भरतपुर के ठेई और बिरावई बने भिंडी के गढ़, 2000 बीघा में खेती कर लखपति बन रहे किसान राजस्थान के भरतपुर जिले से सटे ठेई और बिरावई गांव व्यावसायिक तौर पर भिंडी की खेती कर सालाना लाखों रुपये कमा रहे हैं। करीब 20 साल पहले शुरू हुआ यह सफर अब आसपास के क्षेत्रों के लिए मिसाल बन चुका है। राजस्थान के भरतपुर जिले में उत्तर प्रदेश की सीमा के पास स्थित दो गांवों की कृषि तस्वीर में पिछले कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव आया है। कभी पूरी तरह परंपरागत फसलों पर निर्भर रहने वाले ठेई और बिरावई गांव आज भिंडी उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। इन इलाकों में जिधर भी नजर जाती है, वहां हरी-भरा फसल चक्र और भिंडी के खेत नजर आते हैं। वर्तमान में इन दोनों गांवों के भीतर लगभग 2000 बीघा से अधिक क्षेत्रफल में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक भिंडी उगाई जा रही है, जिससे क्षेत्र के किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है और वे सालाना लाखों रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं। इस अनूठी खेती की रोचक शुरुआत इन गांवों में भिंडी उगाने के इस दौर की शुरुआत काफी दिलचस्प परिस्थितियों में हुई थी। आज से लगभग 20 साल पहले उत्तर प्रदेश से एक किसान अपने किसी रिश्तेदार से मिलने के सिलसिले में ठेई गांव आया था। उसी व्यक्ति ने यहां सबसे पहले भिंडी के साथ-साथ गेंदे के फूलों की खेती की शुरुआत की थी। जब स्थानीय किसानों ने उसके खेतों में लहलहाती हुई इस शानदार फसल को देखा, तो उनके मन में इस आधुनिक तकनीक और तौर-तरीकों को सीखने की जिज्ञासा पैदा हुई। उस बाहरी किसान से प्रेरणा पाकर गांव के दो लोगों ने शुरुआती प्रयोग के तौर पर अपने खेतों में भिंडी बोई। जब उन्हें अपनी पहली ही फसल से उम्मीद से कहीं अधिक मुनाफा हाथ लगा, तो यह सफलता देखकर धीरे-धीरे पूरा गांव इस तरफ आकर्षित हो गया और आज भिंडी यहां की मुख्य नकदी फसल बन चुकी है। युवाओं की बढ़-चढ़कर भागीदारी और स्वरोजगार इस पूरी कृषि सफलता की सबसे खास बात यह है कि इसमें गांव की युवा पीढ़ी भी पीछे नहीं है और पूरी सक्रियता के साथ हिस्सा ले रही है। खेत की जुताई करने, मिट्टी तैयार करने, फसल की निरंतर देखभाल करने से लेकर समय पर भिंडी की तुड़ाई करने तक, युवा दिन-रात कड़ा परिश्रम कर रहे हैं। इन युवाओं का स्पष्ट रूप से मानना है कि पारंपरिक अनाज या अन्य फसलों की तुलना में भिंडी की खेती में शारीरिक श्रम और देखभाल निश्चित रूप से अधिक करनी पड़ती है, लेकिन यदि मंडियों में सही भाव मिल जाए, तो यह बेहद कम समय में अच्छी आमदनी और बेहतरीन स्वरोजगार का एक सशक्त माध्यम साबित होती है। क्षेत्र में मिली नई पहचान और विस्तार लगभग दो दशक पहले महज दो किसानों द्वारा शुरू किया गया यह छोटा सा प्रयोग आज पूरे इलाके की पहचान बन चुका है। आसपास के तमाम क्षेत्रों में ठेई और बिरावई गांवों को अब आधिकारिक तौर पर 'भिंडी वाले गांव' के रूप में पुकारा जाने लगा है। यहां तैयार होने वाली ताजी और गुणवत्तापूर्ण भिंडी को राजस्थान के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के विभिन्न नजदीकी बड़े बाजारों में बिक्री के लिए भेजा जाता