अरावली की वादियों में देवी के चार अलौकिक धाम, दो शेरों की सवारी से 21 किलोमीटर गुफा तक का रहस्य सिरोही की पहाड़ियों में स्थित प्राचीन शक्ति पीठों से जुड़ी सदियों पुरानी आस्था और चमत्कारी मान्यताएं श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। यहां दो शेरों पर सवार भद्रकाली से लेकर 1000 सीढ़ियों वाले मातर माता मंदिर तक अनूठे स्वरूप पूजे जाते हैं। राजस्थान के सिरोही अंचल की अरावली पर्वतमालाएं न केवल अपने मनोरम प्राकृतिक दृश्यों के लिए जानी जाती हैं, बल्कि यहां स्थापित कई ऐतिहासिक एवं पौराणिक देवी मंदिर भी जन आस्था का प्रमुख केंद्र बने हुए हैं। इस पूरे पर्वतीय इलाके में देवी के कई दुर्लभ स्वरूप पूजनीय हैं, जहां सदियों पुरानी परम्पराएं, राजवंशीय कथाएं और भौगोलिक रहस्य आपस में जुड़े हुए हैं। जिले में स्थापित चार प्रमुख शक्ति धामों का आध्यात्मिक महत्व भक्तों को वर्ष भर अपनी ओर खींचता है। नाभिकमल रूप में चक्र पूजा और अंबाजी धाम से अटूट संबंध पिंडवाड़ा क्षेत्र के समीप विद्यमान आरासना अंबा माता तीर्थ का ऐतिहासिक नाता गुजरात सीमा पर स्थित विश्वविख्यात शक्तिपीठ अंबाजी धाम से अत्यंत घनिष्ठ है। धार्मिक परंपराओं में यह विश्वास दृढ़ है कि इन दोनों ही पवित्र स्थलों पर जगदंबा के पावन नाभिकमल स्वरूप को पूजा जाता है। इतिहासकार डॉ. उदयसिंह डिंगार रेखांकित करते हैं कि आरासना तीर्थ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि गर्भगृह में कोई पारम्परिक पाषाण प्रतिमा स्थापित नहीं है, बल्कि देवी के पवित्र नाभिकमल रूपी चक्र की विधि-विधान से उपासना की जाती है। पौराणिक आख्यानों में उल्लेख मिलता है कि इस वन क्षेत्र में उत्पात मचाने वाले आरासुर नामक नरभक्षी दैत्य का संहार करने के कारण ही भगवती का नाम आरासुरी देवी प्रसिद्ध हुआ। इसी पावन पीठ से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा गुजरात की तत्कालीन दांता रियासत से संबंधित है। दांता के तत्कालीन नरेश मां भगवती के परम आराधक थे और उन्होंने देवी से विनती की कि वे उनकी रियासत में चलकर स्थायी रूप से निवास करें। माता ने राजा की यह प्रार्थना स्वीकार तो की, परंतु एक कड़ी शर्त रख दी कि संपूर्ण यात्रा के दौरान नरेश कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। लोकमान्यता के अनुसार, राजा जब दांता राज्य की सीमा पर पहुंचे, तो उनके मन में संशय हुआ और उन्होंने पलटकर पीछे देख लिया। शर्त टूटते ही देवी उसी क्षण उस सीमावर्ती स्थल पर स्थिर हो गईं। कालांतर में राजा ने उसी पावन स्थान पर एक भव्य देवालय का निर्माण कराया, जिसे वर्तमान में दांता अंबाजी के नाम से जाना जाता है। इसी आध्यात्मिक कड़ी के चलते भक्तगण आरासना और दांता अंबाजी को एक ही अलौकिक शक्ति के दो अभिन्न केंद्र मानते हैं। सिरणवा शिखर पर 1000 सीढ़ियों की चढ़ाई और देवड़ा राजवंश सिरोही की सिरणवा पहाड़ी की ऊंचाई पर स्थापित मातर माता का प्राचीन मंदिर भी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का प्रतीक है। इस दुर्गम तीर्थ तक पहुंचने के लिए भक्तों को लगभग 1000 सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाना होता है। जनश्रुतियों में मातर माता को आबूराज की प्रमुख अधिष्ठात्री देवी अर्बुदा का ही एक स्वरूप स्वीकार किया जाता है। इस ऐतिहासिक देवस्थान का सीधा संबंध मारवाड़ के इतिहास और देवड़ा राजवंश से रहा है। ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक, वर्ष 1206 के दौर में जालोर से निष्कासित किए गए शासक मानिक्यराय ने बरलूट क्षेत्र को अपनी राजधानी बनाकर नए शासन की नींव रखी थी। मानिक्यराय उस समय संतानहीन थे और राज्य के भविष्य को लेकर चिंतित थे। मान्यता है कि सिरणवा पर्वत पर मातर माता की कठोर आराधना के फलस्वरूप उन्हें तेजस्वी पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इस वरदान के उपरांत ही देवड़ा राजवंश में राजसत्ता के स्थायित्व और कुल वृद्धि की अविचल मान्यता जनमानस में स्थापित हो गई। उमरनी में आठ सहस्र वर्ष पुराना मंदिर और दो शेरों पर सवार भद्रकाली आबूरोड नगर से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर बसा उमरनी गांव एक अद्वितीय शक्ति मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। अरावली की शांत तलहटी में स्थित प्राचीन भद्रकाली मंदिर देश भर में अपनी अनूठी शिल्प परंपरा के लिए जाना जाता है। यह संभवतः इकलौता ऐसा दुर्लभ तीर्थ है, जहां मां भद्रकाली एक साथ दो शेरों पर आरूढ़ दिखाई देती हैं। इस अलौकिक मंदिर की ऐतिहासिकता करीब 8 हजार वर्ष पुरानी मानी जाती है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में परम तपस्वी राजा अम्बरीष ने इसी सुरम्य वन प्रदेश में घोर तपस्या की थी। उनकी अविचल भक्ति से प्रसन्न होकर भगवती ने कल्याणी स्वरूप में दो बार साक्षात दर्शन दिए थे। तब राजा अम्बरीष ने देवी से आग्रह किया था कि वे इसी कल्याणकारी रूप में यहां सदा के लिए विराजमान रहें। इसी पावन स्थल पर समय-समय पर जीर्णोद्धार होते रहे हैं और इतिहास में अब तक कुल 3 बार भव्य मंदिरों का पुनर्निर्माण किया जा चुका है। 21 किलोमीटर लंबी रहस्यमयी गुफा और मोर-मोरनी की समाधि आबूराज के मुहाने पर स्थित प्राचीन मुख्य माता मंदिर (मुखरी माता) भी भक्तों के बीच चमत्कारिक ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। इस प्राकृतिक गुफा मंदिर की सबसे रोमांचक विशेषता इसके भीतर स्थित लगभग 21 किलोमीटर लंबी अत्यंत संकरी प्राकृतिक गुफा है। मान्यता है कि यहां गुफा में विराजित मुखरी माता के केवल दर्शन करने से ही भक्तों के समस्त सांसारिक कष्टों और संतापों का निवारण हो जाता है। इस गुफा देवालय से एक मूक पक्षी युगल की अमर भक्ति गाथा भी जुड़ी हुई है। जनश्रुति है कि एक मोर और मोरनी के जोड़े ने इस पावन मंदिर प्रांगण में अनवरत जप और ध्यान करते हुए एक साथ अपने प्राण त्यागे थे। उनकी इस निश्छल साधना से अभिभूत होकर स्थानीय श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर में ही उनकी पवित्र समाधि बनाई और वहां उनका स्मारक देवालय स्थापित किया। सुरक्षा की दृष्टि से वर्तमान में इस संकरी गुफा के प्रवेश द्वार पर मजबूत दरवाजा लगाकर इसे बंद रखा जाता है, क्योंकि लोकविश्वास के अनुसार इस बीस किलोमीटर से अधिक लंबी गुफा का दूसरा सिरा सीधे माउंट आबू में स्थित अधर देवी मंदिर के समीप निकलता है। माउंट आबू की यात्रा पर आने वाले सैलानी इस तीर्थ के दर्शन अवश्य करते हैं, जबकि नवरात्रि पर्व के दौरान यहां विशाल धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं जिनमें कई सीमावर्ती गांवों के लोग एकत्र होते हैं। इसका आप पर असर सिरोही और अरावली क्षेत्र के ऐतिहासिक मंदिरों की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए यह जानकारी धार्मिक और यात्रा दोनों दृष्टियों से उपयोगी है। • राजस्थान में: सिरोही जिले में स्थित इन प्राचीन शक्ति धामों के संरक्षण और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलने से स्थानीय आजीविका और कुटीर व्यापार को बल मिलता है। इससे माउंट आबू आने वाले पर्यटकों के लिए यात्रा के नए विकल्प भी खुलते हैं। • सिरोही में: सिरणवा पर्वत पर 1000 सीढ़ियों की चढ़ाई और उमरनी के दो शेरों वाले भद्रकाली मंदिर तक पहुंच मार्ग सुगम होने से स्थानीय भक्तों को सुविधा होती है। नवरात्रि जैसे प्रमुख त्योहारों पर आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले हजारों श्रद्धालुओं के लिए प्रबंधन बेहतर होता है। • श्रद्धालुओं के लिए: आरासना अंबा माता और मुखरी माता की 21 किलोमीटर लंबी गुफा के दर्शनार्थियों को सुरक्षा और स्थानीय मान्यताओं के नियमों का पालन करना होता है। गुफा का द्वार बंद होने के कारण तीर्थयात्री बाहर से ही दर्शन कर सकते हैं। • सांस्कृतिक शोधार्थियों के लिए: 8 हजार साल पुरानी मान्यताओं और देवड़ा राजवंश से जुड़े 1206 के ऐतिहासिक साक्ष्यों को जानने का अवसर मिलता है। क्षेत्रीय लोककथाओं और मूर्तिकला के दुर्लभ नमूनों का अध्ययन करने में मदद मिलती है। ऐसा क्यों हुआ सिरोही की भौगोलिक स्थिति और अरावली पर्वतमाला की दुर्गम घाटियों ने सदियों से संतों, तपस्वियों और शरणार्थियों को प्राकृतिक आश्रय प्रदान किया, जिससे यहां विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं का जन्म हुआ। • भौगोलिक और प्राकृतिक परिस्थितियां: अरावली की ऊंची पहाड़ियों, प्राकृतिक गुफाओं और वनों ने तपस्या और सुरक्षित साधना के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार किया। मुखरी माता की 21 किलोमीटर लंबी गुफा और सिरणवा पर्वत इसी प्राकृतिक संरचना के उदाहरण हैं। • ऐतिहासिक और राजवंशीय संरक्षण: वर्ष 1206 में जालोर से निष्कासन के बाद शासक मानिक्यराय को बरलूट में शरण लेनी पड़ी और पुत्र प्राप्ति के बाद देवड़ा राजवंश ने मातर माता को कुलदेवी की तरह मान्यता दी। इसी प्रकार दांता के राजाओं की भक्ति ने अंबाजी तीर्थ के विस्तार में भूमिका निभाई। • पौराणिक तपस्या और असुर वध की मान्यताएं: राजा अम्बरीष की कठोर साधना और मां भद्रकाली के कल्याणी रूप में दर्शन ने उमरनी के मंदिर की नींव रखी। वहीं आरासुर राक्षस के वध की स्मृति में आरासना माता का नामकरण हुआ। • सुरक्षा कारणों से गुफा का बंद होना: आबूराज स्थित मुखरी माता की गुफा अत्यधिक संकरी और 21 किलोमीटर लंबी होने के कारण किसी भी दुर्घटना से बचाव के लिए द्वार लगाकर बंद कर दी गई। सवाल-जवाब 1. आरासना अंबा माता मंदिर की मुख्य विशेषता क्या है? इस मंदिर में पारंपरिक मूर्ति की जगह देवी के नाभिकमल रूपी चक्र की पूजा की जाती है, जिनका नाम आरासुर राक्षस के वध पर पड़ा। 2. मातर माता मंदिर तक पहुंचने के लिए कितनी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं? सिरोही के सिरणवा पर्वत पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 1000 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। 3. उमरनी के भद्रकाली मंदिर की क्या खासियत है? यह देश का संभवतः एकमात्र मंदिर है जहां मां भद्रकाली दो शेरों पर सवार दिखाई देती हैं और इसका इतिहास करीब 8 हजार वर्ष पुराना माना जाता है। 4. मुखरी माता मंदिर की गुफा कितनी लंबी है और यह कहां निकलती है? यह प्राकृतिक गुफा करीब 21 किलोमीटर लंबी है और माना जाता है कि इसका दूसरा छोर माउंट आबू के अधर देवी मंदिर के पास निकलता है। 5. देवड़ा राजवंश का मातर माता मंदिर से क्या संबंध है? वर्ष 1206 में बरलूट के शासक मानिक्यराय को मातर माता के आशीर्वाद से पुत्र प्राप्त हुआ था, जिसके बाद देवड़ा राजवंश में वंश वृद्धि की मान्यता स्थापित हुई। 6. मुखरी माता मंदिर में मोर-मोरनी का मंदिर क्यों बना है? मान्यता के अनुसार एक मोर और मोरनी के जोड़े ने मंदिर परिसर में साधना करते हुए एक साथ प्राण त्यागे थे, जिसके बाद उनकी समाधि बनाकर मंदिर निर्मित किया गया। https://trendkia.com/rajasthan/aravalli-ki-vadiyon-men-devi-ke-chara-alaukika-dhama-do-sheron-ki-savari-se-21-kilomitara-gupha-taka-ka-rahasya-48961 TrendKia — Har trend, sabse pehle.