{
  "type": "article",
  "title": "बाड़मेर के श्मशान घाट में 125 से अधिक मृतकों के अवशेष अपनों की राह ताक रहे, लॉकरों पर जमी धूल और जाले",
  "summary": "बाड़मेर शहर के सार्वजनिक श्मशान गृह में 125 से ज्यादा मृतकों की अस्थियां वर्षों से लॉकरों में सुरक्षित रखी हैं। इनमें कोरोना काल की भी अस्थियां शामिल हैं, जिनके विसर्जन की प्रतीक्षा में करीब 10 वर्ष बीत चुके हैं।",
  "content": "श्राद्ध पक्ष के पावन पखवाड़े में जब श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और विशेष धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कर रहे हैं, उसी समय बाड़मेर शहर के सार्वजनिक श्मशान घाट के भीतर एक अत्यंत भावुक कर देने वाला दृश्य बना हुआ है। यहाँ बने धातु के लॉकरों में 125 से ज्यादा लोगों की अस्थियां वर्षों से अपनों की राह देख रही हैं। जिन परिजनों को अंतिम संस्कार के पश्चात इन अस्थियों को सहेजकर हरिद्वार ले जाना था और पवित्र गंगा नदी में विसर्जित कर दिवंगत आत्मा को मोक्ष का मार्ग दिखाना था, वे वर्षों बीत जाने के बावजूद इन्हें लेने नहीं पहुंचे हैं।\n\nधूल और मकड़ी के जालों में तब्दील हुआ अपनों का इंतजार\nश्मशान गृह परिसर में बने इन लॉकरों की दशा देखकर यह साफ पता चलता है कि यहाँ कई बक्सों को वर्षों से खोला तक नहीं गया है। लॉकरों के दरवाजों और उन पर लटके तालों पर अब धूल की मोटी परतें और मकड़ी के जाले जम चुके हैं। परिजनों के पास समय का संकट रहा हो या फिर कोई पारिवारिक और आर्थिक मजबूरी, अंतिम संस्कार के बाद पूरी की जाने वाली यह विसर्जन रस्म करीब 10 वर्षों से अधूरी पड़ी हुई है। इन बंद खानों में कुछ अवशेष उस दौर के भी हैं जब देश में कोरोना संक्रमण फैला हुआ था और कई परिवारों के सदस्य महामारी के दौरान काल के गाल में समा गए थे। वे ताले आज भी इस मूक उम्मीद में बंद हैं कि कोई रक्त संबंधी आएगा, चाबी घुमाएगा और अपने पूर्वज को गरिमापूर्ण अंतिम विदाई देगा।\n\nस्थान की कमी के बीच सामाजिक संस्था ने संभाली जिम्मेदारी\nलंबे समय तक अस्थियों को न ले जाने के कारण जब श्मशान घाट के लॉकरों में नए कलश रखने के लिए जगह लगातार कम पड़ने लगी, तब इस दिशा में एक मानवीय पहल शुरू की गई। श्मशान प्रबंधन ने हेल्पिंग हेल्प ग्रुप बीकानेर के सहयोग से लावारिस और भूली जा चुकी अस्थियों के विधिवत विसर्जन का बीड़ा उठाया। इसी क्रम में वर्ष 2025 में 25 मृतकों की अस्थियों को सम्मानपूर्वक हरिद्वार ले जाकर पूरे विधि-विधान के साथ गंगा में विसर्जित कराया गया। इससे पूर्व कोरोना महामारी के मुश्किल दौर में भी इसी तरह की पहल करते हुए लगभग 75 मृतकों के अवशेषों का गंगा में विसर्जन संपन्न कराया गया था। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य उन सभी दिवंगत आत्माओं की अंतिम इच्छा और सनातन परंपरा का सम्मान करना है जिनके अपने किसी न किसी मजबूरी के चलते हरिद्वार नहीं जा सके।\n\nपितृपक्ष में गहराया विसर्जन का आध्यात्मिक महत्व\nश्मशान घाट समिति के संयोजक भैरूसिंह फुलवरिया ने इस स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वर्तमान में पितृपक्ष का समय चल रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध के दिनों में पूर्वजों के स्मरण, उनकी तृप्ति और उनके मोक्ष हेतु किए जाने वाले कर्मकांड का अत्यंत विशिष्ट स्थान होता है। ऐसे पुण्य काल में श्मशान के अंधेरे लॉकरों में रखी ये अस्थियां मानो और भी बेसब्री से इस प्रतीक्षा में हैं कि कोई अपना आए और उन्हें पारिवारिक हाथों से मुक्ति के धाम हरिद्वार तक पहुंचाए, ताकि वर्षों से अटका यह अंतिम धार्मिक संस्कार पूर्णता प्राप्त कर सके।