भीलवाड़ा में मानसूनी बारिश रुकने से किसानों की बढ़ी चिंता, फसलों को बचाने के लिए दिए गए ये जरूरी सुझाव भीलवाड़ा जिले में मानसून के आखिरी दौर में बारिश न होने से मूंग, ग्वार और बाजरा जैसी खरीफ फसलें सूखने की कगार पर पहुंच गई हैं। ऐसे में कृषि जानकारों ने किसानों को नमी बचाने और सीमित सिंचाई करने की सलाह दी है। राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में मानसून की विदाई का समय नजदीक आ रहा है, लेकिन कई क्षेत्रों में अभी भी बादलों ने पूरी तरह से राहत नहीं दी है। पर्याप्त बारिश न होने के कारण ग्रामीण इलाकों में किसानों की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। मानसून की शुरुआत में जब ठीकठाक बारिश हुई थी, तब किसानों ने उस नमी के भरोसे ही मूंग, ग्वार, तिल, बाजरा, मोठ और कुलथ जैसी कई प्रमुख खरीफ फसलों की बुवाई कर दी थी। शुरुआती हफ्तों में मौसम का साथ मिलने के कारण पौधों की बढ़वार भी अच्छी हुई थी और खेतों में हरियाली छा गई थी। लेकिन पिछले काफी समय से आसमान साफ रहने और बारिश का एक भी दौर न आने के कारण स्थिति अब बदलने लगी है। नमी की कमी से फसलों पर मंडराया संकट लंबे समय से बारिश का सूखा पड़ने के कारण खेतों की मिट्टी में मौजूद नमी तेजी से खत्म हो रही है। इस समय आसमान से बरस रही तेज धूप और उमस भरे मौसम के बीच फसलों पर पानी की किल्लत का असर बहुत साफ नजर आने लगा है। खासकर उन फसलों पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ रहा है, जिनका यह समय दाना बनने और फली विकसित होने का अहम चरण होता है। मिट्टी में पानी की कमी के चलते पौधों की प्राकृतिक ग्रोथ लगभग रुक चुकी है। खेतों में खड़ी मूंग और ग्वार जैसी फसलों की पत्तियां अब पीली पड़ने लगी हैं, और कई जगहों पर तो पौधे मुरझाकर सूखने की कगार पर पहुंच गए हैं। अगर आने वाले कुछ दिनों में बारिश नहीं होती है, तो कुल पैदावार में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है, जिससे अन्नदाताओं को बड़ा आर्थिक झटका लग सकता है। फसल बचाने के लिए पानी और खरपतवार का प्रबंधन मौजूदा हालात से निपटने के लिए कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को कुछ बेहद जरूरी कदम उठाने की सलाह दी है। जानकारों का कहना है कि किसानों को इस समय खेत में बची-खुची नमी को किसी भी तरह बचा कर रखने पर पूरा ध्यान देना चाहिए। जिन किसानों के पास सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं, वे अपनी फसल की वास्तविक जरूरत के अनुसार हल्की सिंचाई कर सकते हैं। हालांकि इस दौरान अत्यधिक पानी देने से बचना चाहिए और कम पानी का इस्तेमाल करते हुए फसल को सुरक्षित रखने का प्रयास करना बेहद जरूरी है। इसके अलावा खेतों में उगने वाले खरपतवार को तुरंत नियंत्रित करना भी आवश्यक हो जाता है, क्योंकि ये अवांछित पौधे मिट्टी में मौजूद नमी और जरूरी पोषक तत्वों को तेजी से सोख लेते हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए किसानों को स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से लगातार संपर्क बनाए रखना चाहिए। फलों और फूल बनने की प्रक्रिया पर बुरा असर पर्याप्त बारिश के अभाव में केवल पौधों की लंबाई और बढ़वार ही नहीं रुकती, बल्कि उनके भीतर फूल और फलियां बनने की जैविक प्रक्रिया भी गंभीर रूप से बाधित होती है। जमीन के अंदर नमी कम होने के कारण पौधों की जड़ें गहराई से पर्याप्त पानी और खनिज नहीं खींच पाती हैं। इसी वजह से पत्तियां समय से पहले पीली पड़कर गिरने लगती हैं