है। इन दोनों गांवों की इस व्यावसायिक सफलता और बंपर मुनाफे की कहानी को देखकर अब दूसरे पड़ोसी गांवों के किसान भी परंपरागत खेती छोड़कर भिंडी उगाने की ओर प्रेरित होने लगे हैं। इसका आप पर असर ठेई और बिरावई गांवों की इस कृषि सफलता का असर आसपास के किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा पड़ रहा है। • राजस्थान में: पारंपरिक फसलों से हटकर नकदी फसलों की ओर बढ़ने से किसानों की आय में सीधा इजाफा हो रहा है। इस सफलता से राज्य के अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों को भी व्यावसायिक खेती अपनाने की प्रेरणा मिल रही है। • भरतपुर में: ठेई और बिरावई गांवों के किसानों को स्थानीय स्तर पर बेहतर रोजगार और बड़ा मुनाफा मिल रहा है। इससे आसपास के बाजारों में सब्जियों की आपूर्ति बढ़ रही है और ग्रामीण युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए रास्ते खुले हैं। ऐसा क्यों हुआ ठेई और बिरावई गांवों में व्यावसायिक खेती के प्रसार के पीछे कुछ विशिष्ट परिस्थितियां और प्रेरणाएं मुख्य वजह रहीं। • बाहरी किसान का प्रभाव: उत्तर प्रदेश से आए एक रिश्तेदार द्वारा पहली बार गेंदे और भिंडी की सफल खेती करने से स्थानीय ग्रामीणों को नए तरीकों का प्रत्यक्ष लाभ देखने को मिला। • आर्थिक प्रेरणा: शुरुआती प्रयोग में पारंपरिक फसलों की तुलना में कई गुना अधिक मुनाफा मिलने के कारण गांव के अन्य किसानों ने भी इस फसल को अपनाने का निर्णय लिया। • युवाओं की मेहनत: खेती में अधिक श्रम और समय देने के लिए युवाओं की सक्रिय भागीदारी ने इस बड़े पैमाने पर उत्पादन को संभव बनाया। सवाल-जवाब 1. ठेई और बिरावई गांव किस जिले में स्थित हैं? ठेई और बिरावई गांव राजस्थान के भरतपुर जिले में उत्तर प्रदेश की सीमा के पास स्थित हैं। 2. इन गांवों में कुल कितने क्षेत्रफल में भिंडी की खेती हो रही है? इन दोनों गांवों में लगभग 2000 बीघा से अधिक जमीन पर बड़े पैमाने पर भिंडी की व्यावसायिक खेती की जा रही है। 3. इन गांवों में भिंडी की खेती की शुरुआत किसने और कब की थी? लगभग 20 साल पहले उत्तर प्रदेश से आए एक किसान ने अपने रिश्तेदार के यहां इसकी शुरुआत की थी। 4. यहां पैदा होने वाली भिंडी कहां बेची जाती है? यहां पैदा होने वाली ताजी भिंडी को राजस्थान और उत्तर प्रदेश के आसपास के बड़े बाजारों में बेचा जाता है। प्रेरणा और सबक ठेई और बिरावई के किसानों की यह यात्रा ग्रामीण उद्यमिता और मेहनत का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है। • नया प्रयोग अपनाएं: लीक से हटकर नई फसलों की खेती करने से पारंपरिक खेती की तुलना में कई गुना अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। • युवाओं की भागीदारी जरूरी: कृषि कार्यों में आधुनिक सोच और युवाओं का परिश्रम बड़े पैमाने पर सफलता हासिल करने की कुंजी साबित होता है। • सफलता से सीखें: दूसरों के सफल प्रयोगों का बारीकी से निरीक्षण कर उन्हें अपनी जमीन पर आजमाने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। https://trendkia.com/rajasthan/bharatpur-ke-thei-aur-birawai-bane-bhindi-ke-garh-2000-bigha-me-kheti-kar-lakhpati-ban-rahe-kisan-48653 TrendKia — Har trend, sabse pehle.