\n\nइसका आप पर असर\nयह समाचार अंतिम संस्कार के बाद अस्थियों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने और विसर्जन की प्रक्रिया को लेकर श्मशान प्रबंधन की व्यवस्थाओं को दर्शाता है।\n\n• राजस्थान में: बाड़मेर और आसपास के श्मशान गृहों में लॉकर की सीमित जगह होने के कारण परिजनों को समय पर अस्थियां लेने का संदेश दिया जा रहा है। यदि परिजन लंबे समय तक नहीं आते हैं तो संस्थागत स्तर पर अंतिम विसर्जन की कार्यवाही की जाती है।\n• भारत में: यदि किसी परिवार ने श्मशान घाट के लॉकर में अपने किसी परिजन की अस्थियां सुरक्षित रखी हैं, तो उन्हें समय रहते संपर्क करना चाहिए। लावारिस स्थिति में होने पर सामाजिक संस्थाएं निर्धारित अंतराल पर सामूहिक विसर्जन संपन्न करवाती हैं।\n• पारिवारिक दायित्व: धार्मिक संस्कारों के अनुसार श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों के अवशेषों का विसर्जन सर्वाधिक फलदायी माना जाता है। परिजनों को चाहिए कि वे अपने नजदीकी श्मशान घाट जाकर लंबित अस्थि कलश प्राप्त करें।\n• व्यवस्थागत नियम: श्मशान प्रबंधन पर लगातार बढ़ते दबाव को देखते हुए आगामी दिनों में लॉकर रखने की समय सीमा तय की जा सकती है। इससे आम नागरिकों को निर्धारित अवधि के भीतर विसर्जन प्रक्रिया पूरी करनी होगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nश्मशान घाट के लॉकरों में 125 से ज्यादा अस्थियों के वर्षों तक लावारिस पड़े रहने के पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और परिस्थितिजन्य कारण जिम्मेदार रहे हैं।\n\n• कोरोना का प्रभाव: कोरोना महामारी के दौरान लगे कठोर यात्रा प्रतिबंधों, संक्रमण के भय और पारिवारिक संकटों के चलते कई लोग अस्थियां विसर्जन के लिए हरिद्वार नहीं ले जा सके। उस कठिन समय में श्मशान में रखे गए कई कलश आज भी वहीं बंद पड़े हैं।\n• पारिवारिक मजबूरियां: कई परिवारों में आर्थिक तंगी, लंबी दूरी की यात्रा करने में असमर्थता अथवा समय के अभाव के कारण अंतिम विसर्जन की योजना लगातार टलती रही। समय बीतने के साथ ये अवशेष लॉकरों में छूटते चले गए।\n• स्थान की कमी: लगभग एक दशक से लगातार नए कलश जमा होने और पुराने न निकाले जाने के कारण लॉकर रूम पूरी तरह भर गया। इसके बाद सामाजिक समूह को हस्तक्षेप कर सामूहिक विसर्जन का रास्ता चुनना पड़ा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बाड़मेर के श्मशान घाट में कितनी अस्थियां अपनों के इंतजार में रखी हैं?\nबाड़मेर शहर के सार्वजनिक श्मशान गृह के लॉकरों में 125 से ज्यादा मृतकों की अस्थियां वर्षों से रखी हुई हैं।\n\n2. यह विसर्जन रस्म कितने समय से अधूरी पड़ी है?\nश्मशान घाट में कुछ अस्थियां करीब 10 वर्षों से और कुछ कोरोना महामारी के समय से विसर्जन के इंतजार में बंद हैं।\n\n3. वर्ष 2025 में कितनी अस्थियों का विसर्जन कराया गया?\nहेल्पिंग हेल्प ग्रुप बीकानेर के सहयोग से वर्ष 2025 में 25 अस्थियों को हरिद्वार ले जाकर विधिवत विसर्जित कराया गया।\n\n4. कोरोना काल के दौरान कितनी अस्थियों का विसर्जन किया गया था?\nकोरोना काल के दौरान करीब 75 लावारिस अस्थियों का गंगा में विधि-विधान से विसर्जन कराया गया था।\n\n5. बाड़मेर श्मशान घाट समिति के संयोजक कौन हैं?\nबाड़मेर श्मशान घाट समिति के संयोजक भैरूसिंह फुलवरिया हैं।",
  "url": "https://trendkia.com/rajasthan/barmer-ke-shmashana-ghata-men-125-se-adhika-mritakon-ke-avashesha-apanon-ki-raha-taka-rahe-lokaron-para-jami-dhula-aura-jale-42776",
  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-10-04",
  "tags": [
    "बाड़मेर",
    "श्मशान घाट",
    "अस्थि विसर्जन",
    "श्राद्ध पक्ष",
    "पितृपक्ष",
    "हरिद्वार",
    "भैरूसिंह फुलवरिया",
    "राजस्थान"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}