# भरतपुर के बाजारों में पशुधन के श्रृंगार की धूम, कांच वाली घंटियों और रंग-बिरंगी मालाओं की भारी मांग

> दीपावली की तैयारियों के बीच भरतपुर के बाजारों में मवेशियों के आभूषणों की दुकानें सज गई हैं, जहां ग्रामीण पशुपालक अपने गाय, भैंस और बैलों को सजाने के लिए कांच वाली घंटियां और घुंघरू वाली मालाएं जमकर खरीद रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-11-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/bharatpur-ke-bajaron-men-pashudhana-ke-shrringara-ki-dhuma-kancha-vali-ghntiyon-aura-rnga-birngi-malaon-ki-bhari-manga-55132 · **Language:** Hindi
**Tags:** भरतपुर, दीपावली, पशु श्रृंगार, पशुधन, ग्रामीण परंपरा, बाजार

दीपावली का पावन पर्व जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे बाजारों में रौनक और खरीदारी का उत्साह तेजी से परवान चढ़ रहा है। इस रोशनी के महापर्व पर जहां लोग अपने घरों, दुकानों और प्रतिष्ठानों को सजाने के लिए खरीदारी कर रहे हैं, वहीं राजस्थान के भरतपुर में पशुओं के श्रृंगार के सामान की दुकानें भी विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। ग्रामीण अंचलों में सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार दीपावली के मौके पर पशुधन की पूजा और उन्हें सजाने का विशेष विधान है। इसी सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत बनाए रखने के लिए पशुपालक बड़ी संख्या में बाजार पहुंचकर अपने पालतू मवेशियों के लिए तरह-तरह के आभूषण और सजावटी सामान पसंद कर रहे हैं।

## बाजारों में खास आकर्षण बनीं कांच वाली घंटियां और घुंघरू
भरतपुर के बाजारों में इस समय मवेशियों को सजाने के लिए कई तरह के पारंपरिक और आधुनिक आभूषण उपलब्ध कराए गए हैं। दुकानों पर इस साल विशेष रूप से कांच वाली घंटियों और घुंघरू लगी रंग-बिरंगी मालाओं की सबसे ज्यादा मांग देखी जा रही है। कांच वाली घंटियों की खूबी उनकी आकर्षक बनावट और उनसे निकलने वाली मधुर झंकार है, जो दूर से ही पशुपालकों को अपनी ओर खींच रही है। इसके साथ ही विभिन्न आकारों और खूबसूरत डिजाइनों में तैयार की गई मालाएं भी खूब पसंद की जा रही हैं, जिन्हें गायों, बैलों और भैंसों के गले में बांधा जाता है।

## ग्रामीण परंपरा और पशुधन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक
दुकानों पर केवल घंटियां ही नहीं, बल्कि फूलों की बनावट जैसी दिखने वाली सजावटी मालाएं, छोटी-छोटी घंटियां और पारंपरिक साज-सज्जा की पूरी सामग्री उपलब्ध है। ग्रामीण इलाकों से खरीदारी करने आ रहे किसान और पशुपालक अपने मवेशियों के लिए एक से अधिक सजावटी वस्तुएं खरीद रहे हैं। कई खरीदार गले के हार के साथ-साथ सींगों और माथे पर सजाने वाले रंगीन आभूषण भी चुन रहे हैं। दुकानदारों का कहना है कि जैसे-जैसे त्योहार की मुख्य तिथि करीब आएगी, इस पारंपरिक सजावटी सामान की बिक्री में और अधिक उछाल आने की पूरी उम्मीद है।

## संस्कृति की सजीव झलक पेश करते बाजार
भारतीय लोकजीवन में दीपावली का उत्सव केवल इंसानी बस्तियों या ईंट-पत्थर के मकानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह प्रकृति और मवेशियों के साथ परस्पर रिश्ते का उत्सव भी है। ग्रामीण परिवेश में पशुधन को परिवार के अभिन्न सदस्य के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि त्योहार से ठीक पहले ग्रामीण संस्कृति की यह समृद्ध परंपरा बाजारों में साफ तौर पर छाई हुई है। रंग-बिरंगे मोतियों, घुंघरुओं और मधुर घंटियों से सजी ये दुकानें भरतपुर में दीपावली के त्योहारी उल्लास के साथ-साथ लोक परंपरा का एक बेहद खूबसूरत और जीवंत रूप पेश कर रही हैं।

