भरतपुर नगर निगम चुनाव में निर्दलीयों का बड़ा धमाका, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले में सिमटी बीजेपी और कांग्रेस राजस्थान निकाय चुनाव 2026 में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर नगर निगम के 65 वार्डों में से 36 पर निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत हासिल की है, जिसके बाद महापौर बनाने की चाबी निर्दलीयों के हाथों में आ गई है। राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के नतीजों ने प्रदेश की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर में स्थानीय मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों को करारा झटका दिया है। भरतपुर नगर निगम के कुल 65 वार्डों में से आधे से अधिक सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने परचम फहराया है। 36 सीटों पर मिली निर्दलीय प्रत्याशियों की इस एकतरफा जीत ने सत्ताधारी बीजेपी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों को चौंका कर रख दिया है। मुख्यमंत्री का गृह क्षेत्र होने के कारण इस चुनाव पर पूरे राज्य की नजरें टिकी हुई थीं, लेकिन जनादेश ने स्थानीय निकाय बोर्ड के गठन का पूरा समीकरण बदलकर रख दिया है। भरतपुर नगर निगम का चुनावी गणित और सीटों का आंकड़ा भरतपुर नगर निगम के 65 वार्डों के चुनावी नतीजों में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हो सका है। यहां भारतीय जनता पार्टी मात्र 20 सीटों पर सिमट कर रह गई है, जबकि कांग्रेस पार्टी को केवल 7 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है। मुख्य दलों के अलावा बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने भी 1-1 सीट पर जीत दर्ज की है। सबसे बड़ा उलटफेर निर्दलीय उम्मीदवारों ने किया है, जिन्होंने 36 वार्डों में जीत हासिल करके पूरे चुनावी गणित पर अपना कब्जा जमा लिया है। भरतपुर नगर निगम में अपना बोर्ड बनाने और महापौर की कुर्सी हासिल करने के लिए कुल 33 पार्षदों के समर्थन की आवश्यकता है। वर्तमान स्थिति में 20 सीटें जीतने वाली बीजेपी को बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए कम से कम 13 और पार्षदों की मदद की जरूरत है, जिससे महापौर पद की चाबी अब पूरी तरह से निर्दलीय पार्षदों के हाथ में आ गई है। स्थानीय निकाय का 10 साल का इतिहास और राजनीतिक पृष्ठभूमि भरतपुर नगर निगम के गठन को अभी केवल 10 वर्ष ही पूरे हुए हैं, लेकिन इसका राजनीतिक इतिहास हमेशा से दिलचस्प रहा है। जब इस नगर निगम का पहली बार गठन हुआ था, तब निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतने वाले शिव सिंह भोंट ने बीजेपी के समर्थन से भरतपुर के पहले महापौर बनने का गौरव हासिल किया था। इसके बाद अगले निकाय चुनावों में परिस्थितियां बदलीं और कांग्रेस पार्टी ने अपना बोर्ड गठित किया, जिसके तहत अभिजीत सिंह शहर के दूसरे महापौर बने। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में राज्य की सत्ता में बड़ा बदलाव हुआ और राज्य में बीजेपी की सरकार बनी। इसके साथ ही भरतपुर से ताल्लुक रखने वाले भजनलाल शर्मा को राज्य के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके अतिरिक्त भरतपुर जिले के ही जवाहर सिंह बेढम को राज्य सरकार में गृह राज्यमंत्री बनाया गया। इन बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक पदों के चलते बीजेपी को भरतपुर में प्रचंड जीत की पूरी उम्मीद थी, लेकिन मतदाताओं के फैसले ने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया। महापौर चुनाव के लिए बीजेपी का 'प्लान-बी' और आगे का रास्ता नगर निगम चुनाव में स्पष्ट बहुमत से दूर रहने के बाद बीजेपी ने अपना बोर्ड बनाने के लिए 'प्लान-बी' पर तेजी से काम करना शुरू कर दिया है। मतगणना से पहले ही दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों को इस बात का अंदेशा था कि निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसी रणनीति के तहत बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने ही विजयी हो सकने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों पर अपनी नजरें बना रखी थीं। चूंकि 20 सीटों के साथ बीजेपी सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरी है, इसलिए उसने निर्दलीय पार्षदों को साधकर अपना महापौर बैठाने के लिए प्रयास तेज कर दिए