# बाड़मेर में छाई पांच हजार साल पुरानी कांस्य थाली मालिश, बिना दवा दूर हो रहा दर्द

> राजस्थान के बाड़मेर में पांच हजार साल पुरानी आयुर्वेद आधारित कांस्य थाली मालिश पद्धति इन दिनों खासी चर्चा में है। बिना किसी अंग्रेजी दवा के केवल दस मिनट की इस प्रक्रिया से लोगों को जोड़ों के दर्द और थकान से राहत मिल रही है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-09-16 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/barmer-men-chhai-panch-hazaar-saal-purani-kansya-thaali-maalish-32766 · **Language:** Hindi
**Tags:** बाड़मेर, कांस्य थाली मालिश, आयुर्वेदिक चिकित्सा, एक्यूप्रेशर, प्राकृतिक चिकित्सा, राजस्थान

भारत और पाकिस्तान की सीमा से सटे राजस्थान के बाड़मेर जिले में प्राचीन भारतीय चिकित्सा का एक अनोखा रूप इन दिनों काफी लोकप्रियता हासिल कर रहा है। आधुनिक जीवनशैली की भागदौड़ और अनियमित दिनचर्या के बीच, हजारों साल पुरानी एक प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति लोगों के लिए वरदान साबित हो रही है। बिना किसी आधुनिक अंग्रेजी दवा या रासायनिक पेनकिलर के सहारे लोगों के हाथ-पैरों की जकड़न और पुराने दर्द को दूर करने वाली इस तकनीक को कांस्य थाली मालिश के रूप में जाना जाता है। इस पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का इतिहास करीब पांच हजार साल पुराना आयुर्वेद से जुड़ा है, जो आज के तकनीकी दौर में भी अपनी प्रासंगिकता और चमत्कारी परिणामों के कारण लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।

## बाड़मेर में पारंपरिक उपचार का बढ़ता दायरा
बाड़मेर शहर के निवासी अंकित कुमार इस प्राचीन कांस्य थाली पद्धति का उपयोग कर पारंपरिक तरीके से जरूरतमंद लोगों का उपचार कर रहे हैं। उनके इस अनूठे उपचार केंद्र पर किसी भी तरह की आधुनिक फार्मास्युटिकल दवाओं या दर्द निवारक गोलियों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इसके विपरीत, केवल एक साधारण सी दिखने वाली कांस्य की थाली और कुछ विशेष आयुर्वेदिक तेलों के सम्मिश्रण के जरिए वह मरीजों को उनकी शारीरिक पीड़ा से मुक्ति दिला रहे हैं। अपनी शारीरिक थकान, मांसपेशियों की गंभीर जकड़न और लंबे समय से चले आ रहे पुराने दर्द से परेशान लोग इस पारंपरिक उपचार का लाभ उठाने के लिए दूर-दराज के इलाकों से उनके पास पहुंच रहे हैं।

## क्या है कांस्य थाली की बनावट और मालिश की प्रक्रिया
इस अनूठी प्राचीन चिकित्सा पद्धति में उपयोग की जाने वाली थाली को सामान्य बर्तनों की तरह नहीं बनाया जाता, बल्कि यह विशेष रूप से तांबा, जिंक और टिन के निश्चित और खास मिश्रण से तैयार की जाती है। इस पूरी उपचार प्रक्रिया का तरीका भी बेहद दिलचस्प और आरामदायक होता है। इस तकनीक की शुरुआत में मरीज के पैरों के तलवों पर सरसों का तेल, तिल का तेल या फिर शुद्ध देसी घी की मालिश की जाती है। इसके पश्चात, पैरों को इस विशेष कांस्य की थाली के ऊपर रखा जाता है। इसके बाद एक विशेष उपकरण की सहायता से थाली को गति दी जाती है। जैसे ही मशीन का स्विच ऑन किया जाता है, थाली घूमने लगती है और पैरों के तलवों पर एक नियत तरीके से दबाव बनाते हुए मालिश शुरू हो जाती है।

## एक्यूप्रेशर के सिद्धांतों पर आधारित कार्यप्रणाली
इस विशेष मालिश के संचालन के तौर-तरीकों पर प्रकाश डालते हुए अंकित कुमार बताते हैं कि यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से एक्यूप्रेशर के वैज्ञानिक नियमों और सिद्धांतों पर काम करती है। जब यह कांस्य की थाली पैरों के तलवों पर एक समान और संतुलित दबाव डालती है, तो इसका सीधा प्रभाव शरीर के महत्वपूर्ण दबाव बिंदुओं यानी प्रेशर पॉइंट्स पर पड़ता है। इस प्रकार के लक्षित दबाव से न केवल हाथों और पैरों की पीड़ा का तुरंत समाधान होता है, बल्कि पूरे शरीर की तंत्रिका तंत्र को अभूतपूर्व शांति और आराम मिलता है। इसके अतिरिक्त, इस प्रक्रिया से शरीर के भीतर रक्त का संचार यानी ब्लड सर्कुलेशन भी काफी बेहतर हो जाता है, जिससे मानसिक तनाव और शारीरिक थकान का नामोनिशान मिट जाता है।

