भगवान श्रीकृष्ण की लीला और कालयवन वध की अमर कथा, जिससे जुड़ा है धौलपुर के मचकुंड का देव छठ मेला राजस्थान के धौलपुर में स्थित पवित्र मचकुंड सरोवर पर देव छठ के अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ा, जहां लोगों ने आस्था की डुबकी लगाई और ऐतिहासिक मेले का आनंद लिया। भारतीय उपमहाद्वीप में पर्वों, उत्सवों और सांस्कृतिक मेलों का इतिहास अत्यंत गौरवशाली तथा पुराना रहा है। ये पारंपरिक आयोजन केवल मनोरंजन का जरिया नहीं होते, बल्कि हमारी अटूट आस्था, प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और लोक जीवन की विरासत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ले जाने का सशक्त माध्यम भी बनते हैं। इसी पावन श्रृंखला में राजस्थान के धौलपुर जिले में आयोजित होने वाला प्रसिद्ध देव छठ मेला अपना एक विशिष्ट और ऐतिहासिक महत्व रखता है। धौलपुर शहर के निकट स्थित पवित्र तीर्थराज मचकुंड के तट पर लगने वाला यह मेला हजारों वर्ष पुरानी पौराणिक मान्यताओं को आज भी जीवंत बनाए हुए है। देव छठ के पावन अवसर पर मचकुंड सरोवर के विभिन्न घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, जिससे पूरा क्षेत्र भक्ति, श्रद्धा और उत्सव के अनूठे रंगों में सराबोर नजर आता है। विभिन्न राज्यों के श्रद्धालुओं का पावन संगम इतिहासकार अरविंद शर्मा का मानना है कि धौलपुर में आयोजित होने वाले इस देव छठ मेले का आकर्षण केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। इस भव्य धार्मिक समागम में भाग लेने के लिए राजस्थान के विभिन्न जिलों से आने वाले लोगों के अलावा पड़ोसी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और देश की राजधानी दिल्ली से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मचकुंड धाम की पवित्रता से आकर्षित होकर आने वाले ये सभी भक्त महाराज मचकुंड के दर्शन करते हैं और सरोवर के किनारे पूजा-अर्चना कर अपने परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि और दीर्घायु होने की कामना करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण और कालयवन वध की पौराणिक गाथा देव छठ मेले की पृष्ठभूमि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण और महाराज मचकुंड से जुड़ी एक अत्यंत रोचक और प्राचीन कथा पर आधारित है। धार्मिक ग्रंथों और लोक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी कंस का वध कर दिया था, तब कंस के ससुर मगध नरेश जरासंध ने प्रतिशोध की भावना से मथुरा पर कई बार भीषण हमले किए। इन हमलों में जरासंध को कालयवन नामक एक अत्यंत शक्तिशाली, क्रूर और अजेय राक्षस का साथ मिला। इस संकट से निपटने और कालयवन को परास्त करने के लिए श्रीकृष्ण ने एक अनोखी रणनीति बनाई। वे रणभूमि से पीछे हटने लगे, जिसके कारण उन्हें रणछोड़ भी कहा गया। कालयवन लगातार उनके पीछे भागता रहा और श्रीकृष्ण उसे अपने पीछे-पीछे धौलपुर के इसी मचकुंड क्षेत्र की एक गुफा तक ले आए। उस समय उस शांत गुफा के भीतर महाराज मचकुंड गहरी निद्रा में विश्राम कर रहे थे। गुफा में प्रवेश करते ही श्रीकृष्ण ने अपनी पीतांबरी यानी पीले रंग का वस्त्र सोते हुए महाराज मचकुंड के शरीर पर डाल दिया और स्वयं वहां एक सुरक्षित स्थान पर छिप गए। पीछे-पीछे गुफा में पहुंचे कालयवन ने पीतांबरी देखकर समझा कि श्रीकृष्ण ही वहां सो रहे हैं। उसने अत्यंत क्रोध में आकर उस पीतांबरी को जोर से खींच लिया, जिससे महाराज मचकुंड की नींद अचानक टूट गई। जैसे ही महाराज मचकुंड ने अपनी आंखें खोलीं, उनकी दृष्टि से प्रकट हुई अत्यंत भयंकर क्रोधाग्नि ने राक्षस कालयवन को घेर लिया और वह दुष्ट वहीं जलकर राख हो गया। 