## इसका आप पर असर
दीपावली पर पशुधन के श्रृंगार की यह परंपरा ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारंपरिक कारीगरों के लिए सीधा लाभ लेकर आती है।

- **स्थानीय कारीगरों और व्यापारियों के लिए:** त्योहार के समय मवेशियों के सजावटी सामान की बिक्री बढ़ने से छोटे दुकानदारों और हस्तशिल्पियों की मौसमी आय में अच्छा इजाफा होता है। मांग में तेजी आने से ग्रामीण हस्तशिल्प और पारंपरिक कामगारों को प्रत्यक्ष बाजार मिलता है।
- **भरतपुर और आसपास के पशुपालकों के लिए:** पशुपालक अपने मवेशियों के लिए किफायती और आकर्षक आभूषण आसानी से स्थानीय बाजार से खरीद पा रहे हैं। इससे त्योहार पर मवेशियों को सजाने और लोक परंपराओं को निभाने का उत्साह और सुगम हो जाता है।
- **त्योहारी बाजार के माहौल पर:** सामान्य सजावट के अलावा पशुधन के सामान की मांग से स्थानीय बाजारों में विविधता और रौनक दोनों बढ़ती है। इससे ग्रामीण और शहरी खरीदारों का संगम बाजार में एक नई जीवंतता पैदा करता है।
- **पारंपरिक संस्कृति के संरक्षण में:** मवेशियों को सजाने की यह प्रथा नई पीढ़ी को ग्रामीण परिवेश और पशु-प्रेम से जोड़े रखने में मदद करती है। इस तरह के आयोजनों से सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को लगातार मजबूती मिलती है।

## ऐसा क्यों हुआ
दीपावली पर पशुओं के श्रृंगार के सामान की मांग बढ़ने का मुख्य कारण ग्रामीण क्षेत्रों में मवेशियों के प्रति गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था है।

- **दीपावली और गोवर्धन पूजा की परंपरा:** भारतीय कृषि संस्कृति में पशुधन को समृद्धि का रूप माना जाता है, इसलिए दीपावली के आसपास उन्हें स्नान कराकर विशेष रूप से सजाने का नियम है। गोवर्धन और दीपोत्सव के दौरान गाय-बैलों के पूजन की इसी परंपरा के कारण किसान बाजार से इनके आभूषण खरीदते हैं।
- **कांच वाली घंटियों का नया आकर्षण:** इस वर्ष बाजार में कांच की घंटियों और घुंघरुओं का नया स्टॉक आया है, जिनकी मीठी आवाज और सुंदर बनावट खरीदारों को खास तौर पर पसंद आ रही है। पारंपरिक मालाओं के साथ इस नए डिजाइन ने पशुपालकों की खरीदारी में अतिरिक्त उत्साह भरा है।
- **ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती:** फसल चक्र और त्योहारी मौसम में ग्रामीण इलाकों में नकदी प्रवाह बेहतर होता है, जिससे लोग अपने मवेशियों की साज-सज्जा पर भी खर्च करते हैं। इसके चलते त्योहार के मुख्य दिनों से पहले ही दुकानों पर खरीदारों की आवाजाही बढ़ गई है।

## सवाल-जवाब

### 1. भरतपुर के बाजारों में किन पशुओं के लिए श्रृंगार सामग्री बिक रही है?
बाजारों में मुख्य रूप से गाय, भैंस और बैल जैसे पालतू पशुओं के लिए सजावटी सामान और आभूषण बिक रहे हैं।

### 2. इस साल मवेशियों के आभूषणों में कौन सा सामान सबसे ज्यादा लोकप्रिय है?
इस बार कांच वाली घंटियां और घुंघरू लगी रंग-बिरंगी मालाएं ग्राहकों के बीच सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।

### 3. कांच वाली घंटियों की मुख्य खासियत क्या है?
इन घंटियों की प्रमुख विशेषता उनकी सुंदर बनावट और उनसे निकलने वाली मधुर आवाज है।

### 4. दीपावली पर पशुओं को सजाने की परंपरा का क्या महत्व है?
ग्रामीण संस्कृति में पशुधन को परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा और समृद्धि का प्रतीक मानकर दीपावली के अवसर पर विशेष रूप से सजाया और पूजा जाता है।

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