## दस मिनट की प्रक्रिया और प्राकृतिक डिटॉक्सिफिकेशन
इस पूरी चिकित्सीय मालिश की समयावधि मात्र दस मिनट की होती है, जो बेहद असरदार साबित होती है। अंकित कुमार के अनुसार, इस दस मिनट के सत्र में पहले पांच मिनट तक पैरों की क्लॉकवाइज यानी घड़ी की सुई की दिशा में मालिश की जाती है और इसके तुरंत बाद के अगले पांच मिनट एंटी-क्लॉकवाइज यानी घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में मालिश की प्रक्रिया को दोहराया जाता है। इस पूरी चिकित्सा पद्धति का सबसे बड़ा और चमत्कारी फायदा यह माना जाता है कि यह शरीर के भीतर छिपे विषैले तत्वों यानी टॉक्सिन्स को प्राकृतिक रूप से बाहर निकाल देती है। मालिश की इस अवधि के दौरान जब शरीर का डिटॉक्स बाहर निकलता है, तो कांस्य की थाली और तेल का रंग बदलकर काला पड़ जाता है। यह कालापन इस बात का सबसे बड़ा और पुख्ता प्रमाण होता है कि शरीर के अंदर लंबे समय से जमा अशुद्धियां पूरी तरह से बाहर निकल चुकी हैं। आज के इस आधुनिक और तनावपूर्ण दौर में यह प्राचीन पद्धति लोगों के स्वास्थ्य के लिए एक अनूठा वरदान साबित हो रही है।

## इसका आप पर असर
बाड़मेर और आसपास के क्षेत्रों में यह प्राचीन कांस्य थाली चिकित्सा शरीर के पुराने दर्द और थकान से जूझ रहे आम लोगों के लिए एक किफायती और प्राकृतिक विकल्प बनकर उभरी है।

- **भारत में:** यह तकनीक देश भर के लोगों को महंगे पेनकिलर और अंग्रेजी दवाओं पर निर्भरता कम करने का एक व्यावहारिक और पारंपरिक विकल्प प्रदान करती है।
- **बाड़मेर में:** स्थानीय निवासियों और दूर-दराज से आने वाले मरीजों को बिना किसी रासायनिक दुष्प्रभाव के केवल दस मिनट के सत्र में शारीरिक जकड़न से राहत मिल रही है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह प्राचीन चिकित्सा पद्धति पांच हजार साल पुरानी आयुर्वेदिक परंपराओं और एक्यूप्रेशर के वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है, जो शरीर के आंतरिक दबाव बिंदुओं को सक्रिय करती है।

- **तांबा, जिंक और टिन का मिश्रण:** इस विशेष थाली की धातु संरचना पैरों के तलवों पर संतुलित दबाव बनाकर तंत्रिका तंत्र को सुकून देती है और रक्त संचार सुधारती है।
- **प्राकृतिक डिटॉक्सिफिकेशन प्रक्रिया:** क्लॉकवाइज और एंटी-क्लॉकवाइज मालिश के जरिए शरीर के भीतर जमे विषैले टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं, जिससे तेल और थाली का रंग काला पड़ जाता है।
- **रासायनिक दवाओं का विकल्प:** आधुनिक दौर की भागदौड़ भरी जीवनशैली में बिना पेनकिलर के तुरंत राहत पाने की जरूरत ने इस पारंपरिक पद्धति को पुनर्जीवित किया है।

## सवाल-जवाब

### 1. कांस्य थाली मालिश मुख्य रूप से किस स्थान पर चर्चा में है?
यह प्राचीन मालिश पद्धति राजस्थान के बाड़मेर जिले में चर्चा का विषय बनी हुई है।

### 2. इस चिकित्सा पद्धति का इतिहास कितना पुराना है?
यह तकनीक करीब पांच हजार साल पुरानी आयुर्वेद आधारित परंपरा से जुड़ी हुई है।

### 3. बाड़मेर में इस तकनीक से लोगों का इलाज कौन कर रहा है?
बाड़मेर शहर के रहने वाले अंकित कुमार इस प्राचीन पद्धति से लोगों का पारंपरिक उपचार कर रहे हैं।

### 4. इस मालिश में किस प्रकार की थाली का उपयोग किया जाता है?
यह थाली विशेष रूप से तांबा, जिंक और टिन के खास मिश्रण से बनाई जाती है।

### 5. मालिश की पूरी प्रक्रिया कितने समय की होती है?
इस मालिश की पूरी प्रक्रिया लगभग दस मिनट की होती है।

### 6. मालिश के दौरान पैरों में क्या लगाया जाता है?
मरीज के पैरों के तलवों पर सरसों का तेल, तिल का तेल या शुद्ध देसी घी लगाया जाता है।

### 7. मालिश के बाद थाली और तेल का रंग काला क्यों पड़ जाता है?
यह इस बात का प्रमाण है कि शरीर के अंदर जमा अशुद्धियां और विषैले टॉक्सिन्स बाहर निकल चुके हैं।

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