68 प्रमुख तीर्थों के जल से संपन्न हुआ महायज्ञ कालयवन के अंत के बाद की स्थानीय कथाओं के अनुसार, महाराज मचकुंड ने इस ऐतिहासिक घटना की शुद्धि और देवों के आभार के लिए इसी पावन स्थल पर एक विशाल महायज्ञ का आयोजन किया था। ऐसा माना जाता है कि इस भव्य यज्ञ में स्वयं द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण भी उपस्थित रहे थे। इस यज्ञ की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसे पूर्ण करने के लिए संपूर्ण भारतवर्ष के 68 प्रमुख तीर्थ स्थलों से पवित्र जल मंगाया गया था और उसे यहां एकत्र किया गया था। इसी अति प्राचीन काल से मचकुंड सरोवर के तट पर देव छठ मेले के आयोजन की परंपरा अनवरत चली आ रही है। आज के समय में भी देश के कोने-कोने से आने वाले साधु-संत और आम नागरिक मचकुंड के इस पावन जल में अपनी आस्था की डुबकी लगाते हैं। स्नान के पश्चात विधिवत रूप से महाआरती का आयोजन होता है और लोग अपने जीवन की मंगल कामना करते हैं। शाही संरक्षण से सामाजिक समरसता का आधुनिक सफर इतिहासकार अरविंद शर्मा के विवरण के अनुसार, धौलपुर रियासत के समय से ही इस मेले को राजशाही का पूर्ण संरक्षण और सहयोग मिलता रहा है। प्राचीन काल में धौलपुर के तत्कालीन शासक इस धार्मिक आयोजन को अत्यंत गरिमापूर्ण और भव्य तरीके से मनाने में अपना विशेष योगदान देते थे। उस दौर में यह मेला केवल पूजा-पाठ का केंद्र ही नहीं था, बल्कि ग्रामीण इलाकों के लोगों की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति और व्यापार के लिए एक बहुत बड़े बाजार की भूमिका भी निभाता था। आधुनिक युग में भी इस मेले का स्वरूप अत्यंत व्यापक हो चुका है। वर्तमान में समाज के हर वर्ग, जाति और अलग-अलग संप्रदायों के लोग पूरे उत्साह के साथ इसमें भाग लेते हैं। यही कारण है कि धौलपुर का यह देव छठ मेला आपसी सौहार्द, सामाजिक समरसता और मजबूत भाईचारे का एक जीवंत उदाहरण पेश करता है। नवविवाहित दंपतियों के लिए अनूठी परंपरा इस प्रसिद्ध मेले की एक और बेहद अनूठी और विशिष्ट परंपरा है जो नवविवाहित जोड़ों द्वारा निभाई जाती है। जिन परिवारों में हाल ही में विवाह संपन्न हुए होते हैं, वे इस अवसर पर मचकुंड धाम की यात्रा अवश्य करते हैं। विशेष रूप से पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों से बड़ी संख्या में नए शादीशुदा जोड़े अपने माता-पिता और सगे-संबंधियों के साथ यहां पहुंचते हैं। यहां आकर परिवार के सदस्य आटे और हल्दी का उपयोग करके पूरे पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। इसके बाद नवविवाहित दूल्हा-दुल्हन की शादी के समय सिर पर सजाई जाने वाली कलंगी, सेहरा, मोहरी और अन्य विवाह संबंधी सामग्रियों को श्रद्धापूर्वक मचकुंड सरोवर के जल में विसर्जित किया जाता है। इस अनुष्ठान के दौरान उपस्थित महिलाएं मांगलिक और पारंपरिक गीत