# बाड़मेर के गांवों में गोबर से बन रही रसोई गैस, एलपीजी और लकड़ी के धुएं से मिली बड़ी राहत

> राजस्थान के बाड़मेर जिले में मवेशियों के गोबर से बायोगैस बनाकर ग्रामीण अपनी रसोई चला रहे हैं, जिससे एलपीजी सिलेंडर के खर्च और चूल्हे के धुएं दोनों से छुटकारा मिला है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-09-22 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/barmer-ke-ganvon-men-gobara-se-bana-rahi-rasoi-gaisa-lpg-aura-lakari-ke-dhuen-se-mili-bari-rahata-36197 · **Language:** Hindi
**Tags:** बाड़मेर, बायोगैस, एलपीजी, ग्रामीण विकास, पर्यावरण, राजस्थान

राजस्थान के बाड़मेर जिले के ग्रामीण इलाकों में अब मवेशियों का गोबर घरों के लिए स्वच्छ ईंधन का सबसे बड़ा जरिया बन रहा है। जिन पशु अपशिष्टों को लोग लंबे समय तक अनुपयोगी मानते थे, अब उन्हीं से बायोगैस संयंत्रों के जरिए रसोई गैस तैयार की जा रही है। इस स्थानीय व्यवस्था से ग्रामीणों की बाजार से मिलने वाले एलपीजी सिलेंडरों पर निर्भरता काफी हद तक कम हो गई है। इसके साथ ही घरों में लकड़ी और उपलों वाले चूल्हों से उठने वाले दमघोंटू धुएं की समस्या भी खत्म होने लगी है, जिससे ग्रामीण परिवेश की महिलाओं को खाना पकाने में आसानी हो रही है।

## रसोई के बजट और स्वास्थ्य को मिला दोहरा फायदा
पारंपरिक मिट्टी के चूल्हों पर भोजन बनाते समय महिलाओं को घंटों तक जहरीले धुएं के बीच बैठना पड़ता था, जिसके कारण आंखों में तेज जलन और सांस से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। बायोगैस प्रणाली के आने से इस तरह की रोजमर्रा की तकलीफों से निजात मिली है। दूसरी तरफ, बाजार में एलपीजी सिलेंडरों की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी सीधे घरेलू आर्थिक संतुलन को बिगाड़ती थी। गोबर से बनने वाली गैस पर निर्भरता बढ़ने के बाद परिवारों को न तो बार-बार नया सिलेंडर भरवाने की चिंता सताती है और न ही चूल्हे की कालिख साफ करनी पड़ती है। सुरक्षा के लिहाज से भी ग्रामीणों को यह तरीका ज्यादा निश्चिंत करता है, क्योंकि इसमें सिलेंडर विस्फोट या अनियंत्रित आग लगने जैसा खतरा न के बराबर रहता है।

## बाड़मेर के इन इलाकों में तेजी से लग रहे हैं संयंत्र
जिले के अनेक ग्रामीण कस्बों और बस्तियों में इस देसी तकनीक को अपनाकर प्लांट स्थापित किए गए हैं। बाड़मेर जिले के भीतर कितनोरिया, धनाऊ, सेड़वा, बाड़मेर मुख्यालय क्षेत्र, जानपालिया, बाखासर, चौहटन, आलमसर और धोरीमन्ना सहित दर्जनों क्षेत्रों में परिवारों ने अपने घरों के आसपास बायोगैस संयंत्र लगाए हैं। इन सभी स्थानों पर पशुपालक परिवार अपनी गायों और भैंसों के गोबर का सदुपयोग करके नियमित रूप से गैस पैदा कर रहे हैं, जिससे पूरे गांव में स्वच्छ ईंधन का एक नया विकल्प तैयार हो रहा है।

## टैंक में कैसे बनती है मीथेन युक्त बायोगैस
इस पूरी प्रणाली की कार्यप्रणाली बेहद सीधी और पर्यावरण के अनुकूल है। एक बंद प्लास्टिक टैंक के भीतर गोबर को सामान्य पानी के साथ अच्छी तरह घोलकर डाला जाता है। इस टैंक के अंदर ऑक्सीजन पूरी तरह से बंद रहती है, जिससे वहां मौजूद सूक्ष्मजीव सक्रिय हो जाते हैं और मिश्रण का विघटन शुरू कर देते हैं। इस प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया से मीथेन युक्त ज्वलनशील बायोगैस पैदा होती है। इसके बाद टैंक से पाइपलाइन को सीधे घर की रसोई तक जोड़ दिया जाता है, जहां बर्नर जलाकर परिवार के लिए दोनों समय का भोजन आसानी से तैयार किया जाता है।

## संगीता का अनुभव और रोजमर्रा की जिंदगी में बदलाव
जानपालिया गांव की रहने वाली संगीता का कहना है कि पहले जब वे लकड़ियों और उपलों के सहारे चूल्हा जलाती थीं, तब चारों तरफ फैलने वाले धुएं से आंखों में अत्यधिक जलन होती थी और काम करना दूभर हो जाता था। इसके बाद एलपीजी के उपयोग के दौरान बढ़ती दरों ने घर के सामान्य मासिक बजट को प्रभावित किया। हालांकि अब गाय और भैंस के गोबर से संचालित बायोगैस प्लांट लगने से बेहद मामूली खर्च पर पूरे परिवार का भोजन बन रहा है। उनका यह भी मानना है कि इस व्यवस्था में सिलेंडर फटने अथवा आकस्मिक आगजनी जैसी दुर्घटनाओं की कोई आशंका नहीं रहती, जिससे रसोई का काम पूरी तरह सुरक्षित हो गया है।

