# बाड़मेर में 520 किलो की पत्थर की मूर्ति के साथ अनोखा गणेश पंडाल, पोस्टर म्यूजियम से दिया सनातन धर्म का संदेश

> बाड़मेर के जुनी चौकी पाड़ा में आजाद युवा ग्रुप ने 520 किलो वजनी पत्थर की गणेश प्रतिमा स्थापित कर पर्यावरण संरक्षण की अनूठी मिसाल पेश की है, साथ ही पंडाल को पोस्टर म्यूजियम का रूप दिया है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-09-18 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/barmer-men-520-kilo-ki-patthara-ki-murti-ke-satha-anokha-ganesh-pndala-poster-museum-se-diya-sanatan-dharma-ka-sndesha-33218 · **Language:** Hindi
**Tags:** गणेश उत्सव, बाड़मेर समाचार, पर्यावरण संरक्षण, आजाद युवा ग्रुप, पत्थर के गणेश, राजस्थान पर्यटन, सनातनी संस्कृति

राजस्थान के सीमावर्ती जिले बाड़मेर में इस बार गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर आस्था, कलात्मकता और पर्यावरण जागरूकता का एक बेहद खूबसूरत और अनोखा नजारा देखने को मिल रहा है। बाड़मेर शहर के हृदय स्थल जुनी चौकी पाड़ा में आजाद युवा ग्रुप द्वारा स्थापित किया गया गणेश पंडाल इन दिनों पूरे इलाके में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। इस विशेष पंडाल की अनूठी विशेषता यह है कि आयोजकों ने इसे एक भव्य पोस्टर म्यूजियम का रूप दिया है, जहां प्लास्टर ऑफ पेरिस की हानिकारक मूर्तियों के बजाय सांगली से लाई गई भारी-भरकम पत्थर की गणेश प्रतिमा को स्थापित किया गया है।

 

## पोस्टर म्यूजियम के जरिए सनातन संस्कृति से जुड़ाव

इस पंडाल को साधारण तरीके से सजाने के बजाय आयोजकों ने इसे एक जीवंत और ज्ञानवर्धक पोस्टर म्यूजियम की तरह तैयार किया है। पंडाल की दीवारों पर भारत के प्रमुख बावन शक्तिपीठों, बारह ज्योतिर्लिंगों, संपूर्ण शिव परिवार और भगवान के विभिन्न पौराणिक अवतारों से जुड़े बेहद सुंदर और रंगीन सचित्र पोस्टर लगाए गए हैं। बप्पा के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु, विशेषकर बच्चे और युवा पीढ़ी, कतारों में खड़े होकर इन चित्रों के माध्यम से हमारे समृद्ध धार्मिक इतिहास, सनातन संस्कारों और गौरवशाली पौराणिक विरासत से सीधे तौर पर परिचित हो रहे हैं। यह रचनात्मक प्रयास केवल आध्यात्मिक दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों को हमारी ऐतिहासिक कहानियों से भी जोड़ने का काम कर रहा है।

 

## साल 2013 से अनवरत पूजे जा रहे 520 किलो के पत्थर वाले बप्पा

आजाद युवा ग्रुप के सदस्यों द्वारा गणेशोत्सव के दौरान मूर्ति स्थापना का यह सिलसिला साल 2005 से ही लगातार चलाया जा रहा है। शुरुआती वर्षों में यहां स्थापित की जाने वाली मूर्तियां पारंपरिक मिट्टी से तैयार की जाती थीं। इसके बाद, साल 2013 में समूह के सदस्यों ने एक बड़ा बदलाव करने का फैसला किया और जोधपुर के निकट सांगली नामक स्थान से लगभग 520 किलोग्राम वजन वाली एक विशाल पत्थर की गणेश प्रतिमा को बाड़मेर लेकर आए। तब से लेकर आज तक हर साल इसी ऐतिहासिक और भव्य प्रतिमा की पूजा-अर्चना की जाती है। उत्सव के दौरान यहां प्रत्येक बुधवार को महाआरती और विशेष छप्पन भोग का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही, प्रतिदिन संध्याकाल में होने वाले दीपोत्सव के दौरान पंडाल में सैकड़ों दीये जलाए जाते हैं, जिसे देखने के लिए बाड़मेर वासियों की अपार भीड़ उमड़ती है।

 

## जल संरक्षण और पर्यावरण हितैषी विसर्जन की मिसाल

बप्पा की इस विशाल पत्थर की मूर्ति को स्थापित करने के पीछे एक बहुत ही महत्वपूर्ण और गहरा संदेश छिपा हुआ है, जो सीधे तौर पर पर्यावरण और जल स्रोतों की सुरक्षा से जुड़ा है। आजाद युवा ग्रुप के सक्रिय सदस्य रवि सोनी ने बताया कि PoP से बनी प्रतिमाओं का जब तालाबों और नदियों में विसर्जन किया जाता है, तो उनसे निकलने वाले जहरीले रसायन पानी को प्रदूषित कर देते हैं, जिससे जलीय जीवों के जीवन को गंभीर खतरा पैदा होता है। इस विकराल समस्या के समाधान के रूप में इस समूह ने पत्थर की प्रतिमा का विकल्प चुना। गणेशोत्सव की समाप्ति पर इस बेहद भारी प्रतिमा को किसी भी जल स्रोत में विसर्जित नहीं किया जाता है। इसके स्थान पर पंडाल में ही पूरे विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ बप्पा को प्रतीकात्मक स्नान कराया जाता है। इसके बाद, इस पवित्र प्रतिमा को पूरे आदर और सम्मान के साथ पुराने सुनारों के वास नामक स्थान पर सुरक्षित रख दिया जाता है, ताकि अगले वर्ष इसे फिर से स्थापित किया जा सके।

