# अजमेर के जैन तीर्थ में सहेज कर रखी गई सवा दो सौ साल पुरानी नक्काशी, रथ और आकृतियों पर दिखता है सोने का काम

> अजमेर स्थित सोनी जी की नसिया में 200 से 225 वर्ष पुरानी कलाकृतियां और ऐतिहासिक रथ आज भी सुरक्षित हैं, जिन पर सोने की नक्काशी और जरदोजी का महीन काम मौजूद है.

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/ajmer-ke-jaina-tirtha-men-saheja-kara-rakhi-gai-sava-do-sau-sala-purani-nakkashi-ratha-aura-akritiyon-para-dikhata-hai-sone-ka-kam-42456 · **Language:** Hindi
**Tags:** अजमेर, सोनी जी की नसिया, जैन तीर्थ, ऐतिहासिक रथ, स्वर्ण नक्काशी, राजस्थान पर्यटन

राजस्थान के अजमेर में स्थित सोनी जी की नसिया जैन समुदाय का एक अत्यंत विख्यात, ऐतिहासिक और भव्य धार्मिक स्थल है. इस पावन तीर्थ में लगभग 200 से 225 वर्ष प्राचीन कलाकृतियां आज भी मौजूद हैं, जो यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के मुख्य आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं. नसिया परिसर में रखा ऐतिहासिक रथ तथा उससे जुड़ी कलात्मक वस्तुएं तत्कालीन समय की समृद्ध शिल्प कला और दुर्लभ कारीगरी का उत्कृष्ट प्रमाण प्रस्तुत करती हैं. इन ऐतिहासिक धरोहरों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए पारंपरिक पद्धतियों के जरिए इनकी नियमित देखभाल और आवश्यक मरम्मत का काम समय पर पूरा कराया जाता है, जिससे सदियों पुरानी यह सांस्कृतिक विरासत पूरी तरह सुरक्षित बनी रहे.

## धार्मिक परंपराओं और पारिवारिक रीति-रिवाजों से जुड़ा रथ
तीर्थ स्थल के प्रबंधन और देखरेख से संबद्ध भूपेंद्र के अनुसार, इस ऐतिहासिक रथ का धार्मिक के साथ-साथ पारंपरिक महत्व भी बहुत गहरा है. जब इस भव्य रथ को नगर भ्रमण पर निकाला जाता है, तब रथ के पिछले भाग पर भगवान की पवित्र प्रतिमा विराजमान कराई जाती है. इस रथ यात्रा के संचालन का दायित्व आज भी सेठ साहब के परिवार के सदस्यों द्वारा निभाया जाता है. परिवार के लोग स्वयं रथ पर सवार होकर पूरे नगर में इसका भ्रमण कराने की परंपरा को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं.

## हाथियों की मूर्तियों पर बारीक एम्बॉस और स्वर्ण शिल्प
रथ के विभिन्न अंगों और आकृतियों पर उस काल की विशिष्ट शिल्पकला का प्रभाव स्पष्ट झलकता है. भूपेंद्र ने जानकारी दी कि रथ से जुड़ी हाथियों की आकृतियों पर असली सोने का काम किया गया है तथा उन पर अत्यंत सूक्ष्म एम्बॉस कार्य उकेरा गया है. इस एम्बॉस कारीगरी की नक्काशी इतनी बारीक है कि कारीगरों के अद्भुत हुनर और अथक परिश्रम की झलक साफ नजर आती है. इसके अतिरिक्त, हाथियों पर सजाए गए प्राचीन कारपेट भी अपनी अनूठी बुनावट और शैली के कारण विशेष पहचान रखते हैं.

## सोने और चांदी के तारों से सजी जरदोजी
इन प्राचीन कृतियों में सोने और चांदी के महीन तारों से तैयार की गई जरदोजी का काम भी प्रमुखता से दिखाई देता है. हाथी की संपूर्ण आकृति पर बहुत ही सूक्ष्मता के साथ जरदोजी सजाई गई है. इसी प्रकार रथ के घोड़ों की आंखों, पीठ और देह के अन्य हिस्सों पर भी सोने व चांदी के तारों से विशेष सजावट की गई है. करीब दो शताब्दियों से अधिक पुरानी यह शिल्पकारी आज भी अपनी मौलिक चमक और बेमिसाल कलात्मकता से हर किसी को विस्मित कर देती है.

