अजमेर के खोबरा नाथ भैरव मंदिर में विवाह की मनोकामना लेकर जुटते हैं श्रद्धालु, जानिए पुष्कर यज्ञ से जुड़ा इतिहास राजस्थान के अजमेर में रामप्रसाद घाट के निकट स्थित पांच हजार वर्ष से अधिक प्राचीन खोबरा नाथ भैरव मंदिर में विवाह की मन्नत मांगने दूर-दूर से लोग आते हैं। राजस्थान के ऐतिहासिक जिले अजमेर में अनगिनत ऐसे पावन धाम मौजूद हैं, जिनके प्रति स्थानीय नागरिकों और दूर-दराज के श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा देखने को मिलती है। इन्हीं सिद्ध स्थलों में रामप्रसाद घाट के समीप एक ऊंची पहाड़ी पर स्थापित खोबरा नाथ भैरव मंदिर अत्यंत प्रमुख माना जाता है। इस पवित्र धाम में विराजित भगवान भैरव को आम बोलचाल में शादी देव के नाम से भी पुकारा जाता है। जनमानस में यह दृढ़ विश्वास है कि यहां शीश नवाने और विधि-विधान से वंदना करने से जीवन की सभी अभिलाषाएं पूर्ण हो जाती हैं। विशेष रूप से विवाह की प्रतीक्षा कर रहे युवक-युवतियों को खोबरा नाथ भैरव वैवाहिक बंधन में बंधने का वरदान प्रदान करते हैं। दीपावली के अवसर पर विशेष दीपदान और धार्मिक अनुष्ठान मंदिर के पुजारी ललित मोहन के अनुसार, जिन युवक-युवतियों के विवाह में बाधाएं आ रही होती हैं या जिनका रिश्ता तय नहीं हो पा रहा होता है, उनके लिए इस मंदिर में एक विशेष अनुष्ठान का विधान है। मान्यता के अनुसार, यदि ऐसे जातक दीपावली के पावन पर्व से ठीक सात दिन पूर्व मंदिर पहुंचकर लगातार सात दिनों तक नियमित रूप से तेल का दीपक प्रज्वलित करते हैं, तो उन्हें अतिशीघ्र विवाह की शुभ सूचना प्राप्त होती है। वैसे तो प्रत्येक रविवार को भी यहां दर्शनार्थियों का भारी जमावड़ा लगा रहता है, किंतु दीपावली के महापर्व पर प्रतिवर्ष मंदिर परिसर में एक विशाल धार्मिक मेले का आयोजन होता है, जिसमें अपार जनसमूह उमड़ता है। मनोकामना पूर्ति के बाद प्रसाद वितरण और प्राचीन इतिहास विवाह की चाह रखने वाले अविवाहित युवक-युवतियां पूरे साल दीपावली के उत्सव का अत्यंत उत्सुकता से इंतजार करते हैं। यही कारण है कि हर वर्ष बड़ी तादाद में कुंवारे लोग यहां दर्शन और पूजन हेतु पहुंचते हैं। इसके साथ ही, जिन जातकों की प्रार्थना स्वीकार हो जाती है और विवाह संपन्न हो जाता है, वे अपनी मन्नत पूरी होने के पश्चात परिवार सहित मंदिर आकर बाबा को भोग अर्पित करते हैं और श्रद्धालुओं में प्रसाद का वितरण करते हैं। पुजारी ललित मोहन का कहना है कि यह धार्मिक स्थल पांच हजार साल से भी अधिक प्राचीन है। इसका गौरवशाली अस्तित्व और ऐतिहासिकता राजा अजयपाल के कालखंड से भी पहले की मानी जाती है। भगवान ब्रह्मा के पुष्कर यज्ञ और काशी से आगमन की पावन गाथा इस पवित्र धाम के उद्भव को लेकर एक अत्यंत रोचक पौराणिक आख्यान प्रचलित है। जनश्रुति के अनुसार, सतयुग में जब सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने पवित्र पुष्कर तीर्थ में अपने ऐतिहासिक महायज्ञ का आयोजन किया था, उस समय भैरव बाबा काशी नगरी से चलकर इस क्षेत्र में पधारे थे। लंबी यात्रा के मध्य उन्होंने रात्रि विश्राम के लिए रामप्रसाद घाट के निकट स्थित इसी पहाड़ी को चुना था। यहां एक रात गुजारने के पश्चात भैरव बाबा पुष्कर की ओर प्रस्थान कर गए और वहां आयोजित पावन यज्ञ में सम्मिलित हुए। पुष्कर से वापसी के समय उन्होंने इसी रमणीक पहाड़ी को अपना स्थाई निवास स्थल बना लिया। उसी कालखंड से आज तक इस स्थान पर भैरव बाबा की अनवरत पूजा-अर्चना और सेवा करने की परंपरा चली आ रही है। इसका आप पर असर अजमेर स्थित इस प्राचीन मंदिर की परंपराएं धार्मिक आस्था और वैवाहिक कामनाओं से जुड़े श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखती हैं। • राजस्थान में: अजमेर और आसपास के क्षेत्रों के स्थानीय श्रद्धालु रविवार और पर्वों पर आसानी से मंदिर पहुंचकर अपनी मन्नत मांग सकते हैं। इससे क्षेत्र में स्थानीय धार्मिक पर्यटन और पर्व मेलों की रौनक लगातार बनी रहती है। • भारत में: विवाह में विलंब का सामना कर रहे देश भर के अविवाहित युवा दीपावली के अवसर पर अजमेर की यात्रा की योजना बना सकते हैं। सात दिवसीय विशेष दीपदान अनुष्ठान में भाग लेकर वे अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजन संपन्न कर सकते हैं। • आस्थावान परिवारों के लिए: विवाह संपन्न होने के बाद मन्नत पूरी होने पर परिवार सहित आकर प्रसाद चढ़ाने की परंपरा सामाजिक मेलजोल को बढ़ावा देती है। यह तीर्थाटन नई पीढ़ी को प्राचीन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों से जोड़ता है। • दर्शनार्थी और यात्री: ऐतिहासिक पुष्कर तीर्थ और अजमेर आने वाले सैलानी रामप्रसाद घाट के पास स्थित इस पांच हजार वर्ष पुराने स्थल का भ्रमण कर सकते हैं। इससे उन्हें राजा अजयपाल के काल से भी पहले के ऐतिहासिक आख्यानों को निकट से जानने का अवसर मिलता है। ऐसा क्यों हुआ अजमेर के इस पहाड़ी स्थल को पवित्र धाम का दर्जा मिलने और यहां विवाह संबंधी मन्नतें मांगने की परंपरा के पीछे सदियों पुरानी पौराणिक घटनाएं और धार्मिक विश्वास मौजूद हैं। • काशी से आगमन और विश्राम: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुष्कर में भगवान ब्रह्मा द्वारा आयोजित महायज्ञ में शामिल होने के लिए भैरव बाबा काशी से पधारे थे। यात्रा के दौरान उन्होंने रात बिताने के लिए इसी पहाड़ी पर विश्राम किया और पुष्कर से लौटकर इसे अपना स्थाई वास बना लिया। • प्राचीनता और ऐतिहासिक निरंतरता: यह स्थल पांच हजार वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है, जिसकी जड़ें राजा अजयपाल के शासनकाल से भी पूर्व की हैं। लंबे समय तक निर्बाध आराधना चलने के कारण यह स्थान एक प्रमुख सिद्ध पीठ के रूप में स्थापित हुआ। • शादी देव के रूप में ख्याति: मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना करने और दीपावली से सात दिन पहले निरंतर तेल का दीपक जलाने से विवाह की अड़चनें दूर होती हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालुओं द्वारा मन्नत चुकाने की निरंतर परंपरा ने इसे शादी देव के नाम से लोकप्रिय बना दिया। सवाल-जवाब 1. खोबरा नाथ भैरव मंदिर किस जिले में स्थित है? यह पावन मंदिर राजस्थान के अजमेर जिले में रामप्रसाद घाट के पास स्थित एक पहाड़ी पर स्थित है। 2. खोबरा नाथ भैरव को अन्य किस नाम से जाना जाता है? इन्हें स्थानीय मान्यता और भक्तों के बीच शादी देव के नाम से भी जाना जाता है। 3. विवाह की मनोकामना पूरी करने के लिए क्या धार्मिक विधान बताया गया है? पुजारी के अनुसार, दीपावली से सात दिन पूर्व आकर लगातार सात दिनों तक तेल का दीपक जलाने से विवाह संबंधी मनोकामना पूरी होती है। 4. मंदिर का इतिहास कितना पुराना माना जाता है? मंदिर के पुजारी के अनुसार यह मंदिर 5000 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है और इसकी ऐतिहासिकता राजा अजयपाल से भी पूर्व की है। 5. इस पवित्र स्थान का संबंध किस पौराणिक घटना से जुड़ा हुआ है? मान्यता है कि जब भगवान ब्रह्मा ने पुष्कर में यज्ञ आयोजित किया था, तब काशी से आए भैरव बाबा ने इसी पहाड़ी पर विश्राम किया था और बाद में इसे अपना निवास बना लिया। https://trendkia.com/rajasthan/ajmer-ke-khobra-nath-bhairav-mndira-men-vivaha-ki-manokamana-lekara-jutate-hain-shraddhalu-janie-pushkar-yajna-se-jura-itihasa-42277 TrendKia — Har trend, sabse pehle.