बशीरबाग पैलेस में उस्ताद बड़े गुलाम अली खान के आखिरी दिन और हैदराबाद में उनकी मजार की दास्तान पटियाला घराने के महान शास्त्रीय गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खान ने अपनी जिंदगी का अंतिम दौर हैदराबाद में बिताया, जहां पुरानी हवेली के पास उनकी ऐतिहासिक मजार संगीत प्रेमियों के लिए साधना स्थली बनी हुई है। भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में पटियाला घराने को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने वाले उस्ताद बड़े गुलाम अली खान का दक्षिणी महानगर हैदराबाद के साथ अटूट जुड़ाव रहा। बीसवीं सदी के शीर्ष गायकों में गिने जाने वाले उस्ताद जी ने अपने जीवन के अंतिम पड़ाव के दौरान इसी ऐतिहासिक शहर को अपना बसेरा बनाया था। 23 अप्रैल 1968 को शहर के बशीरबाग पैलेस में उनका निधन हुआ, जिसके बाद पुरानी हवेली क्षेत्र के पास स्थित ऐतिहासिक दाराब जंग के दायरे में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। आज भी सुरों के इस महान साधक को श्रद्धांजलि देने देश-दुनिया से कला प्रेमी इस मजार पर पहुंचते हैं। कसूर से शुरू हुआ सफर और भारत वापसी की कहानी अविभाजित पंजाब के कसूर में 2 अप्रैल 1902 को जन्मे बड़े गुलाम अली खान को संगीत की तालीम पारिवारिक परिवेश से ही हासिल हुई थी। उनके पिता उस्ताद अली बख्श खान और चाचा काले खान ने उन्हें गायन कला के साथ-साथ सारंगी वादन के बारीक गुर सिखाए, जिसमें उन्होंने अद्भुत निपुणता हासिल की। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन हिंदुस्तान के संगीत संसार का खिंचाव उन्हें बहुत दिनों तक दूर नहीं रख सका। भारतीय शास्त्रीय संगीत परंपरा से गहरे लगाव के चलते वे भारत लौट आए। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री मोरारजी देसाई के विशेष प्रयासों के चलते वर्ष 1957 में उन्हें भारत की स्थायी नागरिकता प्रदान की गई थी। तीन सप्तकों की रेंज, अनूठी ठुमरी और मुगल-ए-आजम का किस्सा उस्ताद जी के गायन की सबसे बड़ी विशेषता उनकी आवाज की असाधारण रेंज थी, जो तीनों सप्तकों में बिना किसी रुकावट के सहजता से घूमती थी। उन्होंने पारंपरिक ठुमरी शैली में पंजाब अंग की मिठास और बिजली जैसी तेज द्रुत तानों का खूबसूरत समन्वय कर इसे नई पहचान दी। उनके द्वारा गाई गई ठुमरियां, जैसे 'याद पिया की आए' और 'आए ना बालम का करूं सजनी', आज भी संगीत जगत में मील का पत्थर मानी जाती हैं। आमतौर पर सिनेमाई गायन से दूरी बनाए रखने वाले उस्ताद जी से जब प्रसिद्ध निर्देशक के. आसिफ ने वर्ष 1960 की ऐतिहासिक फिल्म 'मुगल-ए-आजम' के गानों के लिए संपर्क किया, तो उन्होंने प्रस्ताव टालने के मकसद से उस जमाने के हिसाब से बेहद भारी-भरकम फीस मांगी। उन्होंने प्रति गीत 25,000 रुपये की मांग रखी थी, लेकिन आसिफ तुरंत तैयार हो गए। इसके बाद उस्ताद जी ने 'प्रेम जोगन बन के' और 'शुभ दिन आयो राज दुलारा' जैसी दो कालजयी रचनाओं को अपनी आवाज दी। हैदराबाद में अंतिम सांस और बशीरबाग पैलेस का ठहराव उम्र के अंतिम वर्षों में गंभीर पक्षाघात (लकवा) की चपेट में आने के बाद वे स्वास्थ्य लाभ और बेहतर आबोहवा के लिए हैदराबाद पहुंचे थे। संगीत प्रेमियों और राज्य सरकार ने उनके सम्मान में रहने की मुकम्मल व्यवस्था बशीरबाग पैलेस में की थी। गंभीर बीमारी से जूझने के बाद भी उन्होंने संगीत साधना नहीं छोड़ी। वे पैलेस में नियमित रियाज करते रहे और अपने शागिर्दों को तालीम देते रहे। आखिरकार 23 अप्रैल 1968 को 66 वर्ष की आयु में उन्होंने बशीरबाग पैलेस में आखिरी सांस ली। उनकी मजार आज भी हैदराबाद की सांस्कृतिक धरोहर का अहम हिस्सा है, जहां शास्त्रीय संगीत के साधक और मुरीद सजदा करने पहुंचते हैं। इसका आप पर असर यह ऐतिहासिक विवरण शास्त्रीय संगीत के प्रेमियों और सांस्कृतिक धरोहर में रुचि रखने वाले पाठकों को भारत