{
  "type": "article",
  "title": "भीलवाड़ा के 200 साल पुराने चौथ मातेश्वरी धाम में उमड़ा आस्था का सैलाब, चढ़ाया गया 30 फीट ऊंचा ध्वज",
  "summary": "रायला स्थित करीब दो शताब्दी प्राचीन श्री चौथ मातेश्वरी मंदिर में 50 गांवों के श्रद्धालुओं ने वार्षिक नवरात्र मेले में भाग लिया, जहां 16 साल पुरानी परंपरा के तहत 30 फीट ऊंचा ध्वज चढ़ाया गया।",
  "content": "राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित रायला कस्बे का धार्मिक परिवेश इन दिनों पूरी तरह भक्ति के रंग में रंगा नजर आ रहा है। यहां स्थित लगभग दो सौ वर्ष पुराने श्री चौथ मातेश्वरी धाम में आयोजित होने वाला वार्षिक नवरात्र मेला क्षेत्रीय जनमानस की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इस पावन अवसर पर रायला के स्थानीय निवासियों के अतिरिक्त आसपास के लगभग 50 गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां भगवती के दर्शन और नमन के लिए पहुंचे। स्थानीय भक्तों में यह दृढ़ विश्वास है कि चौथ माता के चरणों में शीश झुकाने और विधिवत अर्चना करने से पूरे क्षेत्र, समाज और परिवारों में सुख, शांति तथा समृद्धि का वास होता है।\n\nएक ही परिसर में तीन दिव्य शक्तियों के दर्शन की अनूठी महत्ता\nइस ऐतिहासिक धार्मिक स्थल की आध्यात्मिक महत्ता को यहां का अनूठा देव स्वरूप और भी खास बना देता है। मंदिर के पावन परिसर में भक्तों को एक साथ तीन पवित्र देव स्वरूपों के दर्शन का सुअवसर मिलता है। गर्भगृह के मुख्य स्थल पर श्री चौथ मातेश्वरी प्रतिष्ठित हैं, जबकि उनके साथ ही मां चामुंडा की पावन प्रतिमा विराजमान है। इनके ठीक सामने भगवान श्री भैरवनाथ जी का सिद्ध स्थान बना हुआ है। तीन प्रमुख दैवीय स्वरूपों की इस संयुक्त उपस्थिति के चलते इस तीर्थ स्थल के प्रति दूर-दराज के लोगों में अगाध श्रद्धा है। इसके अलावा, नवरात्र पर्व के दौरान पूरे गांव में मां भगवती की पावन जोत निकालने की बरसों पुरानी परंपरा का निर्वहन भी पूरे श्रद्धा भाव और सामूहिक उल्लास के साथ किया जाता है।\n\nढोल-नगाड़ों के साथ निकाली गई 30 फीट विशाल ध्वज यात्रा\nवार्षिक नवरात्र उत्सव के दौरान आयोजित होने वाले इस मेले का मुख्य केंद्र बिंदु 30 फीट ऊंचा भव्य ध्वज रहा। वीर तेजा नवयुग मंडल के कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों द्वारा बीते 16 वर्षों से लगातार इस विशाल ध्वज को मंदिर शिखर पर अर्पित करने का संकल्प निभाया जा रहा है। इस अनुष्ठान के तहत लांबिया गेट से एक विशाल शोभायात्रा प्रारंभ हुई, जिसमें ढोल-नगाड़ों, बैंड-बाजों की मंगल ध्वनि और भक्तों के जयघोष ने संपूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया। दोपहर के समय यह भव्य ध्वज यात्रा श्री चौथ मातेश्वरी के मुख्य द्वार पर पहुंची। इसके बाद मंदिर प्रबंधन समिति और स्थानीय ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से पूरे अंचल की खुशहाली, निरोग जीवन और संपन्नता की मंगल कामना करते हुए इस विशाल ध्वज को माता के दरबार में श्रद्धापूर्वक चढ़ाया।\n\nदूर-दराज के शहरों और बेंगलुरु से भी दर्शन को पहुंचे श्रद्धालु\nक्षेत्रीय निवासी सूरज कुमार ने मंदिर के इतिहास के बारे में जानकारी साझा करते हुए बताया कि यह धाम करीब दो शताब्दी पुराना है और इसी प्राचीन गौरव के कारण इसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है। इस वर्ष नवरात्र के दौरान केवल स्थानीय अंचल ही नहीं, बल्कि राजस्थान के बड़े शहरों जैसे जयपुर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, नाथद्वारा और कांकरोली से भी भारी तादाद में भक्तजन यहां पहुंचे। इतना ही नहीं, कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से भी श्रद्धालु माता के दरबार में मत्था टेकने रायला पहुंचे। कई भक्त मीलों का सफर पैदल तय करके ध्वज लेकर पहुंचे, तो अनेक श्रद्धालु अपने निजी वाहनों के जरिए माता के दर्शन करने आए। फूलों से की गई विशेष सजावट और मंदिर प्रांगण में की गई रंग-बिरंगी रोशनी ने मेले के पूरे परिवेश को अत्यंत भव्य और मनोहारी बना दिया।\n\nइसका आप पर असर\nइस ऐतिहासिक धार्मिक आयोजन से स्थानीय श्रद्धालुओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा सामाजिक व सांस्कृतिक प्रभाव पड़ता है।