## इसका आप पर असर
यह पहल ग्रामीण परिवारों को महंगे रसोई ईंधन के विकल्प के रूप में आत्मनिर्भर बनाने में मदद करती है।

- **राजस्थान में:** बाड़मेर के ग्रामीण परिवारों के लिए रसोई गैस की लागत में भारी कमी आएगी। इससे एलपीजी सिलेंडर की बुकिंग और ढुलाई से जुड़ी परेशानियां खत्म होंगी।
- **घरेलू स्वास्थ्य पर असर:** महिलाओं को लकड़ी के चूल्हे से निकलने वाले हानिकारक धुएं से स्थायी राहत मिलेगी। इससे आंखों की जलन और सांस की बीमारियों का खतरा काफी घट जाएगा।
- **सुरक्षा और सहूलियत:** रसोई में सिलेंडर फटने या अनियंत्रित आग लगने जैसी दुर्घटनाओं की आशंका नहीं रहती। इसके उपयोग से घरों में बिना किसी अतिरिक्त ईंधन खर्च के सुरक्षित भोजन बनता रहेगा।
- **अपशिष्ट प्रबंधन:** पशुपालक परिवारों के लिए मवेशियों के गोबर का घर पर ही उत्पादक निस्तारण संभव हो जाता है। इससे आसपास का वातावरण भी स्वच्छ बना रहता है।

## ऐसा क्यों हुआ
ग्रामीण क्षेत्रों में महंगे वाणिज्यिक सिलेंडरों की बढ़ती दरों और लकड़ी के चूल्हों से होने वाली स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के चलते बायोगैस को अपनाया गया है।

- **एलपीजी की कीमतों का दबाव:** बाजार में एलपीजी सिलेंडरों की कीमतें लगातार बढ़ने से ग्रामीण परिवारों के मासिक बजट पर सीधा असर पड़ रहा था। इस आर्थिक बोझ को कम करने के लिए घर में ही उपलब्ध गोबर से गैस बनाने की विधि अपनाई गई।
- **लकड़ी के धुएं से होने वाली बीमारियां:** पारंपरिक चूल्हों में लकड़ी जलाने पर उठने वाले धुएं से महिलाओं की आंखों में जलन और स्वास्थ्य समस्याएं होती थीं। स्वच्छ विकल्प तलाशने की जरूरत ने बायोगैस संयंत्रों की स्थापना को प्रेरित किया।
- **पशुधन और कच्चे माल की उपलब्धता:** बाड़मेर के ग्रामीण इलाकों में मवेशियों की अच्छी संख्या के कारण गोबर और पानी आसानी से उपलब्ध हैं। इस स्थानीय संसाधन के चलते बिना किसी अतिरिक्त कच्चे माल के प्लांट चलाना संभव हुआ।

## सवाल-जवाब

### 1. बाड़मेर में गोबर से बायोगैस कैसे बनाई जा रही है?
गोबर और पानी को मिलाकर एक बंद प्लास्टिक टैंक में डाला जाता है, जहां ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में सूक्ष्मजीव इसे विघटित कर मीथेन गैस बनाते हैं।

### 2. बाड़मेर जिले के किन प्रमुख क्षेत्रों में बायोगैस संयंत्र लगे हैं?
कितनोरिया, धनाऊ, सेड़वा, बाड़मेर, जानपालिया, बाखासर, चौहटन, आलमसर और धोरीमन्ना सहित कई कस्बों में यह संयंत्र लगाए गए हैं।

### 3. बायोगैस के इस्तेमाल से महिलाओं को क्या फायदा हुआ है?
महिलाओं को चूल्हे के धुएं और आंखों की जलन से राहत मिली है और एलपीजी सिलेंडर पर होने वाले भारी खर्च से भी छुटकारा मिला है।

### 4. क्या बायोगैस प्रणाली को एलपीजी की तुलना में सुरक्षित माना जाता है?
हां, ग्रामीणों के अनुसार इसमें एलपीजी सिलेंडर के फटने या अनियंत्रित आग लगने जैसी दुर्घटनाओं का खतरा नहीं रहता है।

## प्रेरणा और सबक
बाड़मेर के ग्रामीणों ने बेकार समझे जाने वाले पशु अपशिष्ट को स्वच्छ ऊर्जा में बदलकर आत्मनिर्भरता का बेहतरीन उदाहरण पेश किया है।

- **संसाधनों की उपयोगिता पहचानना:** जिस गोबर को व्यर्थ समझा जाता था, उसका वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करके ग्रामीण ईंधन आत्मनिर्भर बने हैं। उपलब्ध संसाधनों का सही मूल्यांकन बड़ी बचत का मार्ग खोलता है।
- **स्थानीय समस्याओं का व्यावहारिक समाधान:** महंगाई और धुएं से जूझने के बजाय ग्रामीणों ने सरल देसी तकनीक अपनाकर समाधान निकाला। दृढ़ इच्छाशक्ति से बड़ी से बड़ी घरेलू चुनौती का सस्ता हल ढूंढा जा सकता है।
- **सुरक्षा और पर्यावरण का संतुलन:** ग्रामीणों ने पारंपरिक व्यवस्था को त्यागकर ऐसे विकल्प को चुना जो पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के अनुकूल है। सुरक्षित और टिकाऊ विकल्पों को अपनाना जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाता है।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._