की साझी विरासत की गहरी समझ प्रदान करता है। • भारत में: यह जीवन प्रसंग देश की समृद्ध गंगा-जमुनी तहज़ीब और विभाजन के बाद कलाकारों के अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहरे जुड़ाव को उजागर करता है। संगीत विद्यार्थियों को सीखने को मिलता है कि कैसे कठिन स्वास्थ्य चुनौतियों के बावजूद रियाज की निरंतरता से उत्कृष्ट कला रची जा सकती है। • हैदराबाद में: स्थानीय नागरिकों और पर्यटकों के लिए पुरानी हवेली के पास दाराब जंग का दायरा एक प्रमुख सांस्कृतिक स्मारक के रूप में रेखांकित होता है। शहर की इस विरासत को देखने और महान उस्ताद को नमन करने के लिए लोग इस ऐतिहासिक स्थल की यात्रा कर सकते हैं। • संगीत जगत में: यह वृत्तांत शास्त्रीय गायकी में पंजाब अंग की ठुमरी और तीनों सप्तकों में साधना की महत्ता को पुनः स्थापित करता है। नई पीढ़ी के गायक उस्ताद जी के अनुशासन और उनकी अमर रचनाओं से तकनीकी मार्गदर्शन ले सकते हैं। • सिनेमा प्रेमियों के लिए: यह प्रसंग रेखांकित करता है कि कैसे सिद्धांतों पर अडिग रहकर भी कलात्मक समझौता किए बिना ऐतिहासिक कृतियों की रचना संभव है। फिल्म संगीत में शास्त्रीय शुद्धता को स्थापित करने का यह उदाहरण रचनाकारों को प्रेरित करता रहेगा। ऐसा क्यों हुआ उस्ताद बड़े गुलाम अली खान का हैदराबाद में बसना और वहीं अंतिम सांस लेना उनके जीवन के अंतिम चरण में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों और शहर के गहरे सांस्कृतिक सम्मान का सीधा परिणाम था। • स्वास्थ्य कारण और जलवायु: जीवन के उत्तरार्ध में लकवे से पीड़ित होने के बाद वे स्वास्थ्य लाभ और शांत वातावरण की तलाश में हैदराबाद आए थे। शहर की अनुकूल जलवायु और बेहतर देखभाल की संभावनाओं ने उन्हें यहां रुकने के लिए प्रेरित किया। • राज्य सरकार और प्रशंसकों का आतिथ्य: हैदराबाद के संगीत प्रेमियों और तत्कालीन राज्य प्रशासन ने उनके रहने के लिए भव्य बशीरबाग पैलेस उपलब्ध कराया। इस खुले और सम्मानजनक संरक्षण के कारण उन्होंने जीवन के अंतिम दिन इसी शहर में बिताने का फैसला किया। • विभाजन के बाद भारत वापसी: विभाजन के समय पाकिस्तान जाने के बावजूद उनका मन भारतीय संगीत परिदृश्य में ही बसा रहा। इसके चलते 1957 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री मोरारजी देसाई की पहल पर वे औपचारिक रूप से स्थायी भारतीय नागरिक बनकर वापस लौटे। सवाल-जवाब 1. उस्ताद बड़े गुलाम अली खान किस संगीत घराने से ताल्लुक रखते थे? वे पटियाला घराने के दिग्गज शास्त्रीय गायक थे और उन्होंने इस घराने की गायकी को दुनिया भर में ख्याति दिलाई। 2. उस्ताद जी का जन्म कब और कहां हुआ था? उनका जन्म 2 अप्रैल 1902 को अविभाजित पंजाब के कसूर में हुआ था। 3. उस्ताद बड़े गुलाम अली खान को भारत की स्थायी नागरिकता कब और कैसे मिली? उन्हें 1957 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री मोरारजी देसाई के विशेष प्रयासों से भारत की स्थायी नागरिकता मिली थी। 4. उस्ताद जी ने अपने जीवन के अंतिम दिन किस जगह बिताए? लकवे से पीड़ित होने के बाद वे हैदराबाद आए थे और उन्होंने अपने आखिरी दिन शहर के ऐतिहासिक बशीरबाग पैलेस में बिताए। 5. हैदराबाद में उस्ताद बड़े गुलाम अली खान की मजार कहां स्थित है? उनकी मजार पुरानी हवेली क्षेत्र के पास स्थित ऐतिहासिक दाराब जंग के दायरे में बनाई गई है। 6. फिल्म मुगल-ए-आजम में गाने के लिए उन्होंने कितनी फीस मांगी थी? निर्देशक के. आसिफ के प्रस्ताव को टालने के लिए उन्होंने उस दौर में 25,000 रुपये प्रति गीत की मांग रखी थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया था। https://trendkia.com/rajasthan/bashir-bagh-palace-men-ustada-bade-ghulam-ali-khan-ke-akhiri-dina-aura-hyderabad-men-unaki-majara-ki-dastana-52670 TrendKia — Har trend, sabse pehle.