# भरतपुर के गांवों में दुधारू मवेशियों के चारे में बदलाव, बाजरे की कड़बी से दूध बढ़ाने की तैयारी

> राजस्थान के भरतपुर जिले में बाजरे की कटाई के बाद किसान मवेशियों की खुराक में गेहूं के भूसे की जगह बाजरे की कड़बी की कुट्टी शामिल कर रहे हैं, जिससे पशुओं को संतुलित पोषण मिलने के साथ दूध उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलती है।

**Type:** article · **Category:** राजस्थान · **Published:** 2026-10-18 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/rajasthan/bharatpur-ke-ganvon-men-dudharu-maveshiyon-ke-chare-men-badalava-bajare-ki-karabi-se-dudha-barhane-ki-taiyari-49056 · **Language:** Hindi
**Tags:** भरतपुर, पशुपालन, बाजरे की कड़बी, दूध उत्पादन, राजस्थान खेती, पशु आहार

राजस्थान के भरतपुर जिले के ग्रामीण अंचलों में कृषि के साथ पशुपालन आजीविका का मजबूत आधार बना हुआ है। यहाँ के किसान फसलों की कटाई और बदलते मौसम के चक्र को ध्यान में रखते हुए अपने मवेशियों के खान-पान में रणनीतिक बदलाव करते हैं। इस वार्षिक चक्र में सबसे अहम फेरबदल खरीफ की फसल कटने के बाद देखने को मिलता है, जब पशुओं के नियमित आहार में गेहूं के भूसे के स्थान पर बाजरे की कड़बी की कुट्टी को प्रमुखता से शामिल किया जाता है। स्थानीय किसानों का मानना है कि यह देसी आहार दुधारू पशुओं की सेहत को दुरुस्त रखता है और दूध की पैदावार में भी स्थिरता लाता है।

## फसल अवशेषों का सदुपयोग और कुट्टी तैयार करने की विधि
भरतपुर क्षेत्र में खरीफ सीजन के दौरान बड़े पैमाने पर बाजरे की बुवाई की जाती है। जब दाने पूरी तरह पक जाते हैं और उनकी कटाई तथा गहाई पूरी हो जाती है, तब बचे हुए सूखे डंठलों को सुरक्षित सहेज लिया जाता है। इन्हीं सूखे डंठलों को ग्रामीण बोलचाल में कड़बी कहा जाता है। इसके बाद विशेष मशीनों की मदद से इस कड़बी के बारीक टुकड़े करके कुट्टी तैयार की जाती है। पशुपालक इस सूखी कुट्टी में दलिया मिलाकर मवेशियों को परोसते हैं, जिससे पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं। इस व्यवस्था से खेतों से निकलने वाले डंठलों का सही निपटारा हो जाता है और किसानों को अतिरिक्त चारा खरीदने की चिंता से भी राहत मिलती है।

## साल में केवल एक बार बदलती है मवेशियों की दैनिक खुराक
पशुओं के खान-पान में यह बदलाव पूरे वर्ष में केवल एक बार, यानी बाजरे की फसल कटने के तुरंत बाद किया जाता है। वर्ष के सामान्य महीनों में किसान अपने मवेशियों को गेहूं का सूखा भूसा, खेतों से काटा गया हरा चारा और अन्य सामान्य पोषण देते हैं। जैसे ही बाजरे की नई कड़बी का भंडारण हो जाता है, इसे मुख्य चारे के रूप में उपयोग में लाया जाने लगता है। इस व्यवस्था से पशुपालकों के मासिक बजट पर दबाव कम होता है और घर की खेती से ही चारे का पर्याप्त प्रबंध हो जाता है।

## संतुलित देखभाल और पोषक तत्वों से सुधरती है दुग्ध क्षमता
पशुपालन से जुड़े जानकारों और स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि सिर्फ सूखे चारे का प्रकार बदलना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि समग्र पोषण पर ध्यान देना जरूरी है। कड़बी की कुट्टी के साथ मवेशियों को भरपूर साफ पानी, समय पर हरा चारा और आवश्यक पौष्टिक आहार देना अनिवार्य होता है ताकि पशुओं के शरीर में सभी पोषक तत्वों की भरपाई हो सके। भरतपुर के ग्रामीण परिवारों के लिए यह पारंपरिक खान-पान प्रबंधन न केवल पशुओं को तंदुरुस्त रखता है, बल्कि उनकी घरेलू अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती प्रदान करता है।

