भीलवाड़ा के दूधाधारी मंदिर में 51 साल से चली आ रही मटकी फोड़ और मल्लखंभ की परंपरा भीलवाड़ा के सांगानेरी गेट स्थित श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी के दूसरे दिन नंदोत्सव पर 51 साल पुरानी मटकी फोड़ और मल्लखंभ लीला का आयोजन हुआ, जिसे देखने बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। राजस्थान के भीलवाड़ा को मेवाड़ का प्रवेश द्वार और वस्त्र नगरी, दोनों कहा जाता है, और यहां कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव सिर्फ एक दिन में खत्म नहीं होता। जन्माष्टमी के दूसरे दिन शहर के सांगानेरी गेट स्थित ऐतिहासिक श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर में नंदोत्सव मनाया जाता है, जिसमें पारंपरिक मटकी फोड़ लीला इस बार भी बड़ी धूमधाम से हुई। यह रस्म इस मंदिर में पिछले 51 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है, और इसे देखने के लिए मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। उत्सव के दौरान दही हांडी लीला, बधाई गीत और मल्लखंभ का प्रदर्शन भी हुआ, जिसमें ग्वाल-बालों के वेश में युवाओं ने मटकी फोड़ लीला पेश कर माहौल को और रंगीन बना दिया। 51 साल पुरानी परंपरा और मंदिर की मान्यता मंदिर के मुख्य पुजारी कल्याण शर्मा के मुताबिक, जन्माष्टमी के दूसरे दिन नंदोत्सव पर मटकी फोड़ और मल्लखंभ लीला आयोजित करने की रीत दशकों पुरानी है और इसे हर साल उतने ही उत्साह से निभाया जाता है। उन्होंने बताया कि मंदिर की परंपरा में नंदोत्सव को खास दर्जा हासिल है, और मटकी फोड़ के साथ मल्लखंभ जैसे आयोजन ही श्रद्धालुओं को सबसे ज्यादा खींचते हैं। हर बरस बड़ी तादाद में लोग इस नजारे के लिए यहां पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में उस दिन भक्ति और उल्लास दोनों का माहौल दिखा, श्रद्धालुओं ने भगवान गोपाल के दर्शन कर जन्माष्टमी की खुशियां मनाईं। दूधाधारी गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी और नंदोत्सव, दोनों ही निंबार्क परंपरा के मुताबिक मनाए जाते हैं। 25 फीट के मल्लखंभ पर चढ़ने की चुनौती पुजारी कल्याण शर्मा ने बताया कि इस प्रतियोगिता में ग्वाले के रूप में सजे युवा 25 फीट ऊंचे मल्लखंभ पर चढ़ने की कोशिश करते हैं, और इस खंभे पर पहले मुल्तानी मिट्टी और तेल लगाया जाता है ताकि यह फिसलनभरा हो जाए। इस दौरान खंभे से बंधे सिक्के, मेवा और दूसरी सामग्री लूटने की लीला भी होती है, और युवाओं को रोकने के लिए लगातार उन पर पानी की बौछार की जाती रहती है। यही चुनौती इस आयोजन को रोमांचक बनाती है और भीड़ को बांधे रखती है। अब यह सिर्फ धार्मिक रस्म नहीं बल्कि भीलवाड़ा के लोगों के लिए एक सांस्कृतिक विरासत बन चुका है, जिसे शहर के लोग हर साल गर्व से देखने आते हैं। वृंदावन के प्रेम मंदिर की तर्ज पर बना है यह मंदिर भीलवाड़ा के सांगानेरी गेट पर बना श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर वृंदावन के प्रेम मंदिर की वास्तुकला से प्रेरित होकर बनाया गया है। यही वजह है कि यहां जन्माष्टमी भी एक दिन बाद मनाई जाती है, और उसी क्रम में अगले दिन नंद महोत्सव का आयोजन होता है। मंदिर की बनावट और उत्सव मनाने का तरीका वृंदावन जैसा ही रखा गया है, जिसकी वजह से भीलवाड़ावासियों के लिए यह मंदिर और भी खास जगह रखता है। मेवाड़ क्षेत्र से हर साल बड़ी संख्या में भक्त सिर्फ इस मंदिर के नंदोत्सव में शामिल होने के लिए भीलवाड़ा पहुंचते हैं, और मटकी फोड़ और मल्लखंभ की यह जोड़ी उनके लिए उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण बन चुकी है। पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जा रही यह रस्म अब भीलवाड़ा की पहचान का हिस्सा मानी जाती है। इसका आप पर असर यह आयोजन धार्मिक श्रद्धा से जुड़ा है, लेकिन जो लोग भीलवाड़ा या आसपास दर्शन के लिए जाना चाहते हैं, उनके लिए तारीख और भीड़ को लेकर कुछ काम की बातें हैं। • भारत में: निंबार्क परंपरा मानने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह साफ हो जाता है कि जन्माष्टमी के अगले दिन नहीं बल्कि दूसरे दिन नंदोत्सव मनाया जाता है। जो भक्त ऐसे मंदिरों में दर्शन की योजना बनाते हैं, वे इस हिसाब से अपनी यात्रा तय कर सकते हैं। • भीलवाड़ा में: सांगानेरी गेट स्थित मंदिर के आसपास उत्सव के दिन भारी भीड़ जुटती है। स्थानीय लोगों और बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को पहले से ट्रैफिक और पार्किंग की स्थिति का अंदाजा लगाकर निकलना बेहतर रहेगा। • सुरक्षा के लिहाज से: मल्लखंभ प्रतियोगिता के दौरान पानी की बौछार और भीड़ के बीच धक्का-मुक्की हो सकती है। मंदिर परिसर में मौजूद लोगों को, खासकर बच्चों के साथ आते समय, सतर्क रहना चाहिए। • पर्यटन के लिहाज से: यह आयोजन अब भीलवाड़ा की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुका है। शहर में घूमने आने वाले लोग जन्माष्टमी के आसपास के दिनों में इस मंदिर को अपनी यात्रा सूची में शामिल कर सकते हैं। सवाल-जवाब 1. नंदोत्सव कब मनाया जाता है? जन्माष्टमी के दूसरे दिन दूधाधारी गोपाल मंदिर में नंदोत्सव मनाया जाता है। 2. मटकी फोड़ लीला की परंपरा कितने साल से चली आ रही है? यह परंपरा पिछले 51 वर्षों से इस मंदिर में निभाई जा रही है। 3. मंदिर के मुख्य पुजारी कौन हैं? श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर के मुख्य पुजारी कल्याण शर्मा हैं। 4. मल्लखंभ कितना ऊंचा होता है और उसे कैसे तैयार किया जाता है? मल्लखंभ 25 फीट ऊंचा होता है, जिस पर फिसलन के लिए मुल्तानी मिट्टी और तेल लगाया जाता है। 5. मंदिर कहां स्थित है? श्री दूधाधारी गोपाल मंदिर भीलवाड़ा के सांगानेरी गेट पर स्थित है। 6. मंदिर की जन्माष्टमी और नंदोत्सव की परंपरा किस पर आधारित है? यह आयोजन निंबार्क परंपरा के अनुसार किए जाते हैं और मंदिर वृंदावन के प्रेम मंदिर की तर्ज पर बना है। https://trendkia.com/rajasthan/bhilwara-ke-dudhadhari-mndira-men-51-sala-se-chali-a-rahi-mataki-phora-aura-mallakhnbha-ki-parnpara-28691 TrendKia — Har trend, sabse pehle.