गाती हैं, जिसमें वे नए जोड़े के सफल, सुखी और दीर्घायु दांपत्य जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं। इस प्रकार यह मेला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था और सामाजिक मूल्यों का अद्भुत संगम है। इसका आप पर असर यह ऐतिहासिक आयोजन सांस्कृतिक और स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। • धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा: उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों से आने वाले हजारों श्रद्धालुओं के कारण धौलपुर में धार्मिक पर्यटन का विकास होता है। इससे स्थानीय परिवहन और होटल व्यवसायों को लाभ मिलता है। • स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल: मेले के दौरान लगने वाले बाजारों से हस्तशिल्पकारों, छोटे दुकानदारों और खाद्य विक्रेताओं की आजीविका सुदृढ़ होती है। इससे ग्रामीण व्यापार को एक बड़ा मंच मिलता है। • सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण: युवाओं और नवविवाहित जोड़ों द्वारा प्राचीन रस्मों को निभाने से हमारी लोक परंपराएं आधुनिक पीढ़ी में भी जीवित रहती हैं। ऐसा क्यों हुआ मचकुंड सरोवर की पवित्रता और देव छठ मेले की शुरुआत के पीछे महत्वपूर्ण पौराणिक और ऐतिहासिक कारण रहे हैं। • असुरों का बढ़ता हुआ अत्याचार: कंस की मृत्यु के बाद जरासंध और कालयवन के निरंतर हमलों ने श्रीकृष्ण को एक कूटनीतिक रणनीति अपनाने पर विवश किया, जिससे वे कालयवन को धौलपुर की गुफा तक ले आए। • महाराज मचकुंड का वरदान: देवासुर संग्राम में देवताओं की मदद करने के बाद महाराज मचकुंड ने गहरी नींद का वरदान पाया था, जिसके तहत उन्हें जगाने वाले व्यक्ति को उनकी क्रोधाग्नि से भस्म होना निश्चित था। • पवित्र तीर्थों के जल का एकत्रीकरण: कालयवन के वध के बाद हुए महायज्ञ की शुद्धि के लिए देश के सभी 68 प्रमुख पवित्र जलाशयों का जल धौलपुर लाया गया, जिससे इस सरोवर का धार्मिक महत्व स्थापित हुआ। सवाल-जवाब 1. धौलपुर के मचकुंड सरोवर का संबंध किस पौराणिक घटना से है? इस सरोवर का संबंध द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रची गई रणनीति और महाराज मचकुंड की दृष्टि से राक्षस कालयवन के भस्म होने की कथा से है। 2. देव छठ मेले में मुख्य रूप से किस राज्य के नवविवाहित जोड़े आते हैं? इस मेले में मुख्य रूप से पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों से बड़ी संख्या में नवविवाहित जोड़े अपनी शादी की सामग्रियां विसर्जित करने आते हैं। 3. मचकुंड सरोवर में किस पावन जल का मिश्रण माना जाता है? पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कालयवन वध के बाद हुए महायज्ञ के लिए भारत के 68 प्रमुख तीर्थ स्थानों का पवित्र जल यहां लाया गया था। 4. धौलपुर के देव छठ मेले को ऐतिहासिक रूप से किसका संरक्षण प्राप्त था? धौलपुर रियासत के शासनकाल के दौरान वहां के तत्कालीन राजा-महाराजा इस मेले को भव्य रूप से आयोजित करने के लिए शाही संरक्षण प्रदान करते थे। https://trendkia.com/rajasthan/bhagavana-krishna-ki-lila-aura-kalyavan-vadha-ki-amara-katha-jisase-jura-hai-dholpur-ke-machkund-ka-dev-chhath-mela-32935 TrendKia — Har trend, sabse pehle.