाता था।

### 6. इस मांग के समर्थन में जून 2025 में क्या कदम उठाया गया था?
जून 2025 में 53 विभिन्न संगठनों और साधु-संतों ने मिलकर अपनी प्राचीन पहचान वापस पाने के लिए एक विशाल कलश यात्रा निकाली थी।

## प्रेरणा और सबक
महंत बजरंगदास महाराज की 200 किलोमीटर लंबी दंडवत यात्रा कड़े संकल्प, शारीरिक सहनशीलता और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पण का असाधारण उदाहरण है।

- **संकल्प की शक्ति:** कठिन से कठिन लक्ष्य को भी यदि दृढ़ इच्छाशक्ति और स्पष्ट उद्देश्य के साथ शुरू किया जाए, तो हर बाधा को पार किया जा सकता है।
- **प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य:** बारिश, कीचड़ और दुर्गम पहाड़ी रास्तों के बावजूद बिना रुके डेढ़ महीने तक साधना करना यह सिखाता है कि लक्ष्य के प्रति निरंतरता ही सफलता की कुंजी है।
- **सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव:** अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के सम्मान के लिए निजी सुख-सुविधाओं का त्याग करना समाज को अपनी परंपराओं पर गर्व करने की प्रेरणा देता है।
- **सामूहिकता और सेवा भाव:** संत की कठिन यात्रा में श्रद्धालुओं और सेवादारों का निस्वार्थ सहयोग यह दर्शाता है कि नेक काम में समाज का साथ बड़ी से बड़ी मुश्किल को आसान बना देता है।

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