\n\n• भीलवाड़ा और आसपास के क्षेत्रों में: इस वार्षिक मेले के दौरान रायला और आसपास के 50 गांवों में सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक सद्भाव को नई मजबूती मिलती है। स्थानीय व्यापारियों, परिवहन संचालकों और छोटे दुकानदारों को मेले के दिनों में अच्छी आजीविका और व्यापारिक अवसर प्राप्त होते हैं।\n• तीर्थयात्रियों के लिए: सुदूर राज्यों जैसे कर्नाटक और राजस्थान के विभिन्न जिलों से आने वाले भक्तों को एक ही परिसर में तीन प्रमुख देव स्वरूपों के दर्शन की दुर्लभ सुविधा मिलती है। पैदल और निजी वाहनों से पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह आयोजन पारिवारिक सुख-शांति की सामूहिक प्रार्थना का माध्यम बनता है।\n• सामुदायिक परंपराओं के संदर्भ में: पिछले 16 वर्षों से लगातार निभाई जा रही 30 फीट ध्वज यात्रा जैसी पहल युवा वर्ग को सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक सेवा से सीधे जोड़ती है। गांव में जोत निकालने की पारंपरिक प्रथाएं क्षेत्रीय धरोहर के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।\n• क्षेत्रीय पर्यटन और पहचान: 200 साल पुराने इस प्राचीन स्थल के प्रचार-प्रसार से भीलवाड़ा जिले के ग्रामीण धार्मिक पर्यटन को पहचान मिलती है। इससे आने वाले वर्षों में मंदिर परिसर में बुनियादी सुविधाओं और आवागमन साधनों के विस्तार को गति मिल सकती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nरायला के श्री चौथ मातेश्वरी मंदिर में उमड़ी इस भारी भीड़ और वार्षिक आयोजन के पीछे सदियों पुरानी आस्था और सुव्यवस्थित स्थानीय परंपराएं मुख्य कारण हैं।\n\n• ऐतिहासिक और धार्मिक पृष्ठभूमि: यह मंदिर करीब 200 वर्ष पुराना है और स्थानीय मान्यता के अनुसार यहां पूजा करने से परिवारों में खुशहाली बनी रहती है। इसी दो शताब्दी प्राचीन प्रतिष्ठा के कारण आसपास के 50 गांवों के लोग पीढ़ियों से इस धाम से जुड़े हुए हैं।\n• एक ही परिसर में त्रिवेणी दर्शन: मंदिर प्रांगण में श्री चौथ मातेश्वरी, मां चामुंडा और ठीक सामने भगवान भैरवनाथ का स्थान मौजूद है। इस दुर्लभ धार्मिक स्वरूप के कारण भक्तों को एक साथ तीन शक्तियों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जो मेले में आकर्षण का बड़ा कारण बनता है।\n• युवा मंडल की संगठित भागीदारी: वीर तेजा नवयुग मंडल द्वारा पिछले 16 वर्षों से लांबिया गेट से 30 फीट ऊंचा ध्वज ले जाने की परंपरा निभाई जा रही है। इस सामूहिक भागीदारी ने उत्सव को एक भव्य और नियमित वार्षिक अनुष्ठान का रूप दे दिया है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. श्री चौथ मातेश्वरी मंदिर राजस्थान के किस जिले में स्थित है?\nयह मंदिर राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के रायला कस्बे में स्थित है।\n\n2. रायला का यह चौथ मातेश्वरी मंदिर कितना पुराना बताया जाता है?\nस्थानीय निवासियों और ऐतिहासिक संदर्भ के अनुसार यह पवित्र मंदिर लगभग 200 वर्ष पुराना है।\n\n3. मंदिर परिसर में किन तीन पवित्र देव स्वरूपों के दर्शन होते हैं?\nपरिसर में मुख्य मंदिर में श्री चौथ मातेश्वरी, उनके साथ मां चामुंडा और ठीक सामने भैरवनाथ जी का सिद्ध स्थान स्थित है।\n\n4. मंदिर में 30 फीट ऊंचा ध्वज चढ़ाने की परंपरा कितने वर्षों से चल रही है?\nवीर तेजा नवयुग मंडल की ओर से मंदिर में 30 फीट ऊंचा ध्वज अर्पित करने की परंपरा पिछले 16 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है।\n\n5. ध्वज शोभायात्रा किस स्थान से प्रारंभ होकर मंदिर तक पहुंचती है?\nयह भव्य ध्वज यात्रा लांबिया गेट से गाजे-बाजे के साथ शुरू होती है और दोपहर के समय चौथ मातेश्वरी मंदिर पहुंचती है।\n\n6. इस वर्ष मेले में राजस्थान के बाहर से भक्त कहां से दर्शन करने पहुंचे?\nराजस्थान के विभिन्न शहरों के अलावा कर्नाटक के बेंगलुरु से भी श्रद्धालु माता के दर्शन करने रायला पहुंचे।",
  "url": "https://trendkia.com/rajasthan/bhilwara-ke-200-sala-purane-chauth-mateshwari-dhama-men-umara-astha-ka-sailaba-charhaya-gaya-30-phita-uncha-dhvaja-47696",
  "category": "राजस्थान",
  "publishedAt": "2026-10-15",
  "tags": [
    "चौथ मातेश्वरी मंदिर",
    "भीलवाड़ा",
    "रायला",
    "राजस्थान मंदिर",
    "नवरात्र मेला",
    "वीर तेजा नवयुग मंडल"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}