हैं। हालांकि, 36 निर्दलीय पार्षदों के एकजुट रहने या किसी एक खेमे में जाने से ही आगे के समीकरण तय होंगे। राजस्थान के अन्य बड़े शहरों में भी बदला सियासी समीकरण भरतपुर के अलावा राजस्थान के कई अन्य बड़े शहरी निकायों में भी बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मजबूत राजनीतिक गढ़ माने जाने वाले झालावाड़ में भी बीजेपी का किला ध्वस्त हो गया, जहां कांग्रेस पार्टी ने जबर्दस्त जीत दर्ज की है। वहीं, बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के प्रभाव वाले पाली नगर निगम में भी पार्टी अपनी साख नहीं बचा पाई और वहां कांग्रेस ने शानदार सफलता हासिल की। इसके अलावा बीकानेर जैसे बड़े निकायों में भी सत्ताधारी दल को करारी शिकस्त मिली है। कई नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पालिकाओं में निर्दलीय उम्मीदवारों का बोलबाला हो जाने के कारण अब राज्य के अधिकांश निकायों में महापौर, सभापति और अध्यक्ष बनाने की चाबी निर्दलीयों के हाथों में केंद्रित हो गई है। इसका आप पर असर राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के नतीजों से शहरी विकास, स्थानीय योजनाओं और नागरिक सुविधाओं पर सीधा असर देखने को मिलेगा। • राजस्थान में: राज्य के कई प्रमुख शहरों में निर्दलीय पार्षदों की मदद से नगर निगम बोर्ड बनेंगे। इसके कारण विकास कार्यों के फैसलों में स्थानीय निर्दलीय पार्षदों का प्रभाव और मोलभाव काफी बढ़ जाएगा। • भरतपुर में: भरतपुर नगर निगम में नया महापौर चुनने के लिए निर्दलीय पार्षदों का समर्थन अनिवार्य होगा। इससे शहर की सफाई, सड़क और स्ट्रीट लाइट जैसी बुनियादी नागरिक परियोजनाओं की प्राथमिकताओं पर गहरा असर पड़ेगा। • स्थानीय नागरिकों के लिए: वार्ड स्तर पर विकास कार्यों की मंजूरी के लिए अब किसी एक दल की तानाशाही नहीं चलेगी। पार्षदों को अपने क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए निर्दलीय समूहों के साथ मिलकर आम सहमति बनानी होगी। • राजनीतिक जवाबदेही पर: प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रति असंतोष के बाद अब निर्दलीय प्रत्याशियों पर बेहतर प्रदर्शन का दबाव रहेगा। स्थानीय स्तर पर काम न होने की स्थिति में नागरिक सीधे अपने वार्ड पार्षद से जवाब मांग सकेंगे। ऐसा क्यों हुआ भरतपुर नगर निगम और अन्य निकायों में राष्ट्रीय दलों की हार तथा निर्दलीय उम्मीदवारों की भारी जीत के पीछे कई स्थानीय और प्रशासनिक कारण रहे हैं। • स्थानीय स्तर पर असंतोष: मतदाताओं ने पार्टी चिह्नों के बजाय स्थानीय मुद्दों और सुलभ उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी। प्रमुख दलों द्वारा टिकट बंटवारे में की गई अनदेखी से नाराज बागी कार्यकर्ताओं ने निर्दलीय लड़कर जीत हासिल की। • एंटी-इंकंबेंसी और जनादेश का बिखराव: शहर की मूलभूत समस्याओं जैसे सफाई, जलभराव और सड़कों की स्थिति को लेकर नागरिकों में असंतोष था। इस वजह से मतदाताओं ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों के पारंपरिक वोट बैंक से अलग हटकर मतदान किया। • निर्दलीयों का मजबूत जनाधार: क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की व्यक्तिगत साख पार्टी लाइन पर भारी पड़ी, जिससे वे बड़ी संख्या में जीतकर उभरे। सवाल-जवाब 1. भरतपुर नगर निगम चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों ने कितनी सीटें जीती हैं? भरतपुर नगर निगम के कुल 65 वार्डों में से 36 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। 2. भरतपुर में महापौर बनाने के लिए किस दल को कितने पार्षदों का समर्थन चाहिए? नगर निगम में बहुमत के लिए 33 पार्षदों की जरूरत है, जबकि बीजेपी के पास केवल 20 सीटें हैं और उसे 13 और पार्षदों का समर्थन चाहिए। 3. भरतपुर नगर निगम का पहला महापौर कौन था? भरतपुर नगर निगम के पहले महापौर निर्दलीय प्रत्याशी शिव सिंह भोंट थे, जिन्होंने बीजेपी के समर्थन से बोर्ड बनाया था। 4. झालावाड़ और पाली नगर निगम चुनाव में क्या नतीजे रहे? झालावाड़ और पाली दोनों ही नगर निगम क्षेत्रों में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस ने बड़ी जीत हासिल की। https://trendkia.com/rajasthan/bharatpur-nagara-nigama-chunava-men-nirdaliyon-ka-bara-dhamaka-mukhyamntri-bhajan-lal-sharma-ke-griha-jile-men-simati-bjp-aura-con-32147 TrendKia — Har trend, sabse pehle.