## इसका आप पर असर
फसल अवशेषों को पौष्टिक चारे में बदलने की इस व्यवस्था से ग्रामीण पशुपालकों की लागत घटती है और दुधारू पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर रहता है।

- **राजस्थान में:** ग्रामीण पशुपालक अपने ही खेतों से निकली बाजरे की कड़बी का उपयोग करके महंगे चारे की खरीद से बच सकते हैं। इससे हर महीने चारे पर होने वाले अतिरिक्त खर्च में बड़ी बचत होती है और दूध की मात्रा बेहतर बनी रहती है।
- **भारत में:** खरीफ फसलों के डंठलों को सुरक्षित रखकर किसान अन्य राज्यों में भी सूखा चारा संकट को आसानी से हल कर सकते हैं। यह तरीका फसल अवशेष जलाने की समस्या को रोकने और पशुओं को सालभर सस्ता पोषण देने में मददगार है।
- **डेयरी किसानों के लिए:** कड़बी की कुट्टी में दलिया मिलाकर खिलाने से दुधारू पशुओं के पाचन और दुग्ध क्षमता में निरंतरता बनी रहती है। किसान इस मौसमी आहार के साथ पर्याप्त पानी और हरा चारा देकर उत्पादन बढ़ा सकते हैं।
- **पशु स्वास्थ्य पर प्रभाव:** संतुलित पोषण मिलने से मवेशियों में मौसमी कमजोरी नहीं आती और उनका शरीर तंदुरुस्त रहता है। समय रहते चारे का सही भंडारण करने से सालभर पौष्टिक चारे की कमी नहीं होती।

## ऐसा क्यों हुआ
भरतपुर के ग्रामीण इलाकों में मवेशियों के आहार में यह बदलाव खरीफ फसल की कटाई के समय बाजरे की कड़बी की भारी उपलब्धता और चारे की लागत घटाने की आवश्यकता के कारण होता है।

- **फसल कटाई का मौसम:** खरीफ सीजन में बाजरे की व्यापक खेती के चलते कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में सूखे डंठल उपलब्ध हो जाते हैं। किसान इस भरपूर उपज को बेकार फेंकने के बजाय तुरंत चारे के रूप में सहेज लेते हैं।
- **कम लागत में पोषण:** गेहूं का भूसा पूरे साल खरीदना आर्थिक रूप से महंगा पड़ता है, जबकि बाजरे की कड़बी घरेलू खेत से ही मिल जाती है। कुट्टी बनाकर दलिया मिलाने से यह मवेशियों के लिए एक सस्ता और पौष्टिक विकल्प बन जाता है।
- **दुग्ध क्षमता में सुधार की परंपरा:** स्थानीय स्तर पर यह देखा गया है कि बाजरे की कड़बी की कुट्टी खाने से मवेशियों का स्वास्थ्य सुधरता है और दूध उत्पादन बढ़ता है। इसी पारंपरिक अनुभव और व्यावहारिक लाभ के चलते हर साल यह आहार बदलाव दोहराया जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. भरतपुर में मवेशियों के चारे में मुख्य बदलाव क्या किया जाता है?
बाजरे की फसल कटने के बाद किसान गेहूं के भूसे के स्थान पर बाजरे की कड़बी की कुट्टी को मवेशियों के मुख्य आहार में शामिल करते हैं।

### 2. कड़बी से कुट्टी कैसे तैयार की जाती है?
बाजरे की कटाई और दाने अलग करने के बाद सूखे डंठलों को मशीनों से काटकर बारीक कुट्टी बनाई जाती है और फिर इसमें दलिया मिलाया जाता है।

### 3. यह आहार बदलाव साल में कितनी बार होता है?
यह बदलाव वर्ष में केवल एक बार होता है, जो खरीफ सीजन में बाजरे की फसल कटने और उसकी कड़बी की उपलब्धता पर निर्भर करता है।

### 4. दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए कड़बी के साथ और क्या देना जरूरी है?
विशेषज्ञों के अनुसार कड़बी की कुट्टी के साथ-साथ पशुओं को पर्याप्त पानी, हरा चारा और अन्य पौष्टिक आहार देना आवश्यक है।

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