और पूरा पौधा कमजोर हो जाता है। यदि यह सूखा और लंबी अवधि तक खिंचता है, तो हरे-भरे पौधे पूरी तरह सूख सकते हैं। इसके अलावा जब फसल कमजोर हो जाती है, तो उस पर विभिन्न प्रकार के कीटों और खतरनाक रोगों के आक्रमण का खतरा भी कई गुना बढ़ जाता है, जिससे नुकसान और ज्यादा बढ़ सकता है। प्रशासन से मुआवजे और सर्वे की मांग इन तमाम समस्याओं से जूझ रहे किसान अब प्रशासन के सामने अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। क्षेत्र के किसान विशेष गिरदावरी करवाने, फसल खराबे का तुरंत सर्वे कराने और प्रभावित इलाकों को अकाल तथा सूखाग्रस्त घोषित करके उचित राहत पैकेज देने की मांग कर रहे हैं। किसानों का साफ तौर पर कहना है कि शासन और प्रशासन को बिना किसी देरी के खेतों में जाकर जमीनी हकीकत का जायजा लेना चाहिए और नुकसान का सही आकलन करना चाहिए। इस मुश्किल वक्त में किसानों के लिए यह भी बेहद जरूरी है कि वे जल प्रबंधन का सही तरीका अपनाएं और हालात बिगड़ने से पहले कृषि विभाग के अधिकारियों से मार्गदर्शन प्राप्त करें ताकि फसल को ज्यादा से ज्यादा बचाया जा सके। इसका आप पर असर भीलवाड़ा में मानसूनी बारिश के थमने से खरीफ फसलों के उत्पादन पर सीधा असर पड़ रहा है, जिससे किसानों की आमदनी घटने का खतरा पैदा हो गया है। • भारत में: देश के जिन हिस्सों में मानसून के आखिरी चरण में बारिश रुकी है, वहां किसानों को अतिरिक्त सिंचाई का खर्च उठाना पड़ रहा है जिससे लागत बढ़ रही है। • भीलवाड़ा में: स्थानीय स्तर पर मूंग, ग्वार और बाजरा जैसी फसलों में दाना बनने की प्रक्रिया रुकने से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा क्यों हुआ मानसून के सत्र के अंत में सक्रिय बादलों की कमी और स्थानीय स्तर पर बारिश के चक्र में आए व्यवधान के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। • सीधा कारण: लंबे समय तक बारिश न होने और तेज धूप निकलने से मिट्टी की नमी का तेजी से वाष्पीकरण हुआ है। • भौगोलिक परिस्थितियां: भीलवाड़ा के कई इलाकों में मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ गईं, जिससे समय पर पर्याप्त पानी नहीं मिल पाया। • फसल की संवेदनशीलता: मूंग और ग्वार जैसी फसलें अपने फली विकास के चरण में पानी की कमी के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं। सवाल-जवाब 1. भीलवाड़ा में किन फसलों पर सूखे का सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है? मूंग, ग्वार, तिल, बाजरा, मोठ और कुलथ जैसी खरीफ फसलों पर सूखे का सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। 2. फसलों की बढ़वार क्यों रुक गई है? लंबे समय तक बारिश न होने और तेज धूप के कारण मिट्टी की नमी खत्म होने से पौधों की बढ़वार रुक गई है। 3. किसानों को इस स्थिति में क्या करने की सलाह दी गई है? किसानों को उपलब्ध पानी से हल्की सिंचाई करने और खेतों से खरपतवार हटाने की सलाह दी गई है। 4. बारिश न होने से पौधों में क्या लक्षण दिखाई दे रहे हैं? फसलों की पत्तियां पीली पड़ रही हैं और कई जगह पौधे मुरझाने लगे हैं। 5. किसान प्रशासन से क्या मांग कर रहे हैं? किसान विशेष गिरदावरी कराने, फसल नुकसान का सर्वे करने और प्रभावित इलाकों को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग कर रहे हैं। https://trendkia.com/rajasthan/bhilavara-men-manasuni-barisha-rukane-se-kisanon-ki-barhi-chinta-phasalon-ko-bachane-ke-lie-die-gae-ye-jaruri-sujhava-31986 TrendKia — Har trend, sabse pehle.