## इसका आप पर असर
अजमेर स्थित इस ऐतिहासिक धरोहर का पारंपरिक संरक्षण पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए एक जीवित मिसाल है.

- **राजस्थान में:** अजमेर आने वाले सैलानी 200 से 225 साल पुरानी हस्तशिल्प और सोने की कारीगरी को देख सकते हैं. इससे राज्य के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पर्यटन को निरंतर गति मिलती है.
- **भारत में:** जैन इतिहास और प्राचीन भारतीय हस्तकला के जानकारों के लिए यह स्थल अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र है. इससे सदियों पुरानी संरक्षण विधियों के प्रति जागरूकता बढ़ती है.
- **तीर्थयात्रियों के लिए:** श्रद्धालु धार्मिक आस्था के साथ-साथ पारंपरिक रथ संचालन की ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी बन सकते हैं. विशेष अवसरों पर रथ के साथ आयोजित होने वाले नगर भ्रमण में वे भाग ले सकते हैं.
- **कला प्रेमियों के लिए:** सोने और चांदी के तारों से बनी जरदोजी तथा एम्बॉस वर्क का जीवंत उदाहरण देखने को मिलता है. यह पारंपरिक भारतीय धातु और वस्त्र शिल्प के अध्ययन में सहायक है.

## ऐसा क्यों हुआ
अजमेर की नसिया में 200 से 225 वर्ष पुरानी यह कलाकृतियां पीढ़ियों से चली आ रही परंपरागत देखरेख और अटूट आस्था के कारण आज भी सुरक्षित हैं. संबंधित परिवार और मंदिर प्रबंधन द्वारा समय पर जीर्णोद्धार किए जाने से इनका मौलिक स्वरूप बना रहा.

- **नियमित पारंपरिक मरम्मत:** ऐतिहासिक रथ और कलाकृतियों की समय-समय पर पारंपरिक तरीकों से मेंटेनेंस की जाती है. इससे सदियों पुरानी नक्काशी और धातु का काम खराब होने से बच जाता है.
- **पारिवारिक दायित्व का निर्वहन:** सेठ साहब के परिवार के सदस्य इस विरासत और रथ संचालन की परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वयं निभाते आ रहे हैं. पारिवारिक निष्ठा के चलते इस धरोहर का स्वरूप अपरिवर्तित रहा.
- **शिल्प और धातु की मजबूती:** आकृतियों पर असली सोने तथा सोने-चांदी के तारों की जरदोजी का महीन काम उस काल के कुशल कारीगरों द्वारा उच्च गुणवत्ता से किया गया था. इसी मजबूती और बारीकी के कारण कलाकृतियां दो सदियों बाद भी अपनी चमक बनाए हुए हैं.

## सवाल-जवाब

### 1. सोनी जी की नसिया कहां स्थित है?
सोनी जी की नसिया राजस्थान के अजमेर शहर में स्थित जैन धर्म का एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक तीर्थ स्थल है.

### 2. यहां मौजूद कलाकृतियां कितनी पुरानी हैं?
यहां करीब 200 से 225 साल पुरानी ऐतिहासिक कलाकृतियां और भव्य रथ सुरक्षित रखे गए हैं.

### 3. रथ की हाथियों की आकृतियों पर किस प्रकार की कारीगरी की गई है?
हाथियों की आकृतियों पर असली सोने का महीन काम और बारीक एम्बॉस वर्क किया गया है.

### 4. कलाकृतियों पर जरदोजी का काम किन धातुओं से किया गया है?
हाथियों और घोड़ों के विभिन्न हिस्सों पर सोने और चांदी के तारों से बारीक जरदोजी की सजावट की गई है.

### 5. रथ को नगर भ्रमण कराने की परंपरा कौन निभाता है?
सेठ साहब के परिवार से जुड़े सदस्य स्वयं रथ पर बैठकर इसे नगर भ्रमण करवाने की परंपरा का निर्वहन करते हैं.

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