## इसका आप पर असर
बाड़मेर में की गई यह अनूठी पर्यावरण-अनुकूल पहल न केवल स्थानीय निवासियों को जागरूक करती है बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक संदेश देती है।

- **देशभर में:** यह पहल देश के अन्य उत्सव आयोजकों के लिए एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है। इससे लोग पर्यावरण के नुकसान के बिना पारंपरिक उत्सवों को नए तरीकों से मनाना सीख सकते हैं।

- **बाड़मेर में:** स्थानीय निवासियों को एक प्रदूषण-मुक्त त्योहार मनाने का अवसर मिल रहा है, जिससे पेयजल स्रोतों में रासायनिक कचरा नहीं जाता है। इसके अलावा, स्थानीय युवाओं और बच्चों को अपने ही क्षेत्र में भारतीय पौराणिक इतिहास के बारे में जानने का अवसर मिल रहा है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह पहल जल प्रदूषण से बचने और नई पीढ़ी को भारतीय सनातन इतिहास से जोड़ने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।

- **जल प्रदूषण का संकट:** प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी प्रतिमाओं का विसर्जन करने से पानी की गुणवत्ता खराब होती है और जलीय जीवों को खतरा होता है। इस गंभीर संकट को रोकने के लिए आयोजकों ने जल विसर्जन का पूरी तरह से त्याग करने का निर्णय लिया।

- **सांस्कृतिक जागरूकता की कमी:** युवा पीढ़ी को भारतीय परंपराओं से जोड़ने के लिए पंडाल को एक शैक्षणिक पोस्टर म्यूजियम का रूप दिया गया। इसके माध्यम से भक्त दर्शन के साथ-साथ ज्ञान भी प्राप्त कर पा रहे हैं।

- **स्थायी विकल्प की खोज:** 2005 से शुरू हुए इस उत्सव में बार-बार मूर्तियों के विसर्जन और बर्बादी को रोकने के लिए 2013 में जोधपुर से एक स्थायी पत्थर की मूर्ति मंगवाई गई।

## सवाल-जवाब

### 1. यह अनोखा गणेश पंडाल कहां स्थित है?
यह पंडाल राजस्थान के बाड़मेर शहर के जुनी चौकी पाड़ा क्षेत्र में स्थित है, जिसे आजाद युवा ग्रुप द्वारा सजाया गया है।

### 2. यहां स्थापित की गई गणेश जी की मूर्ति का वजन कितना है और यह किस सामग्री से बनी है?
इस प्रतिमा का वजन लगभग 520 किलोग्राम है और यह जोधपुर के समीप सांगली से लाए गए विशेष पत्थर से बनी है।

### 3. इस पंडाल को किस खास थीम पर सजाया गया है?
इस पंडाल को एक 'पोस्टर म्यूजियम' की थीम पर सजाया गया है, जिसमें भारत के 52 शक्तिपीठों, 12 ज्योतिर्लिंगों और भगवान के अवतारों के सचित्र पोस्टर प्रदर्शित किए गए हैं।

### 4. गणेशोत्सव की समाप्ति पर इस भारी पत्थर की मूर्ति का विसर्जन कैसे किया जाता है?
इस मूर्ति को किसी जलाशय में विसर्जित नहीं किया जाता। इसके स्थान पर पंडाल में ही विधि-विधान से स्नान कराकर प्रतिमा को 'पुराने सुनारों के वास' में सुरक्षित रख दिया जाता है।

### 5. आजाद युवा ग्रुप द्वारा इस मूर्ति की स्थापना कब से की जा रही है?
इस ग्रुप ने साल 2005 से गणेशोत्सव मनाना शुरू किया था, लेकिन इस भारी पत्थर की मूर्ति की स्थापना साल 2013 से लगातार की जा रही है।

## प्रेरणा और सबक
इस अनूठी पहल से हर उत्सव समिति और युवाओं को कई महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं।

- **पर्यावरण सर्वोपरि:** आस्था और पूजा के तरीकों को इस तरह ढाला जा सकता है कि हमारी नदियां और तालाब पूरी तरह सुरक्षित रहें।

- **रचनात्मक शिक्षा:** त्योहारों को केवल मनोरंजन का साधन न बनाकर ज्ञान और संस्कृति के प्रसार का केंद्र बनाया जा सकता है।

- **स्थायित्व और सम्मान:** बप्पा की मूर्ति को बार-बार विसर्जित करने के बजाय उसे सहेजकर रखना बप्पा के प्रति सच्चे सम्मान को दर्शाता है।

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